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शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

कुण्ठाओं की जननी --नक़ल

                                              यह सामान्य ज्ञान की बात है कि मौखिक भाषा ही ध्वनियों का प्रारम्भिक अर्थवान स्वरुप रही होगी । एक बहुत लम्बे अंतराल के बाद जिसका प्रस्तार सम्भवत : शत सहस्रों वर्ष रहा हो -मानव जाति  नें रेखाओं , चित्रों और परिवर्तित होने वाले प्रकृति रूपों को आधार बनाकर लिपियों (लिपि ) को विकसित किया । मौखिक ज्ञान की स्मृति भण्डारण प्रक्रिया अक्षर बद्ध होकर संग्रहित होने लगी। व्यक्ति के जीवन -मरण से मुक्त होकर अक्षर बद्ध -ज्ञान भविष्य की पीढ़ियों के लिए धरोहर बनने लगा। गड़नान्क और शून्य की खोज उसे सितारों की ओर उड़ा ले चली। पिछली पीढ़ी का संग्रहित अनुभव जन्य ज्ञान और अंतर द्रष्टि से सचेती मान्यतायें अगली पीढी के लिये प्रगति- सोपान  बन गयीं । चल पड़ा मानव सभ्यता का सार्थवाह अबूझ प्रकृति के रहस्य-मय रूपों में छिपी ज्ञान मणियों की तलाश में। और यह तलाश चाँद और मंगल से गुजरती हुयी सौर मंडल के पार नीहारिका वीथियों में आज भी गतिशील है। ज्ञानी होने की सनद अब द्वार -पंडितों की मौखिक परीक्षा में सिमटनें से आनाकानी करने लगी। उसे एक विस्तृत फलक की आवश्यकता जान पड़ी और परीक्षा का लिखित रूप संवर्धित होने लगा। जानकारी के असीम प्रस्तार नें परीक्षा के मौखिक स्वरूप को आनुषांगिक बना दिया। विशेष रूप से संयोजित तर्क प्रयोग और प्रमाण पर आधारित ज्ञान नें एक उपसर्ग और जोड़कर विज्ञान का बाना धारण किया। पर विज्ञान का अपार फैलाव ने लिखित परीक्षा  के माध्यम से ही अपने साधकों की श्रेष्ठता -अश्रेष्ठता निश्चित करनें का निर्णय किया और व्यवहारिक प्रयोगशालीय परीक्षा वहां भी आनुषांगिक होकर रह गयी। अब इस लिखित परीक्षा से छुटकारा कहाँ ? प्रारम्भ में हमने इसे सहज स्वीकृति से कन्धों पर उठा लिया। अब यह पुरातन बोझ सिन्दबाद के बुड्ढे की भाँती हमारा गला जकड़े पड़ा है। शायद मानव -प्रकृति की पहचान में हमसे कहीं भूल हो गयी है। या ज्ञान और परीक्षा का समीकरण खण्डित हो गया है। सनद लक्ष्य बन गयी है। ज्ञान कूकुर की भाँती दुत्कारा जा रहा है। भारत की कुछ विशिष्ट  संस्थाओं को छोड़ दें तो यह कहा जा सकता है कि नक़ल भीडतंत्र का बहुमत बटोर चुकी है। बहुरूपिये इसका संचालन कर रहें हैं और राष्ट्रहन्ता इसको संवर्धन दे रहें हैं। आप मुझसे सहमत हों -यह माँग मैं नहीं करता। पर मुझे अपने व्यक्तिगत अनुभव के प्रति ईमानदार होने का हक़ तो दीजिये। यह कहना शायद समीचीन न हो कि मर्ज अब लाइलाज हो चला है पर अभी तक के सारे नुस्खे बेअसर ही साबित हुए हैं।दरअसल लिखित परीक्षाओं  की सार्थकता सम्बन्धी भ्रमात्मक अवधारणाओं की धुंध हमारी दूरगामी द्रष्टि अवरुद्ध कर रही है।लिखित परीक्षाओं की उच्च -स्तरीय सफलता को हम परीक्षार्थी के संभावित विकास से अनिवार्य रूप से जोड़ चुकें हैं और यहीं से त्रासदी का लम्बा सिलसिला शुरू होता है ।
