शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

कुण्ठाओं की जननी --नक़ल

                                              यह सामान्य ज्ञान की बात है कि मौखिक भाषा ही ध्वनियों का प्रारम्भिक अर्थवान स्वरुप रही होगी । एक बहुत लम्बे अंतराल के बाद जिसका प्रस्तार सम्भवत : शत सहस्रों वर्ष रहा हो -मानव जाति  नें रेखाओं , चित्रों और परिवर्तित होने वाले प्रकृति रूपों को आधार बनाकर लिपियों (लिपि ) को विकसित किया । मौखिक ज्ञान की स्मृति भण्डारण प्रक्रिया अक्षर बद्ध होकर संग्रहित होने लगी। व्यक्ति के जीवन -मरण से मुक्त होकर अक्षर बद्ध -ज्ञान भविष्य की पीढ़ियों के लिए धरोहर बनने लगा। गड़नान्क और शून्य की खोज उसे सितारों की ओर उड़ा ले चली। पिछली पीढ़ी का संग्रहित अनुभव जन्य ज्ञान और अंतर द्रष्टि से सचेती मान्यतायें अगली पीढी के लिये प्रगति- सोपान  बन गयीं । चल पड़ा मानव सभ्यता का सार्थवाह अबूझ प्रकृति के रहस्य-मय रूपों में छिपी ज्ञान मणियों की तलाश में। और यह तलाश चाँद और मंगल से गुजरती हुयी सौर मंडल के पार नीहारिका वीथियों में आज भी गतिशील है। ज्ञानी होने की सनद अब द्वार -पंडितों की मौखिक परीक्षा में सिमटनें से आनाकानी करने लगी। उसे एक विस्तृत फलक की आवश्यकता जान पड़ी और परीक्षा का लिखित रूप संवर्धित होने लगा। जानकारी के असीम प्रस्तार नें परीक्षा के मौखिक स्वरूप को आनुषांगिक बना दिया। विशेष रूप से संयोजित तर्क प्रयोग और प्रमाण पर आधारित ज्ञान नें एक उपसर्ग और जोड़कर विज्ञान का बाना धारण किया। पर विज्ञान का अपार फैलाव ने लिखित परीक्षा  के माध्यम से ही अपने साधकों की श्रेष्ठता -अश्रेष्ठता निश्चित करनें का निर्णय किया और व्यवहारिक प्रयोगशालीय परीक्षा वहां भी आनुषांगिक होकर रह गयी। अब इस लिखित परीक्षा से छुटकारा कहाँ ? प्रारम्भ में हमने इसे सहज स्वीकृति से कन्धों पर उठा लिया। अब यह पुरातन बोझ सिन्दबाद के बुड्ढे की भाँती हमारा गला जकड़े पड़ा है। शायद मानव -प्रकृति की पहचान में हमसे कहीं भूल हो गयी है। या ज्ञान और परीक्षा का समीकरण खण्डित हो गया है। सनद लक्ष्य बन गयी है। ज्ञान कूकुर की भाँती दुत्कारा जा रहा है। भारत की कुछ विशिष्ट  संस्थाओं को छोड़ दें तो यह कहा जा सकता है कि नक़ल भीडतंत्र का बहुमत बटोर चुकी है। बहुरूपिये इसका संचालन कर रहें हैं और राष्ट्रहन्ता इसको संवर्धन दे रहें हैं। आप मुझसे सहमत हों -यह माँग मैं नहीं करता। पर मुझे अपने व्यक्तिगत अनुभव के प्रति ईमानदार होने का हक़ तो दीजिये। यह कहना शायद समीचीन न हो कि मर्ज अब लाइलाज हो चला है पर अभी तक के सारे नुस्खे बेअसर ही साबित हुए हैं।दरअसल लिखित परीक्षाओं  की सार्थकता सम्बन्धी भ्रमात्मक अवधारणाओं की धुंध हमारी दूरगामी द्रष्टि अवरुद्ध कर रही है।लिखित परीक्षाओं की उच्च -स्तरीय सफलता को हम परीक्षार्थी के संभावित विकास से अनिवार्य रूप से जोड़ चुकें हैं और यहीं से त्रासदी का लम्बा सिलसिला शुरू होता है ।
                                           विकास की  सामान्य परिभाषा सड़कें ,बिजली ,पानी ,संचार ,यंत्रिकी ,विश्वशनीय स्वास्थ्य सेवांये और प्रदूषण मुक्त पर्यावरण के साथ जुडी हुई हैं ।प्रारम्भिक शिक्षा भी हमारा संवैधानिक दायित्व है ।नोबेल लारयेट ,अमर्त्य सेन शिक्षा को गरीबी उन्मूलन की दिशा में अन्य योजनाओं से कहीं और अधिक प्रभावी मानते हैं।प्रारम्भिक शिक्षा पार कर आगे चलने वाला प्रत्येक विद्यार्थीकुछ अपवादों को छोड़करविकास की बहु प्रचारित सुविधाओं का सुख भोगी बनना चाहता है ।उसके पास विकास को अन्तर -परिमार्जन या मानवीय मूल्यों से जोड़कर देखनें की द्रष्टि ही नहीं होती। द्रष्टि हो तो तब जब उसका परिवेश -घर ,स्कूल ,परिजन ,पुरजन उसे जाने अनजाने उस मानवीय अस्मिता से अवगत करा सके जो मानव जाति को सहस्त्रों वर्षों की कठिन साधना के फलस्वरूप सांस्कृतिक विरासत के रूप में मिली है ।

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