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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

ज्ञान ही शक्ति है

  आंग्ल भाषा का यह त्रिशब्दी कथन " Knowledge is power" आज के युग में जितना सार्थक है उतना शायद मानव इतिहास के किसी काल में नहीं रहा है। ज्ञान -विज्ञान के अभूतपूर्व प्रचार -प्रसार के कारण ज्ञान -विज्ञान का साहित्य अब अध्ययन  -अध्यापन की द्रष्टि से प्राथमिकता  पा चुका है। ललित साहित्य अब बहुत कुछ फिल्मों ,टी .वी .,शोज ,ग्लैमर ,एडवरटाइजमेन्ट्स  और हल्के -फुल्के हास -परिहास की क्षणिकाओं में सिमटता जा रहा है। मेरा मानना है कि ललित साहित्य और ज्ञान -विज्ञान के साहित्य के बीच कोई ऐसी विभाजक रेखा नहीं होनी चाहिये जो दोनों को एक दूसरे  से अलग कर दे। ललित साहित्य का सहारा लेकर ज्ञान -विज्ञान भारत के घर -घर ,गाँव -गाँव ,में अपनी पहुच बना सकता है। शुष्क तथ्यों को और जटिल सूत्रों को नीरसता का बोझ दबा देता है और वे सहज स्वीकृत नहीं पाते। आवश्यकता है ज्ञान -विज्ञान के ऐसे समर्थ अधिकारी विद्वानों की जो बोध -गम्य भाषा के द्वारा उदाहरणों , किस्सा -कहानियों और भारतीय परम्परागत धार्मिक विचारधाराओं से आज की नयी खोजों और विश्व स्वीकृत मूल्यों को जन मानस तक पंहुचा सके। मुझे लगता है कि विज्ञान को बालकों और किशोरों में मनोरंजक ढंग से पहुचाने के लिये विज्ञान की धारणाओं पर आधारित ललित साहित्य के सृजन की बहुत अधिक आवश्यकता है। इसे एक राष्ट्रीय चुनौती के रूप में स्वीकार करना होगा। पश्चिम के देशों में तथा जापान और चीन में भी विज्ञान पर आधारित प्रचुर ललित सामग्री उपलब्ध है पर हिन्दी भाषा में इस दिशा में समर्थ प्रयास देखने को नहीं मिल रहे हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि हिन्दी भाषा- भाषी क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच अभी जीवन के सहज धरातल पर उतर कर व्यवहार के रूप में नहीं ढल पायी है। कोई भी ज्ञान जब तक हमारी सोच का अविभाज्य अंग नहीं बनता तब तक उसे ललित साहित्य के माध्यम से व्यक्त करना काफी दुष्कर होता है।रोबोट को लेकर लिखी जाने वाली कहानियाँ ,वार्तायें और नाटकीय रचनायें प्राणवान नहीं बन पाती क्योंकि रोबोट का किताबी ज्ञान हमारे सामान्य व्यवहार में कहीं परिलक्षित नहीं होता। ऐसा इसलिये भी है क्योंकि अभी हम अत्याधुनिक वैज्ञानिक सुविधाओं से अपरिचित ही हैं।परिचय है भी तो केवल सतही किताबों ,द्रश्य चित्रों और अधकचरी चर्चाओं के माध्यम से। रोबोट की कौन  कहे अधकांश हिन्दी भाषा -भाषी क्षेत्र के समर्थ शब्दकार अभी तक Email,Internet,और  broad Band जैसी आधुनिक संचार प्रणाली के सामान्य ज्ञान से भी वंचित हैं। इस दिशा में घर -घर तक दूर संचार प्रणाली के साधनों को पहुचाने का भारत सरकार का प्रयास निश्चय ही सराहनीय है। समाजशास्त्र के अध्येता आज एक स्वर से यह कहते सुने जाते हैं कि मानव की सोच उसके आस -पास के वातावरण और उसकी व्यक्तिगत तथा उसके समाज की साझा परिस्थितियों से बनती -बिगड़ती है। मनुष्य की सोच शून्य से गिरने वाला कोई ऐसा फल नहीं है जो उसे एकान्त में मिल जाय। Technocracy के आज के युग में हमें अपनी प्राचीन पूजा पद्धतियों को भी नवीन भेष -भूषा से सजा -बजा कर प्रस्तुत करना पड़ रहा है। महेश योगी . रवि शंकर , स्वामी रामदेव ,बापू आशाराम तथा भगवान अघोरेश्वर सभी अपनी साधना पद्धतियों को वैज्ञानिक आधार देने में प्रयासरत हैं और इसमें  उन्हें काफी सफलता मिली है । पाश्चात्य जगत भी उनकी खोजों के प्रति आश्वस्त दिखाई पड़ रहा है । अब गुफाओं के स्थान पर योग साधना के लिये Air Conditioned हाल चुने जाने लगे हैं ।