                                           विकास की  सामान्य परिभाषा सड़कें ,बिजली ,पानी ,संचार ,यंत्रिकी ,विश्वशनीय स्वास्थ्य सेवांये और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के साथ जुडी हुई हैं ।प्रारम्भिक शिक्षा भी हमारा संवैधानिक दायित्व है ।नोबेल लारयेट ,अमर्त्य सेन शिक्षा को गरीबी उन्मूलन की दिशा में अन्य योजनाओं से कहीं और अधिक प्रभावी मानते हैं।प्रारम्भिक शिक्षा पार कर आगे चलने वाला प्रत्येक विद्यार्थीकुछ अपवादों को छोड़करविकास की बहु प्रचारित सुविधाओं का सुख भोगी बनना चाहता है ।उसके पास विकास को अन्तर -परिमार्जन या मानवीय मूल्यों से जोड़कर देखनें की द्रष्टि ही नहीं होती। द्रष्टि हो तो तब जब उसका परिवेश -घर ,स्कूल ,परिजन ,पुरजन उसे जाने अनजाने उस मानवीय अस्मिता से अवगत करा सके जो मानव जाति को सहस्त्रों वर्षों की कठिन साधना के फलस्वरूप सांस्कृतिक विरासत के रूप में मिली है ।

रविवार, 25 नवंबर 2012

प्रतिभा किसी देश काल से न बंधकर सम्पूर्ण मानव जाति को सम्बोधित करती है

                            कितनी बार ऐसा होता है कि हम भीड़ -भाड़ से हटकर एकान्त में बैठना चाहते हैं ।तपस्वी ,साधु और गुफावासी ऋषि -मुनि एकान्त  में रहकर ही परम सत्य की खोज करते है ।अपने अपने मापदण्डों के अनुसार वे इस परम सत्य का साक्षात्कार भी कर लेते हैं ।विश्व की हर सभ्यता में एक काल ऐसा रहा है जब अन्तिम सत्य पा जाने का दावा करने वाले खोजियों ने मनुष्य को संसार छोड़कर मुक्ति ,मोक्ष या अन्तिम सत्य की तलाश में लग जाने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया ।एकान्तवास कर सत्य अन्वेषण की इस पुकार को मिथ्या कह कर नकार देना अनुचित ही होगा ।पर इस सत्य को भी हमें स्वीकार करना ही होगा कि मानव सभ्यता के लगभग सभी टिकाऊ मूल्य जो सभ्यता के आधार स्तंम्भ बने हैं सामूहिक जीवन से ही प्राप्त हुये हैं ।एकान्तवासियों के लिए भी सामाजिक सम्पर्क की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना मनन चिन्तन के लिये एकान्त  की।सुदूर अतीत में शायद कभी ऐसा रहा हो जब अकेला व्यक्ति अपने भरण पोषण के लिये प्रकृति संसाधन एकत्रित  कर लेता हो पर बिना हम जोलियों के सहवास के उसे जीवन निरर्थक ही लगता होगा।विगत के सन्दर्भ आज उतने सटीक नहीं हैं और अब हम एकान्त वास की कल्पना अपने जीवन के उन प्राईवेट क्षणों से जोड़ सकते है जब हम दिन के चौबीस घन्टों में अपने निजी आवासों पर होते हैं ।पारिवारिक जीवन भी विशाल मानव समुदाय से अलग हटकर अक प्रकार का एकान्तवास ही है ।जो हमें जीवन के बड़े सत्यों की तलाश में प्रवृत्त करता है ।समाज शास्त्री आज एक मत से यह सिद्धांत स्वीकार कर चुके हैं कि सामूहिक  जीवन में ही मानव विकास की अजेय विजय यात्रा का सूत्रपात किया था और आज भी मानव समाज की सामाजिक भावना ही हमें विकास के लम्बे दौर में पहुंचा सकेगी ।व्यक्ति परिवार का भाग होता है ,परिवार ग्राम का ,ग्राम कबीले का ,कबीला क्षेत्र का ,क्षेत्र छोटे या बड़े राष्ट्र का और राष्ट्र छोटे या बड़े भूखण्ड का तथा भूखंडों की ईकाइयाँ अन्तर राष्ट्रीय समुदाय का।चेतना की ये सामूहिक ऊँचाइयाँ मानव विकास के सोपानो को चिन्हित करती हैं।हममें से अभी भी कुछ कबीले ,कुछ क्षेत्र या कुछ भूखण्ड अन्तर्राष्ट्रीय मानव समुदाय का एक सहज अंग नहीं बन सके हैं क्योंकि उनका चिन्तन विकास की पूरी गति नहीं प्राप्त कर सका है ।