मंगलवार, 29 मार्च 2011

चटक चिरैया मटक मटक के












चटक चिरैया मटक मटक के
रोज भोरहरे आती
नन्हे पंखो को फटक फटक के
मीठे गीत सुनाती 
भोर की निंदिया हौले हौले  
दूर कही उड़ जाती
अधखुली फूली आखों से 
चटक चिरैया ढूंढी जाती
वो सपनो से मुझे जगा कर
अब न कही दिख पाती
इतनी दूर जब जाना ही था 
तो चटक चिरैया  क्यों आती

4 टिप्‍पणियां:

  1. गौरैया के प्रति आपकी संवेदन शीलता देखकर बहुत अच्छा लगा
    ऐसे ही लिखते रहे

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  2. चलो चिरैया जगा तो जाती है ना मधुर स्वर से . चिरैया के लुप्त होने का खतरा बढ़ता जा रहा है .

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  3. मेरी लड़ाई Corruption के खिलाफ है आपके साथ के बिना अधूरी है आप सभी मेरे ब्लॉग को follow करके और follow कराके मेरी मिम्मत बढ़ाये, और मेरा साथ दे ..

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