और वन्य प्रान्तरों का एकान्त Hill Resorts में बदल चुका है।शरीर की सन्चालन प्रक्रिया के नाप -तौल के लिये हमनें आधुनिक मेडिकल इंस्ट्रूमेंट्स को अपना लिया है और ऐसा करना उचित भी है क्योकि विकास की गति सत्य -प्राप्ति की नवीन खोजों को स्वीकार कर लेने से ही संम्भव होती है । वैज्ञानिक चिन्तन हमारे रहन -सहन , खान -पान , रीति -रिवाज़ , उत्साह -समारोह और हमारी जीवन -म्रत्त्यु सम्बन्धी धारणाओं पर भी एक कल्याणकारी नजर डालनें में समर्थ है। बिना गहराई से जाँच किये सभी कुछ स्वीकार कर लेना हानिकारक हो सकता है पर बिना गहराई जाँच किये बहकावे में आकर किसी अच्छी प्रथा को छोड़ देना भी हानिकारक हो सकता है।इसलिए प्रज्ञा युक्त तर्क और संशोधन के लिए सहज मनोवृत्ति बनाकर ही हम अपनी परम्पराओं की उपादेयता की पहचान कर सकते हैं। जिस प्रकार सोच आकाश से नहीं गिरती वैसे ही परम्परायें भी किसी ईश्वरीय विधि -विधान से बनकर नहीं आतीं। विश्व के सभी श्रेष्ठ समाजशास्त्री आज इस बात पर सहमत हैं कि बीते कल में किसी मानव समाज के लिए जो उपयोगी था वह आज हानिकारक भी हो सकता है। प्रथाएँ , मान्यताएँ ,परम्परायें और यहाँ तक कि नैतिक अवधारणायें भी बहुत कुछ समय की दें होती हैं। सहस्त्रों वर्षों की विकास प्रक्रिया में मानव सभ्यता न जाने कितने टेढ़े -मेढ़े मार्गों से गुजर कर आयी है। हजारों लाखों मनुष्यों की नर -वालियाँ , हजारों लाखों नारियों का शरीर शोषण और हजारों लाखों धर्म मन्दिरों और संस्कृति स्मारकों का तहश -नहश मानव इतिहास का एक दुखद पहलू रहा है। इतिहास के अध्येता जानते हैं कि उजले पखवारे अधिक समय तक नहीं टिक पाये जबकि अन्धेरे का राज्य अटूट रूप से चलता रहा है। इस प्रकार की व्यवस्था में विशिष्ट भैगोलिक परिस्थितयों में और अपने समय के ऐतिहासिक सन्दर्भों में जीवन ,सम्पत्ति और मर्यादा की रक्षा के लिए नये -नये नीति विधान बनाये गए। अनेक आचरण पद्धतियाँ विकसित की गयीं और नर -नारी सम्बन्धों को नयी -नयी व्याख्याओं  में प्रस्तुत किया गया। यह ठीक है कि दूसरे विश्व युद्ध के बाद अभी तक युद्ध की विश्व व्यापी विभीषका से हम  बचे हुए हैं पर छोटे -मोटे पचासों  युद्ध  तो दुनिया में होते ही रहें हैंऔर होते ही रहेंगे। भारत विभाजन की विभीषका नें लाखों पंजाबी घरों में नयी सोच का संचार किया क्योंकि अपनी प्रगति और स्थापना के लिए नए सामाजिक सम्बन्धों की आवश्यकता थी।लाखों भारतीय आज योरोप ,अमेरिका और विश्व के अन्य देशों में जाकर बस कर अपनी सोच में परिवर्तन लाने की आवश्यकता को माननें पर विवश हो रहे हैं।जैसे -जैसे हिन्दी भाषा -भाषी समाज में आर्थिक प्रगति का विस्तार होगा और जैसे -जैसे टेक्नोलाजी पर आधारित उनकी जीवन शैली विकसित होगी उनकी रचना धर्मिता में परिवर्तन आना प्रारम्भ हो जायेगा। हम अपने पुराने और श्रेष्ठ रचनाकारों का आदर करेंगे और अपने समय के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लिखे गए उनके साहित्य के मूल्यों का सही आंकलन करेंगें पर हमें अपनी पीढ़ी और अपने युग के लिए नए मूल्यों की तलाश भी करनी होगी।