सच तो यह है की जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है उसका चिन्तन भी उतना ही बड़ा होता है।इस बड़े चिंन्तन  के लिये आधुनिक या अत्याधुनिक होना ही आवश्यक नहीं है ।ऐसा चिंतन कम से कम भारतीय संस्क्रति के प्रभात में भी देखा जा सकता है ।अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध कवि JohnDonneनें सत्रहवीं शताब्दी में ही कहा था "यह मत पूंछने जाओ कि चर्च का घण्टा बजकर किसकी मृत्यु की सूचना दे रहा है  वह तुम्हारी अपनी मृत्यु की सूचना है क्योंकि तुम मानव जाति का एक अविभाज्य अंग हो ।"आज विश्व का लगभग सभी शिक्षित जन समुदाय इस सत्य को स्वीकार कर चुका है भौगोलिक,क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सीमायें मात्र प्रबन्धन पटुता के लिये बनायी गयी हैं उन्हें मानव जाति को विभाजित करने के लिए स्तेमाल नहीं करना चाहिये।कौन ऐसा शिक्षित भारतवासी है जिसने अमरीकी राष्ट्रपति  बराक ओबामा के चुनाव में गहरी दिलचस्पी न दिखायी हो।या फिर बँगला देश में शेख हसीना की जीत पर खुशी का इज़हार न किया हो।ऐसा इसलिये है कि अब किसी भी राष्ट्र के हित उसके पड़ोसी राष्ट्रों के साथ तो मिले जुले हैं ही पर साथ ही उन हितों का सम्बन्ध समस्त मानव जाति के विकास से भी है।ब्रिटेन में प्रधान मंत्री मैकमिलन ने साउथ अफ्रीका के अपने दौरे के दरमियान जब यह बात कही थी कि रंग भेद एकाध दशक में इतिहास के कूड़े कचरे में फेंक देने वाली नीति के रूप में जाना जायेगा तब साउथ अफ्रीका के श्वेत नेताओं ने उनकी तीखी आलोचना की थी।पर प्रधान मन्त्री मैकमिलन नें जिस दूर द्रष्टि का परिचय दिया था वह आज इतिहास का अमर सत्य है ।यदि कोई शिक्षित आधुनिक युवक चाहे वह किसी भी देश का हो अज यह मानता है कि रंग भेद के कारण या जाति भेद के कारण वह जन्म से ही अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ है तो उसे एक मानसिक रोगी ही करार दिया जायेगा ।विज्ञान ,कला ,साहित्य खेल ,शौर्य ,राजनीति अन्तरिक्ष अनुसन्धान और सत्य धर्म की खोज -कोई भी  तो ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमे हर रंग ,हर जाति ,और हर नस्ल के श्रेष्ठ लोगों नें अपनी पहचान न बनायी हो राजनीति के सत्ता गलियारों में आज उन विदेश मन्त्रियों को सच्चे राष्ट्रीय सेवको के रूप में लिया जाता है जो अपनी कुशल दूरगामी द्रष्टि के द्वारा विश्व जनमत को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं ।सच तो यह है कि अन्तरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहने वाले प्रबुद्ध मनीषी प्रशासन को विशालता का एक नया आयाम देने में समर्थ होते हैं ।भारत के मध्ययुगीन सभ्यता में कुछ समय ऐसा था जब शारीरिक श्रम की महत्ता को पूरे गौरव के साथ स्वीकार नहीं किया गया ।हिन्दी भाषा के कुछ शब्द जो कर्म वाचक संज्ञाओं या विशेषणों के रूप में प्रयोग होते थे अपना महत्व खोकर हीन भाव के प्रतीक बन गये ।भाषा के विचारकों को इन शब्दों को नयी प्रान्जलता देकर फिर से सार्थक ऊचाइयों पर पहुचाने का प्रयास करना चाहिये ।जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के शोधार्थिओं ने कुछ आवश्यक काम किया है ।