गुरुवार, 10 मार्च 2011

मेरे गुरु डॉ वी. एन. सिंह की कलम से

धूप

गोधूली की धूप
मटमैली सी
पेड़ों को आगोश में लिए
फुनगियों फुनगियों पर पसर गयी

आदमी

गुणा, भाग जोड़ घटाने में
बीत गयी ज़िंदगी पूरी
अब तो आदमी
भाग दे काटता है
आदमी को आदमी से

तितली सी यादें

तितली सी उड़ती यादें
पौधों, फूलों पत्तियों पर
पंख फैलाए मचलती मडराती
मेरे पास आती
हवा के हलके झोंके से
फिर जाने कहाँ उड़ जाती

रात

सूरज के डूबने से
रात नहीं होती
दिल का चिराग
बुझता है
रात आती है

8 टिप्‍पणियां:

  1. इस ब्लाग को आदरणीय गुरु जी के आशीर्वाद के रूप में बहुत सुन्दर क्षणिकायें मिली।
    बस आप गुरुजनों का यूँ ही हमे आशीष मिलता रहे ।

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  2. सभी क्षणिकायें एक से बढ कर एक। धन्यवाद।

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  3. गुणा, भाग जोड़ घटाने में
    बीत गयी ज़िंदगी पूरी
    अब तो आदमी
    भाग दे काटता है
    आदमी को आदमी से
    .
    बहुत ही सुंदर . क्या बात है , जितनी सराहना की जाए कम है

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  4. बहुत सुन्दर छुटकी कवितायें। प्यारी सी।

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  5. बहुत सुन्दर रचनाएं है, सब एक से बढ कर एक। गुरु जी को हमारा प्रणाम कहिएगा।

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  6. गुरु जी कि रचनाये देख कर लगा आप उनके वास्तविक उत्तराधिकारी है

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  7. एक अच्छे समाजशास्त्री एक अच्छे कवि एक अच्छे इंसान हमारे गुरूजी कितने महान बहुत सत्य कविता

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