किसी युग में बहु पत्नी प्रथा शायद समाज के लिये कल्याणकारी रही हो पर आज तो निश्चय ही यह विनाशकारी है। किसी युग में अबाध वंश ब्रद्धि शायद कल्याणकारी रही हो पर आज तो यह निश्चय  ही वांछनीय नहीं है । किसी युग में छुआ -छूत की प्रथा शायद सामाजिक सन्दर्भों में सार्थक रही हो पर आज तो वह निरर्थक बोझ ही है। किसी युग में अंग्रेजी का ज्ञान पश्चमी दासता का सूचक रहा हो पर आज  तो वह निश्चय ही ज्ञान -विज्ञान की प्रगति के लिए आवश्यक है। ऐसी ही अनेक धारणायें और मान्यतायें परिवर्तन की मांग करती हैं। अनावश्यक पशु बलि , अपढ़ ओझाओं और तान्त्रिकों में अन्ध विश्वास , प्रकृति के स्वाभाविक कार्यक्रम से होने वाले परिवर्तनों को किसी विशिष्ट मानव समूह के कर्मों का फल बताना यह सभी बातें वैज्ञानिक चिन्तन पर ही अपना खरा -खोटापन साबित कर सकती हैं। पुरातन संस्कृति को भी नयी शक्ति पाने के लिये नये आसवों की आवश्यकता है। माटी नूतन और पुरातन का आदर्श समन्वय चाहती है। घर के बड़े -बूढ़े विवेक पूर्ण मार्गदर्शन करते रहें और उनके बताये राह पर ओज भरी तरुणाई चलती रहे तभी किसी गृह का संचालन सफल माना जाता है। हन्दी भाषा -भाषी क्षेत्रों के लिये भी अपने प्राचीन और कालजयी मूल्यों की अगुवाई में नवीन नैतिक अवधारणाओं को शामिल करना होगा तभी निकट भविष्य में प्रगति की गाथा लिखी जाने लायक सफलता मिल सकेगी। हजारों वर्षों के लम्बे इतिहास में लाखों वर्ग मील फैले भारतीय महाद्वीप में बहुत कुछ ऐसा भी है जो शायद अब निरर्थक हो गया है। हम उसे बटोर कर एक कोने में रख देंगे। जो नयी विचार सामग्री हमें आज जीवन यापन के लिये आवश्यक लग रही है उसे हम स्वीकार कर एकत्रित करेंगें। पर समय परिवर्तन शील है। कोने में बटोर कर रखे हुये साज सामान में से कौन सी चीज कल हमारे काम आ जाये ऐसा ध्यान भी हमें रखना होगा। इसी प्रकार आज के सहेजे मूल्यों में आने वाले दिनों में कौन सा मूल्य निरर्थक हो जाय ऐसा मानने के लिए भी हमें तैयार रहना होगा।
                                                यूनानी साहित्य की बहुचर्चित गाथाओं में सिसीफस की कहानी से आप परिचित ही होंगे।सिसीफस पहाड़ की चोटी पर बार -बार पत्थर के एक विशाल टुकड़े को गोलाकार बनाकर टिकाना चाहता था। आकार देनें में तो उसे सफलता मिल जाती थी पर ज्यों ही वह गोलाकार विशाल प्रस्तर की निर्मित चोटी पर टिकाता वह वर्तुल आकार लुढककर नीचे पहुँच जाता ।  जीवन भर सिसीफस इस कठिन कार्य में लगा रहा पर हर बार उसका यह प्रयास लुढ़कन की राहों से चलकर तलहटी पर पहुँच गया। आज के युग में सिसीफस को विशालकाय वर्तुल प्रस्तर खण्ड को टेक्नोलोजी की मदद से उत्तुंग शिखर पर टिका देने की सफलता मिल जाती। बीते कल की कल्पना उड़ाने आज का ठोस सत्य बन रही हैं। माटी ईश्वर की अपार कृपा में विश्वाश रखती है और माटी परिवार प्रभु से माँगता है कि उसके द्वारा तराशी गयी शब्द आकृतियाँ आदर्श की ऊँचाइयों पर स्थायी रूप से टिकी रहें।'माटी परिवार 'सम्पूर्ण हिन्दी भाषा -भाषी क्षेत्र को अपनी बाहों में समेट  ले।

शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

क्या कहा मर्द हूँ मै, फौलादी छाती है , फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?

क्या कहा मर्द हूँ मै ,फौलादी छाती है
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?
इसलिए कि मैंने साथ सत्य का लिया सदा ,
पर पाया जग का सत्य सबल की माया है ।
नैतिकता ताकत के पिंजड़े में पलती है ,
आदर्श छलावे की सम्मोहक छाया है ।
मै बुद्ध ,गान्धी को पढ़ गलती कर बैठा ,
सोचा दरिद्र नारायण हैं ,पग पूजूंगा ।
अपनी मछली वाली चट्टानी बाहों में ,
ले खड्ग सत्य का अनाचार से जूझूंगा ।
थे कई साथ जो उठा बांह चिल्लाते थे ,
समता का सच्चा स्वर्ग धरा पर लाना है ।
सोपान नये जय- यात्रा के रचने होंगे,
गांधी दर्शन का लक्ष्य मनुज को पाना है ।
पर चिल्लाकर हो गया बन्द उन सबका मुख ,
इस लिये कि उनके मुँह को दूजा काम मिला।
हलवा- पूड़ी के बाद ,पान से शोभित मुख ,
दैनिक पत्रों में छपा झूठ का नाम मिला ।
वे कहते अब भारत से हटी गरीबी है ,
रंगीन चित्र अब अन्तरिक्ष से आयेगें ।
अब उदर-गुहा में दौड़ न पायेंगे चूहे ,
भू कक्षा में वे लम्बी दौड़ लगायेंगे।
वे कहते बहुतायत की आज समस्या है ,
भण्डार न मिल पाते भरने को अब अनाज।
सब भूमि- पुत्र लक्ष्मी -सुत बनकर फूल गये ,
दारिद्र्य अकड कर बैठ गया है पहन ताज
छह एकड़ का आवास उन्हें अब भाता है ,
गृह- सज्जा लाखों की लकीर खा जाती है ।
हरिजन -उद्धार मन्च से अब भी होता है ,
हाँ बीच -बीच में अपच जँभाई आती है ।
मै आस -पास गिरते खण्डहर हूं देख रहा ,
सैय्यद चाचा का कर्जा बढ़ता जाता है।
प्रहलाद सुकुल ने खेत लिख दिये मुखिया को,
धनवानों का सूरज नित चढ़ता जाता है ।
चतुरी की बेटी अभी ब्याहने को बैठी ,
पोखरमल के घर रोज कोकिला गाती है।
क्या कहा मर्द हूँ मै फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रूलाई क्यों रह -रह कर आती है ?
कल के जो बन्धु -बान्धव थे ,थे सहकर्मी ,
सत्ता का देने साथ द्रोण बन भटक गये।
है उदर- धर्म पर बिका धर्म मानवता का ,
सच्चाई के स्वर विवश गले मे अटक गये।
युग़- पार्थ मोह से ग्रस्त खडा है धर्म छेत्र ,
है उसका क्या कर्तब्य न अब तक भान हुआ।
गाण्डीव शिथिल सो रहा पार्ष्व में अलसाया ,
चुप है विवेक का कृष्ण न गीता ज्ञान हुआ।
ताली पर देकर ताल थिरकते हैं जनखे ,
सत्ता- कीर्तन अब अमर काब्य कहलाता है।
भाषा भूसा बन गयी ,बीन भैंसे सुनती ,
हर क्षीण-वीर्य गजले गा मन बहलाता है।
वर्ण्-युक्त देह सतरंगी साड़ी से ढककर ,
कविता कामाक्षी कृमि बटोरे कर लाती है।
क्या कहा मर्द हूँ मै, फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?