माटी इस दिशा में किये जा रहे प्रयत्नों की तलाश में है और भाषा शास्त्रियों से संपर्क साधे हुये है ।सार्थक सामाजिक श्रम से जुड़े कुछ समुदाय स्वयंम भी इस दिशा में प्रयत्न शील हैं ।उनके प्रयत्नों को एक वैज्ञानिक आधार देने की आवश्यकता है ।गहरी सूझ बूझ वाले माटी के पाठक इस बात से भली भाँती परचित होंगे की हम अपने लेखों और रचनाओं में विश्व के जाने माने विचारकों की बातें उद्धत करते रहते हैं।ऐसा इस लिए है कि हम यह बताना चाहते हैं कि अपने सर्वोत्कर्ष रूप में  ।माटी कई बार प्रतिभा किसी देश काल से न बंधकर सम्पूर्ण मानव जाति को सम्बोधित करती हैअपनी रचनाओं में ऐसे शब्द समूहों को भी निखारती रहती है जो अर्थ संकुचन के कारण व्यापक स्तर पर प्रयोग नहीं किये जाते ।ग्राम सभ्यता जे जुड़े कई शब्द कल तक भले ही ऊँचे कद के योग्य न माने गये हों पर आज तो उन्हें पूरे आदर के साथ स्वीकारना होगा।हलवाहा यदि हलधर होकर अपने पौराणिक प्रसंगों के कारण गरिमा मण्डित हो जाता है या पापी यदि तन्तुवाय के रूप में सार्थक वनता है तो हमें इन शब्दों का संसकारी करण करना होगा।ये मात्र सुझाव की एक द्रष्टि है।इस दिशा में भाषा विदों द्वारा कई अधिक सार्थक प्रयोग किये जा सकते हैं ।हो सकता है हमारे कुछ सफल राजनीतिज्ञ समाज के उन वर्गों से उठ कर आये हों जिन्हें भाषा की क्षेत्रीय मान्यताओं ने उपेक्षित किया हो।मुझे  विशवास है कि उनका वैदूर्य हिन्दी भाषा के शब्द संसकारी करण में भी एक भूमिका निभायेगा।

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों

                            भारत के महानगरों की सड़कों पर भारत की आश्चर्य जनक विभिन्नता के अभावोत्पादक छवि चित्र देखे जा सकते हैं ।अपार वैभव की झलक के साथ दारुण ह्रदय विदारक भुखमरी ,उल्लास और करुणा का मर्म भेदी द्रश्य प्रस्तुत कर देते हैं \साढ़े आठ प्रतिशत से लेकर नौ प्रतिशत तक बढ़ी हुई आर्थिक विकास गति 40-50लाख से ऊपर की गाड़ियों में दोलायित रहती है।जब किसी क्रासिन्ग पर लाल बत्ती इन गाड़ियों को कुछ देर के लिये रोकती है तो इनके आस -पास कितनी ही याचना भरी आँखें गाड़ी में बैठी महिलाओं के कानों से झूलते स्वर्ण कुण्डल निहारती हुई दिखाई पड्ती हैं।आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता का यह  भयानक अन्तर गाड़ियों के पीछे लम्बी लगी मोटर साइकिलों में थोड़ा बहुत सन्तुलन पा लेता है पर राजमार्ग के फुटपाथ से लगे किनारों पर श्रमिकों की साइकिलों की लम्बी लाइनें वर्ग विभाजन की निचली रेखाओं सी जान पड़ती हैं। शासन व्यवस्था का प्रत्येक तन्त्र सभ्य समाज की सामाजिक व्यवस्था के प्रारम्भ से ही यह दावा करता रहा है कि शासन तन्त्र न्याय की समानता तो देगा ही पर उसके साथ आर्थिक समानता के लिये भी प्रयत्न शील रहेगा ।इतना अवश्य है कि आर्थिक समानता ज्यामित की रेखाओं की तरह एक जैसी नहीं होंगी पर इतना अवश्य होगा कि जिस आधार पर यह खड़ी की जायेगी वह आधार अपने युग के सभ्य जीवन स्तर का बोझ उठा लेने में समर्थ होगा ।