शुक्रवार, 25 मार्च 2011

अवधारणात्मक संकट

समाज अवधारणात्मक  संकट के दौर  से गुजर रहा है .अवधारणात्मक   संकट का तात्पर्य  यह है कि आज व्यक्ति मुलभुत संदर्भो  को दो अथों में परिभाषित करने का आदी हो गया है .अपने लिया कुछ ओर अन्यो के लिए कुछ  ओर स्वयम कर्तव्यविमुख  हो कर दुसरो को कर्तव्य का उपदेश देना .अपने बच्चो तथा परिवार के लिए सब कुछ न्यौछावर  करने वाला व्यक्ति रास्ट्र ओर समाज के लिए अब सोचता ही नही .साधन ओर साध्य का विवेक ही समाप्त हो गया है .एसी स्थिति  में हमे केवल साध्य दिखाई दे रहा है साधन पवित्र है या अपवित्र इसकी पहचान विलुप्त होती जा रही है साध्य कि पवित्रता का विलोप ही अपराधी करन का कारन है एस प्रकार अपराधी करण ओर अवधारणात्मक  संकट समाज में उथल पुथल क़ी स्थिति  निर्मित  कर देते है एसी स्थिति  में जीवन मरण का प्रश्न पैदा  जाता है .असितत्व रक्षा  का सवाल पैदा हो जाता है ओर जहा नेतिकता का अंत होगा वही से अनेतिक कार्यो का आरंभ होगा .आज अगर हमे समाज में बढ़ाते अपराधी करण पर अंकुश लगाना है तो हमे परम्परिक भारतीय सामाजिक मूल्यों क़ी पुन्: स्थापना करनी होगी .

3 टिप्‍पणियां:

  1. the main problem reveals in the process of practical of theory and traditional values also be reviewed again

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  2. पारंपरिक भारतीय मूल्यों से क्या तात्पर्य है? उन में बहुत तो ऐसे हैं जिन्हों ने खुद संकट खड़ा किया हुआ है।
    हाँ हम यह कह सकते हैं कि हमें व्यक्ति केंद्रित मूल्यों के स्थान पर समाजकेंद्रित मूल्यों को तरजीह देनी होगी।

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  3. paramparik bhartiy moolyo se tatpary prakaryatmak moolyo se hai. prakary hamesha sangathan kari hote hai

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