सोमवार, 19 नवंबर 2012

घृणा से ही जन्म लेगा सर्व दर्शी प्यार

   तोड़ना है मुझे प्रस्तर का प्रचण्ड प्राकार 
   ताकि बंधकर छटपटाती है परिध में जो 
   बहें उन्मुक्त जीवन - दायिनी रस -धार । 
   है सरल विध्वंश कहते मुकुटधारी 
   तुम करो निर्माण 
   शीत ,आतप ,बूँद सर पर ही सहे हैं 
   सहस बरसों से 
   खपाये हैं तुम्ही ने प्राण 
   और छत किनको मिली है ?
   तोड़ना है छत ,परिधि .प्राचीर
   जहाँ संरक्षित लुटेरे ,मुफ्तखोरे 
   स्वयं को कहते सुधन्वा वीर।
   हर मनुज यदि जन्म लेगा तो जियेगा 
   ज्ञान का ,विज्ञान का ,यह शुद्ध ,सुन्दर मर्म 
   जो ब्यवस्था सत्य यह दफना रही है 
   तोड़ना उसका सभी का धर्म ।
   उभय कर ऊपर उठाये मै प्रतिश्रुत हो रहा हूँ आज 
   जनम सार्थक कर सको तो आज कर लो 
   राम का यह काज ।
   रँगी मूंछे ,लपलपाती जीभ 
   यह डरौना है ,न तन में तान 
   स्वास्थ्य का सरगम नहीं संगीत यह 
   क्षय -क्षरित द्रुत म्रत्यु का यह गान 
   इस डरौने पर करो तुम बज्र -मुष्टि प्रहार 
  भित्ति की हर ईंट बनकर ढह गिरेगी क्षार 
  उग रहे सूरज तुम्हारी साक्षी 
  ध्वंस हो निर्माण का आधार 
  डूबते सूरज तुम्हारी शपथ ले कर कह रहा हूँ 
  घृणा से ही जन्म लेगा सर्व दर्शी प्यार ।