अधिकाँश भारतवासी यह मानते हैं कि आर्थिक समानता की कुछ ऐसी ही व्यवस्था महानायक श्री राम के राज्य में स्थापित हो सकी थी और सम्भवत :इसीलिये महात्मा गान्धी के स्वराज्य  की कल्पना राम राज्य से मेल खाती थी ,जैसा अतीत में था वैसा ही चित्र आज भी दिखाई पडता है ।हर राजनितिक पार्टी आम आदमी की खुशहाली का काम करने का दावा करती है पर आम आदमी की परिभाषा अर्थवान निरूपण के सभी प्रयासों को नकारती दिखाई पड़ती है ।स्वर्ण धूलि में लोटते कार्पोरेट जगत के डायरेक्टरों के मुकाबले में दस हजार मासिक तनख्वाह पाने वाला चौकीदार ,चपरासी एक आम आदमी ही है और इन चौकीदार ,चपरासियों के मुकाबले में फटी धोती में शिशु को संभ्भाले कटोरी फैला कर भीख मांगती हुई दयनीय नारी को हम क्या कह कर पुकारें इसके लिये शब्द पाना कठिन होता है ।जनता से या जनता जनार्दन से जो अर्थपूर्ण ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं उनकों एक सुस्पष्ट व्याख्या में बाँधना एक दुष्कर कार्य है ।हीरों के जगमगाते अम्बारों और गन्दली नालियों में पलते शिशु समूहों के बीच का अंन्तर  तो सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है ।हाँ, यह दूसरी बात है कि कामन वेल्थ गेम्स के आयोजन के पखवारे में विदेशि यों की आँखे इस द्रश्य को न देख सकें इसके लिये पुलिस के आतंक के बल पर कोई अल्पकालीन व्यवस्था भले ही कर ली जाय ।
                       पर हम जिस अपार विभिन्नता की बात कर रहें हैं वह केवल आर्थिक धरातल पर ही सिमट कर नहीं रह जाती ।महानगरीय सड़कों पर आप वेष -भूषा ,केश -राशि का रख - रखाव ,वाहन चालन की भद्रता -अभद्रता और मौखिक मुद्राओं के न जाने कितने आश्चर्य भरे रूप देखे जा सकते हैं ।इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशाब्ध की समाप्ति तो होने जा रही है पर आप भारत की महानगरी की सड़कों पर बाइसवीं सदी के परिधानों ,प्रकारों ,और उत्तेजक आचरणों की झांकियां भी प्रचुर मात्रा में सहेज सकते हैं ।इसके साथ ही साथ साम्राज्यवाद का उन्नीसवीं सदी  वाला बोलचाल का वह लहजा भी सुननें को मिल जाएगा जब Properको Propah कहा जाता था और My lord मिलार्ड कहना वकील होने की शान मानी जाती थी ।इतना ही नहीं कई बार आप अट्ठारहवीं शताब्दी या उससे पीछे के मध्य युगीन काल की झलकियाँ भी पा सकतें हैं जब फारसी अपने हुस्न पर थी और खाने खाना होना दरबारी गौरव का चरम शिखर था ।महिलाओं की वेशभूषा की विभिन्नता ,उनकी केश -राशियों की गुम्फन -अगुम्फन शैली कभी हमें अजन्ता के गुफाकाल के चित्रण तक पहुंचाती दिखाई पड़ती है ।तो कभी उस आच्छादन युग की ओर जब अन्धकार ही नारी आकृति को देख सकता था।इतनी अपार विभिन्नता के साथ भारत सहस्त्रों काल से चलता ,रुकता , बढ़ता ,ठहरता ,गिरता -सँभलता ,गति मान रहा है और जब तक मानव श्रष्टि है शायद गतिमान रहेगा ।ज्ञात इतिहास के समुद्रगुप्त विक्रमादित्य काल को पहले इतिहास के विद्यार्थियों को स्वर्ण काल के रूप में चित्रित कर पढ़ाया जाता था पर अब कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले इतिहास विदों ने उसे स्वर्ण काल न कहकर पुकारने की अपील की है ।उनका कहना है कि उस काल में भी आम आदमी या सामन्य जन शोषित ही था ।प्रगति की क्या व्याख्या है इसे तो प्रगतिशील कहे जाने वाले विचारक ही जाने इनमें से कई विचारक तो राम -राज्य को भी शोषण व्यवस्था से मुक्त नहीं पाते ।