शनिवार, 16 अप्रैल 2011

बागे ज़न्नत से नही कम फिजाए कानपुर मुर्दा जी जाए जो खाए हवाए कानपुर लावनी: हिन्दू मुस्लिम एकता का सूत्र


लावनी से खड़ी बोली का विकास हुआ.यह हिंदी उर्दू संस्कृत फारसी और देसी भाषाओं की खिचडी थी. इसलिए लावाने को समझने के लिए हिन्दू उर्दू और फ़ारसी सीखते थे जबकि मुसलमान संस्कृत और इस तरह इस शहर में हिन्दू और मुसलमान  घी  शक्कर की तरह  मिले हुए थे. और इस शहर को माशूक की तरह इश्क करते थे. कानपुर के उस्ताद बादल के शागिर्द मजीद खान की लावनी का एक टुकड़ा देखिये.

बागे ज़न्नत से नही  कम फिजाए  कानपुर
मुर्दा जी जाए जो खाए हवाए कानपुर 
भूल रिज्बा इस्म को जो आये कानपुर
छोड़ कर हरगिज़ न वो जाए फिर  कानपुर 

लावनी ने ही शहर को कविता का संस्कार दिया है. कानपुर के जितने भी पुराने कवि है सबने कविता के साथ लावानिया लिखी है चाहे वह प्रताप नारायण मिश्र हो नवीन जी सनेही जी हो या फिर हितैसी जी. प्रताप नारायण मिश्र जी तो लावनी के इतने रसिया थे की लोग उन्हें लावानीबाज कर कर चिढाया करते थे. उनकी लावनी का एक अंश देखिये.

दीदारी दुनियादारे सब नाहक का उलझेडा है,
सिवा इश्क के यहाँ जो कुछ है निरा बखेड़ा है.

लावनी के इश्क में कानपुर के तुर्रेवाले मदारी लाल ,आसाराम, बदरुद्दीन, प्रेमसुख भैरोंसिंह, बादल खान, दयाल चंद,गफूर खान मजीद खान मथुरी मिस्र राम दयाल त्रिपाठी, गौरीशंकर, पन्ना लाल खत्री भगाने बाबू इत्यादि उस्ताद लोग गंगा जमुनी धारा के भाग थे.

काश!की कोई लावनी को कही से फिर ढूंढ लाये और लावनी के दंगल हटिया,रामनारायण शिवाला, चौक, काहूकोठी, जनरलगंज, परेड, नई सड़क, चमनगंज बेकन गंज में होने लगे. हिन्दू और मुसलमान  मोहल्लों में फर्क कम हो जाए. 
(साभार स्वामी नारायण चंद सरस्वती और  अमरीक सिंह "दीप") 
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2 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लगा कानपुर और वहां के शायरों के बारे में जानकार...

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  2. बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
    यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके., हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
    मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

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