गुरुवार, 3 मार्च 2011

और लो ! फिर आ पहुंची उषा. ..ईशा त्रिपाठी "अनुसुईया"















गिर गयी उषा के हाथ से
सिन्दूर की दानी
और बिखर गयी लाली .
धुंध का लिहाफ ओढ़े
पड़ी हुई वसुंधरा ने
जब ली अंगड़ाई, तो
चिड़ियाँ भी चह्चहायीं .
सुनकर खगों का शोर
दिनकर ने भी आँखें मलीं
और नींद भरा, लाल मुख 
लेकर उपस्थित हो गए .
उषा ने लाली समेटकर
चन्दन का तिलक सूर्य के
माथे पर लगा दिया,
और फिर वो कहाँ लोप हुई
सूरज ने ध्यान ना दिया .
और कुछ ही देर में
नीले समंदर के बीच
दीख पड़ा सबको
इक आग का गोला .
उस आग ने सबको तपाया
पर आई फिर संध्या की छाया.
संध्या जो आई तो
अनल कुछ शांत हो गया,
लपटें चली गयीं
बचा बस लाल कोयला .
इतने में आ पहुंची निशा,
माथे पे चाँद की बिंदिया ,
और काले आँचल में उसके
तारों की अबरक चमके ,
कुछ को सुलाया
कुछ को जगाया निशा ने .
कई प्रहर वह ठहरी रही
पर अंततः थक ही गयी,
और लो !
फिर आ पहुंची उषा.   

7 टिप्‍पणियां:

  1. मिलने को दिनकर से कर धुंध सी बोझिल पलकें

    आई उषा ले चेहरे पर अनुराग लाली

    साथ में चतुर पखेरू गीत गाते

    सजकर आई प्रकृति स्वयं बनकर आली

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  2. माथे पे चाँद की बिंदिया ,
    और काले आँचल में उसके
    तारों की अबरक चमके ,
    कुछ को सुलाया
    कुछ को जगाया निशा ने .
    कई प्रहर वह ठहरी रही
    पर अंततः थक ही गयी,
    और लो !
    फिर आ पहुंची उषा.

    BAHUT HI SUNDAR RACHNA

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