पर सब इतिहासों से उठकर एक ऐसा इतिहास होता है जो अप्रयास ही संस्कारों द्वारा हमें मिलता है ।यही विश्वास हमें बताता है कि स्वयं मर्यादा में अपनी इ च्छा से बंधकर ही जब कोई शासक मर्यादा पुषोत्तम हो जाता है तो जन मानष उसे भगवान् के रूप में पूजने लगता है ।हमें अपने शासकों से जो हमारे ही प्रतिनिधि हैं इसी मर्यादा की अपेक्षा है ।पर्ण कुटी में रहकर राज्य का संचालन करना रामानुज भरत के जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी और भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों ।

पहले अंडा या मुर्गी ढाक के वही तीन पात

                         यिज्ञान और टेकनालाजी अपने में विकास के अपार संभावनाए छिपाये है ।पिछले डेढ़ -दो दशक में संसार ने जितना परिवेर्तन देखा है उतना पिछली कई शताब्दियों में भी संभव नहीं हो पाया था ।जब औद्योगिक क्रान्ति अपने चरम पर पहुँच चुकी थी ।तब ऐसा लग रहा था कि मध्य युगीन व्यवस्था बहुत कुछ आदिम सभ्यता का ही प्रतिरूप है ।पर आज सूचना प्रौद्योगिकी ,कम्प्यूटरीकरण और अन्तरिक्ष प्रसार पद्धतियों में औद्योगिक क्रान्ति को आदिम सभ्यता के विकास की एक छोटी मंजिल के रूप में ही प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया है ।बहु विध्य पाठकों को यह बताने की आवश्यकता "माटी "नहीं समझती कि आने वाले वर्षों में कागज़ का प्रयोग नाम -मात्र को ही रह जायेगा ।इलेक्ट्रानिक मीडिया ही विश्व सम्पर्क का सबसे सशक्त संचार साधन बन कर उभर चुका है ।पर कागज़ पर लिखे शब्द हों या स्वचालित परदे पर उभरे ट्वीट ब्लॉग ,ट्वीटर या प्रशासनिक प्रचार तथा सांख्यिक गड़नायें सबमे शब्द और अंक के महत्व को पूरी महत्ता के साथ स्वीकार हे करना पड़ेगा।चिंतन का मूर्त रूप शब्द या सांकेतिक शब्द चिन्हों के द्वारा ही संभव है ।और इसलिये सम्प्रेष्ण का प्रकार बदल जाने पर भी सम्प्रेष्ण की अनिवार्यता या महत्ता कभी कम नहीं हो सकती।गहन चिंतन और गहन भावानुभूति के सम्राठों को तकनीकी नवीनताएँ कुछ देर के लिये भ्रमित भले ही कर दे पर उनके पास जो अक्षय कोष है उसकी भागीदारी के बिना मानवता के उज्वल भविष्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती।विज्ञान ने भी इधर हाल ही में अत्यन्त गहरे दार्शनिक प्रश्नों के कुछ विज्ञान सम्मत उत्तर प्रस्तुत किये है ।दर्शन का सबसे मूल प्रश्न है जीवन के आविर्भाव की गुत्थी को सुलझाना।अंग्रेजी में बहुधा फिलासफी के विद्यार्थियों से प्रश्न पूंछा जाता है कि पहले अंडा या मुर्गी ।अब यदि मुर्गी नहीं थी तो अंडा कहाँ से आया ?और यदि अंडा नहीं था तो मुर्गी कहाँ से आयी ?और यदि कुछ नहीं था तो न कुछ में से कुछ कैसे पैदा हो गया ?महर्षि भारद्वाज से लेकर यूनान के अफलातून तक और ब्रिटेन के बर्टेंड रसल से लेकर भारत के राधाक्र्ष्णन तक सभी ने इन प्रश्नों के अपने अपने उत्तर प्रस्तुत कियें हैं ।ब्रिटेन में अभी हाल ही में अत्यन्त उच्च स्तरीय प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया है कि मुर्गी के अंडे के ऊपर जो कडा छिलका होता है वह जिस प्रोटीन से बनता है वह प्रोटीन केवल एक मुर्गी के भीतर ही बन सकता है।