रविवार, 18 नवंबर 2012

आइये हम मृत्यु को ललकारने की हिम्मत पा लें

                         भारत की सांस्क्रतिक परम्परा और धार्मिक प्राणपरता यह मान कर चलती है की मनुष्य का जीवन प्रभु की एक दुर्लभ देन है ।गोस्वामी जी की इस पंक्ति से तो आप ,हम सब परिचित ही हैं -"बड़े भग्य  मानुस तन पावा।"प्राक्रतिक विज्ञान भी यह मानकर चलता है की मानव अरबों वर्षों की विकास प्रक्रिया का चरम प्रतिफल है।अब यदि मनुष्य होकर भी हम मात्र अपने लिये जीते हैं तो इस जीनें  में और पशु जीवन में अंतर ही क्या ?मुझे चार्ल्स डिकन्स की बहुचर्चित कहानी क्रिसमस कैरल की याद आती है जिसमें एब्ने क्रूज को जब उसके मित्र पावल गोन का भूत मिलता है और उससे अपनी आत्मा की दारुण व्यथा की बात करता है तो एब्ने क्रूज उससे कहता है कि तुम तो एक अत्यन्त सफल व्यापारी थे इस पर ईथर में गूँजता उसके मृत मित्र का उत्तर आता है -कैसा व्यापारी ?मैनें मानव जाति के लिये क्या किया ?मैंने अपने अतिरिक्त दूसरों के लिये क्या कभी त्याग या बलिदान का भाव पाला ।कैसा वैभव ?अपने इन्द्रिय सुख के अतिरिक्त क्या उस वैभव से मैंने वृहत्तर मानव कल्याण की संयोजना की ।
                                                                                            बन्धुओं मानव जीवन निश्चय और अनिश्चय का एक ऐसा समुच्चय है जो विज्ञान की सारी चमत्कारी विशेषताओं के बावजूद अनुत्तरित है ।निश्चय इस लिये जो जन्मा है वह मरेगा अवश्य और अनिश्चय इसलिये कि उस महाप्रयाण की बेला गोधूलि की धुंधलके की  भाँति झिपी -अनझिपी रहती है।यही कारण है कि न जाने कितनी बार महामानव भी चाहते हुए कल की तलाश में बहुत कुछ नहीं कर पाते।हमें याद रखना है कि हमारे पास समय कम है और हमारे संकल्पों के यात्रा अत्यन्त कठिन और एक प्रकार अन्तहीन है।हमारे रास्ते में कितने ही मनमोहक पड़ाव आते हैं जहां रुकने का मन होता है।हम विचलित होते हैं अपने लक्ष्य पद से और सुहावन मरीचकाओं में भटकते हैं।हमें राबर्ट फ्रास्ट की उन अमर पंक्तियों को कभी नहीं भूलना चाहिये जिन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी राइटिंग टेबिल ग्लास के नीचे लगा रखा था।
 "The woods are lovely dark and deep
But I have promises to keep
And miles to go before I sleep
And miles to go before I sleep"
अभी कहाँ आराम बदा,यह मूक निमंन्त्र्ण छलना है ।
अरे अभी तो मीलों मुझको ,मीलों मुझको चलना है ।।
                         बन्धुओ अपने को दूसरों से बड़ा मानने का भाव अहंकार से जन्मता है और अहंकार सामाजिक समर्पण के रास्ते में रूकावट बन कर खड़ा हो जाता है इसलिये यह कहना कि हमारा जीवन अन्य लोगों के मुकाबले में कहीं अधिक स्वच्छ और सुथरा होना चाहिये ,शायद उपदेश की सी बात लगे पर इसमें दो राय नहीं हैं कि भारतवर्ष का लगभग समूचा तन्त्र जाल प्रशासन की भ्रष्ट लाल फीताशाही में फंसा हुआ है ।