सोमवार, 18 अप्रैल 2011

निजी महाविद्यालय के एक शिक्षक की दास्तान

ये  दास्तान  मेरे एक प्रिय मित्र की है जो छत्रपति शाहू जी महाराज से सम्बध्द एक निजी महाविद्यालय में अध्यापन का कार्य करते है.मेरे इन मित्र का नाम है आशीष कुमार .ये विगत कई वर्षो से एक महाविद्यालय में अनुमोदित टीचर के रूप में वनस्पति विज्ञान पढ़ा  रहे है .इनके परिवार में इनकी पत्नी के अलावा दो बच्चे है और ये दोनों बच्चे लड़के है इस तरह से इनके परिवार में कुल ४ सदस्य है .इनके बड़े बेटे की उम्र लगभग १२ साल की है और छोटे बेटे की उम्र लगभग ८ साल की है .ये महाशय जिस निजी महाविद्यालय में पड़ते है उस महाविद्यालय के द्वारा इनको ६ हजार मासिक का वेतन दिया जाता है.इनका छोटा बेटा कक्षा २ में एक स्कूल में पड़ रहा है और इनका बड़ा बेटा किसी समय एक स्कूल में कक्षा ५ में पड़ता था पर अब नही पड़ता है .आज इनका बड़ा बेटा मानसिक रोग का शिकार हो गया है जिसका विगत कुछ महीनो से एक मनो चिकित्सक के पास इलाज चल रहा है.पैसे के आभाव में ये अपने बच्चे का इजाज ठीक प्रकार से नहीं करवा पा रहे है.विगत कुछ महीनो से इनको जो महाविद्यालय वेतन मिलता है वह ये अपने बच्चे के इलाज पर खर्च कर देते है और जो थोड़ा बहुत पैसा बच जाता है उस से ये अपने परिवार का भरण पोषण करते है.नातिजान इनको आज काल दो वक्त की रोजी रोटी की जुगाड़ के किये जगह जगह हाथ पैर मारने  पड़ते है फिर भी इनको दोनों वक्त की रोटी नसीब नहीं होती है कभी कभी तो ये नौबत रहती है की इनके परिवार को दोनों वक्त भूखा रहना पड़ता है.ये कहानी  केवल एक आशीष कुमार की नहीं है अपितु इस विश्वविद्यालय में निजी महाविद्यालय के लगभग सभी टीचर की है.निजी महाविद्यालय में चल रही नक़ल से इन महाविद्यालय के टीचर जो कुछ पहले ट्यूशन से कमा लेते थे इस नक़ल ने तो अब उनसे वो भी छीन लिया है .आज इन निजी महाविद्यालय के टीचर की हालत ये है की अगर ये मामूली रूप से बीमार भी हो जाये तो ये अपना इलाज केवल सरकारी अस्पताल में और सरकारी दवा से ही करा पाते  है अगर डॉक्टर ने बाहर  की दवा पर्चे में लिख दी है तो ये उसे खरीदने में असमर्थ है.आज निजी महाविद्यालय के शिक्षक पैसे के अभाव में बदहाल जीवन जी रहे है.सच बात तो यह है की शासन भी मौन रूप से ये सब कुछ देख रहा है.

4 टिप्‍पणियां:

  1. ये सिर्फ एक आशीष की कहानी नहीं है, कितने आशीष हैं , हम सिर्फ विद्यालयों की बात ही क्यों लेते हैं? और भी स्तर पर चलिए. दुकानों की तरह से खुले हुए इन स्कूलों से आप क्या उम्मीद कर सकते हैं. मालिक को पहले अपनी लागत निकालनी है और फिर आपको कुछ देगा. बेरोजगारी ने इतना स्तर गिरा दिया है कि शिक्षा के नाम से ही अब लगता हैकि ये पढ़ा लिखा तो मजदूरी करने काबिल भी नहीं रहता है. कम से कम एक मजदूर बिना पढ़ा है तो परिवार का पेट पाल लेता है, उसके अपने स्तर की चिंता नहीं होती है लेकिन पढ़े लिखे लोगों का शोषण भी करने वाले पढ़े लिखे ही होते हैं. वे डिग्री की गरिमा को वहाँ करने के चक्कर में अपनी नजर में कोई ऐसा काम नहीं कर सकते हैं जिससे की एक शिक्षक की गरिमा को ठेस लगे भले ही वह गरिमा उन्हें कुछ भी न दे रही हो.
    सरकार अपने भर को कम करने के लिए ही ऐसे विद्यालयों को बढ़ावा देती है और फिर उनके लिए कोई नियम और कानून कैसे बनता है इससे उसको कोई सरोकार नहीं रहता है. ये दुकानें रोज व रोज बढाती जा रही हैं और अपने काले धन को सफेद बनाने के चक्कर में रोज नए कॉलेज भी खुल रहे हैं. कहीं कोई मानक नहीं इनके लिए.

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  2. भगवान् ही मालिक है जी इस शिक्षा व्यवस्था के,,,,

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  3. जिस देश में गुरु को भगवान से बढ़ कर माना जाता है| वहां यह हाल शर्म आती है अपने आप पर की हम उस समाज का हिस्सा है | फिर हम इनसे आशा करते है की हमारे बच्चे उच्च शिक्षा प्राप्त के देश का नाम रोशन करें |

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