इस प्रोटीन का वैज्ञानिक नाम Ovocleidin-17 है और यह प्रोटीन ही मुर्गी के अंडे के ऊपर एक कड़ा खोल बना सकती है ।अब अगर यह प्रोटीन मुर्गी के भीतर ही बन सकता है तो स्पष्ट है कि मुर्गी को पहले होना चाहिये और अंडे को बाद में बात अगर यहीं तक रहती तो शायद  समस्या का हल हो गया होता पर फिर  प्रश्न उठता है कि यदि अण्डा नही था तो मुर्गी कहाँ से आयी ?समस्या हल भी हो गयी और हल में से समस्या फिर उठ खड़ी हुयी।विकासवादी वैज्ञानिक यह कहते हैं कि शायद  प्रोटीन Ovocleidin-17अपने गैर ठोस या तरल रूप में धरती के वातावरण में कहीं फ़ैली हुई थी और उसी ने सबसे पहले कुछ अज्ञात कारणों से अन्डे का रूप लिया होगा ।अब समस्या खड़ी होती है उन अज्ञात कारणों के निरूपण की ।ढाक के वही तीन पात फिर जहां के तहाँ अब विज्ञान के शोधार्थी और आगे बढ़ते है वे कहते है कि हर अण्डा एक प्रकार का नहीं होता अण्डों का बनना मुर्गी के अण्डों के बनने सेबहुत  पहले शुरू हो चुका था ।अलग -अलग पक्षी अलग अलग किस्म की प्रोटीन से अपने अंडे बनाते हैं।दरअसल समस्या पक्षी जगत से बहुत पीछे हमें उस काल में ले जाती है जब डायनासोर धरती के अधिकाँश भागों में फैले थे ।यह सरीस्रपों का ज़माना था और वे भी अण्डों के द्वारा ही म्रत्यु की अमिट विभीषिका को मिटाकर नयी स्रष्टि को जन्म देते थे ।पक्षी जगत तो इन्ही सरीस्रपों से विकसित होकर लाखों वर्ष बाद अस्तित्व में आया ।अन्डे बनाने वाली प्रोटीन की कई किस्में पहले से ही स्रष्टि की अद्दभुत प्रयोगशाला में उपस्थित थी और बाद में इन्ही प्रोटीनों में से Ovocleidin-17एक नया रूप लेकर अस्तित्व में आयी ।यह विकासवादी वैज्ञानिक कहते हैं कि मुर्गी और अन्डे वाला प्रश्न वैज्ञानिक सन्दर्भों में अधिक सार्थक नहीं लगता ।न तो अण्डा पहले था न मुर्गी ।इनसे बहुत पहले थे सरीस्रपों के नाना रूप और आकार। दैत्याकार ,मध्यम ,लघु तथा द्रश्य और अद्रश्य अनगिनित जीवकणों की अप्रतिहत अविरल अनन्त कोटि धारा प्रवाह के अस्तित्व को ही वैज्ञानिक उत्तर के रूप में ही स्वीकारना चाहिये।वैज्ञानिक शोधकर्ताओं के लिये और विकासवादी पण्डितों के लिए यह विस्मयकारी वैज्ञानिक उत्तर प्रणाली भले ही शोध संतोष प्रदान कर दे पर हम सामन्य जनों के लिये तो यह प्रश्न अबूझा ही खडा है कौन पहले था अण्डा या मुर्गी।गहरायी से इस प्रश्न पर झाँक के देखें तो इसमें वेदान्त का सबसे गूढ़ प्रश्न छिपा हुआ है ।जीवात्मा और जीवात्मा को परिवेष्ठित करने वाला कलेवर इन दोनों में से प्राथमिक कौन है ।सबसे पहले दैव है या पदार्थ और क्या दैव और पदार्थ अनन्य रूप से जुड़े तो नहीं हैं ।"माटी "का सम्पादक तो माटी में ही मानव जीवन की अनन्य संभावनायें तलाशने में लगा है और 'माटी "को ही ब्रम्ह का प्रतीक मान कर उसकी पूजा अर्चना की आराधना करता है।ज्ञान -विज्ञान ,धर्म -धारणा ,स्पन्दन और स्तंभ्भन ,शुक और शायिका सभी में उसे मृत्तिका में घुले -मिले परमतत्व के दर्शन होते हैं ।ऊर्ध्वगामी अंकुरों को मेरा नमस्कार समर्पित है।

                                                                                                              गिरीश कुमार त्रिपाठी