भ्रष्टाचार मिटाने के न जाने कितने संकल्प शीर्षस्थ पर बैठे राजनीतिज्ञों के किये थे और करते जा रहे थे पर भारत का हर सामान्य नागरिक यह मान कर चल रहा है कि प्रशासन की स्वच्छता एक असंभव उपलब्धि बनती जा रही है।असंभव   को संभव कर दिखाना असाधारण साहस की मांग करता है।उस साहस को उत्पन्न किया जाता है जन चेतना जगाने वाली सामाजिक संस्थाओं ,संगठनों ,क्लबों और प्रकाशनों के द्वारा।अर्नाल्ड ट्वायनबी नोबेल पुरस्कार विजेता इतिहासकार कहते है कि असाधारण जन नायक एक विशिष्ट चेतना से भरी सामाजिक गुणवत्ता के उपज होते हैं।हम इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं।हमारा आचरण ,हमारी भाषा ,हमारा व्यवहार ,हमारी सेवा वृत्ति और हमारी निर्मलता ,क्रांतिकारी चारित्रिक पवित्रता को जन्म दे सकती है।असत्य के खिलाफ भीरु बन कर बैठे रहना,घोर अनाचार के प्रति उदासीन रहना और ऐन्द्रिक कर्दभ में गले तक डूबे रहना भारतीय समाज का अभिशाप हो चुका है।आइये हम अपने भीतर वह शक्ति पैदा करें कि हम किसी भी अनुचित दबाव के आगे नो कहने की हिम्मंत रखें।निहारिकाओं से भरा आकाश हमारा लक्ष्य हो।नाबदान के गलीज में बुद बुद करते कीड़ों को मानव जीवन की अस्मिता का ज्ञान नहीं होता।प्रकाश का दिब्य पुन्ज,पावनता का दिब्य आलोक हमारे चारो ओर व्याप्त है यदि हममें आत्म मन्थन कर उसे पाने की शक्ति है।सभी कुछ परिवर्तनशील है।आज का यह कदाचार,यह तुच्छता ,यह राजनीतिक लम्पटता चिरस्थाई नहीं है।परिवर्तन सनातन है।कविवर पन्त ने परिवर्तन को वर्तुल वासुकिनाद का रूपक देते हुए लिखा है :-
                                         "  शत शत फेनोच्छासित स्फीत फुत्कार भयंकर।
                                           घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर ।।
                                            विश्व तुम्हारा गरल दन्त कन्चुक कल्पान्तर ।
                                           अखिल विश्व ही विवर ,वक्र कुन्डल दिग मण्डल ।।  
                                           अये वासुकि सहस्त्र फन "
                                          मित्रो मुझे आप भले ही अतिरिक्त आशावादी कहें पर मुझे क्षितिज पर नये प्रभात की अरुणिमा का आभास हो रहा है।घोर जाड़े के बाद भी तो  वसन्त   का शुभ आगमन होता है।
"If winter comes can spring be for behind."
                           आइये हम नये युग के सार्थवाह बने।आइये हम म्रत्यु को ललकारने की हिम्मत पा लें ताकि जो अम्रत है,जो सत्य है ,जो सनातन है ,ऐसा शुद्ध परमार्थ भाव हममें जग सके।मेरा विश्वाश है कि माटी परिवार अपने चरण चिन्हों की ऐसी छाप अपने भू क्षेत्र में छोड़ सकेगा जिसका अनुसरण करके मानव जीवन को उद्देश्य प्राप्ति हो सके।
                                                    "O God !Illumine what is dark in me ."

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

मरुथल की छाती फोड़कर निकलने वाला जीवन्त अंकुर किसी सिचाई की मांग नहीं करता।

योरोपीय सभ्यता प्राचीन यूनानी सभ्यता को अपने आदि स्रोत के रूप में स्वीकार करती है। निसन्देह ईसा पूर्व यूनान में विश्व की कुछ महानतम प्रतिभायें देखने को मिलती हैं। सुकरात ,प्लेटो (अफलातून )और अरिस्टों टल (अरस्तू )का नाम तो शिक्षित समुदाय में सर्वविदित ही है पर बुद्धि परक मीमांसा का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ प्राचीन यूनानी प्रतिभा ने अपनी अमिट छाप न छोड़ी हो इसी प्राचीन यूनान में स्पार्टा के नगर राज्य में मानव शरीर की प्राकृतिक विषमताओं से लड़ने की आन्तरिक क्षमता को मापने का एक अद्धभुत प्रयोग किया था। ऐसा माना जाता है कि स्पार्टा नगर राज्य में जन्म लेने वाला प्रत्येक शिशु नगर के छोर पर स्थित एक विशाल समतल प्रस्तर पर निर्वस्त्र छोड़ दिया जाता था । दिन रात के चौबीस घन्टे उसे अकेले चीखते,चिल्लाते छांह ,धूप ,प्रकाश,अन्धकार और कृमि कीटों से उलझते -सुलझते बिताने पड़ते थे । आंधी आ जाय या मूसलाधार वर्षा उसे आठ पहर ममता रहित उस चट्टान पर निर्वस्त्र काटने ही होते थे । इस दौरान यदि प्रकृति उसका जीवन समाप्त कर दे तो स्पार्टा का प्रशासन उसे मात्र भूमि की माटी में अर्पित कर देता था और यदि वह बच जाय तो उसका हर प्रकार से लालन -पालन कर उसे स्पार्टा नगर राज्य का समर्थ चट्टानी पेशियों वाला जागरूक नागरिक बनाया जाता था ।प्राचीन इतिहास के मनीषी पाठक जिन्होंने विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं का गहनतम अध्ययन किया है जानते ही हैं की स्पार्टा नगर राज्य और एथेन्स  के नगर राज्य में बहुत लम्बे समय तक संघर्ष की स्थिति रही थी और अन्तत :अपनी सारी सम्रद्धि ,वैभव और ज्ञान विपुलता के बावजूद स्पार्टा का पलड़ा भारी रहा था । हमें स्वीकार करना ही होगा कि मरुथल की छाती फोड़कर निकलने वाला जीवन्त अन्कुर किसी सिचाई की मांग नहीं करता। ब्यक्ति का आन्तरिक सामर्थ्य जिसमें शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का कान्चनमणि संयोग शामिल है उसे जीवन संग्राम में अपराजेय योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करती है। काया का बाह्य आकार अन्तर की विशालता का प्रतीक नहीं होता।शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता किन्ही उन आन्तरिक शक्तियों से प्रतिचालित होती है जिन्हें मानव के वरण -अवरण की प्रक्रिया के द्वारा लाखो -लाख वर्षों में पाया है।बौद्धिक कुशाग्रता और जिसे हम प्राण शक्तियां प्राणवत्ता के रूप में जानते हैंवो  भी चयन -अचयन की लाखों वर्षों की दीर्घ प्रक्रिया से गुजर कर आयी है। हर श्रेष्ठ मानव सभ्यता  प्राचीन या अर्वाचीन इसी विरासत में पायी असाधारण आन्तरिक क्षमता को प्रस्फुटन -पल्लवन का काम करती है ।पोषण ,सिंचन और संरक्षण पाकर भी कुछ लता ,पादप- तरु थोड़ा बहुत बढ़कर सीमित विकास को समेटे विलुप्त होने की सनातन प्रक्रिया का अंश बन जाते हैं।और कुछ हैं जिन्हें ओक ,बरगद और देवदार बनना होता है। शताब्दियाँ उनको छूकर निकल जाती हैं और वे सिर - ताने खड़े रहते हैं।पर आकार की विशालता ही श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है। रग पेशियों की द्रढ़ता प्रभावित अवश्य करती है पर सनातन नहीं होती।कुछ पैरों से निरन्तर दलित,मलिन होने वाली वनस्पति प्रजातियाँ भी हैं जो काल की कठोर छाती पर अपनी कील ठोंककर अजेय खड़ी हैं।विनम्र घास और सदाबहारी निरपात और प्रान्तीय लतायें इसी श्रेणी में आती हैं। सनातन धर्म वाले सनातन  भारत का विश्व को यही सन्देश है कि केवल आन्तरिक ऊर्जा,दैवी स्फुरण , प्रज्ञा पारमिता या समाधिस्त संचालित जीवन ही काल को जीतकर अकाल पुरुष तक ले जाता है ।      

             व्यक्ति का चाहना या न चाहना निर्मम प्रक्रति के विस्मयकारी और अबाधित गतिमयता में कोई परिवर्तन ला पाता है इस पर मुझे सन्देह है।पर यदि चाहना का कोई सकारात्मक प्रभाव होता है तो मैं चाहूँगा कि माटी अपनी अमरता अपने कलेवर में समेंट लेने वाली मन्त्र -पूत सामिग्री से सन्चित करे निर्वात दीप्त शिखा की भांति प्रकाश पुंजों की श्रष्टि ही उसके साधन बने और साध्य भी।आकाश गंगा की तारावलियां और ज्योतित पथ उसे अमरत्व का ऊर्ध्वगामी पथ दिखायें -इसी कामना के साथ ।