शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

पहले अंडा या मुर्गी ढाक के वही तीन पात

                         यिज्ञान और टेकनालाजी अपने में विकास के अपार संभावनाए छिपाये है ।पिछले डेढ़ -दो दशक में संसार ने जितना परिवेर्तन देखा है उतना पिछली कई शताब्दियों में भी संभव नहीं हो पाया था ।जब औद्योगिक क्रान्ति अपने चरम पर पहुँच चुकी थी ।तब ऐसा लग रहा था कि मध्य युगीन व्यवस्था बहुत कुछ आदिम सभ्यता का ही प्रतिरूप है ।पर आज सूचना प्रौद्योगिकी ,कम्प्यूटरीकरण और अन्तरिक्ष प्रसार पद्धतियों में औद्योगिक क्रान्ति को आदिम सभ्यता के विकास की एक छोटी मंजिल के रूप में ही प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया है ।बहु विध्य पाठकों को यह बताने की आवश्यकता "माटी "नहीं समझती कि आने वाले वर्षों में कागज़ का प्रयोग नाम -मात्र को ही रह जायेगा ।इलेक्ट्रानिक मीडिया ही विश्व सम्पर्क का सबसे सशक्त संचार साधन बन कर उभर चुका है ।पर कागज़ पर लिखे शब्द हों या स्वचालित परदे पर उभरे ट्वीट ब्लॉग ,ट्वीटर या प्रशासनिक प्रचार तथा सांख्यिक गड़नायें सबमे शब्द और अंक के महत्व को पूरी महत्ता के साथ स्वीकार हे करना पड़ेगा।चिंतन का मूर्त रूप शब्द या सांकेतिक शब्द चिन्हों के द्वारा ही संभव है ।और इसलिये सम्प्रेष्ण का प्रकार बदल जाने पर भी सम्प्रेष्ण की अनिवार्यता या महत्ता कभी कम नहीं हो सकती।गहन चिंतन और गहन भावानुभूति के सम्राठों को तकनीकी नवीनताएँ कुछ देर के लिये भ्रमित भले ही कर दे पर उनके पास जो अक्षय कोष है उसकी भागीदारी के बिना मानवता के उज्वल भविष्य की कल्पना ही नहीं की जा सकती।विज्ञान ने भी इधर हाल ही में अत्यन्त गहरे दार्शनिक प्रश्नों के कुछ विज्ञान सम्मत उत्तर प्रस्तुत किये है ।दर्शन का सबसे मूल प्रश्न है जीवन के आविर्भाव की गुत्थी को सुलझाना।अंग्रेजी में बहुधा फिलासफी के विद्यार्थियों से प्रश्न पूंछा जाता है कि पहले अंडा या मुर्गी ।अब यदि मुर्गी नहीं थी तो अंडा कहाँ से आया ?और यदि अंडा नहीं था तो मुर्गी कहाँ से आयी ?और यदि कुछ नहीं था तो न कुछ में से कुछ कैसे पैदा हो गया ?महर्षि भारद्वाज से लेकर यूनान के अफलातून तक और ब्रिटेन के बर्टेंड रसल से लेकर भारत के राधाक्र्ष्णन तक सभी ने इन प्रश्नों के अपने अपने उत्तर प्रस्तुत कियें हैं ।ब्रिटेन में अभी हाल ही में अत्यन्त उच्च स्तरीय प्रयोगशाला परीक्षणों में यह पाया गया है कि मुर्गी के अंडे के ऊपर जो कडा छिलका होता है वह जिस प्रोटीन से बनता है वह प्रोटीन केवल एक मुर्गी के भीतर ही बन सकता है।इस प्रोटीन का वैज्ञानिक नाम Ovocleidin-17 है और यह प्रोटीन ही मुर्गी के अंडे के ऊपर एक कड़ा खोल बना सकती है ।अब अगर यह प्रोटीन मुर्गी के भीतर ही बन सकता है तो स्पष्ट है कि मुर्गी को पहले होना चाहिये और अंडे को बाद में बात अगर यहीं तक रहती तो शायद  समस्या का हल हो गया होता पर फिर  प्रश्न उठता है कि यदि अण्डा नही था तो मुर्गी कहाँ से आयी ?समस्या हल भी हो गयी और हल में से समस्या फिर उठ खड़ी हुयी।विकासवादी वैज्ञानिक यह कहते हैं कि शायद  प्रोटीन Ovocleidin-17अपने गैर ठोस या तरल रूप में धरती के वातावरण में कहीं फ़ैली हुई थी और उसी ने सबसे पहले कुछ अज्ञात कारणों से अन्डे का रूप लिया होगा ।अब समस्या खड़ी होती है उन अज्ञात कारणों के निरूपण की ।ढाक के वही तीन पात फिर जहां के तहाँ अब विज्ञान के शोधार्थी और आगे बढ़ते है वे कहते है कि हर अण्डा एक प्रकार का नहीं होता अण्डों का बनना मुर्गी के अण्डों के बनने सेबहुत  पहले शुरू हो चुका था ।अलग -अलग पक्षी अलग अलग किस्म की प्रोटीन से अपने अंडे बनाते हैं।दरअसल समस्या पक्षी जगत से बहुत पीछे हमें उस काल में ले जाती है जब डायनासोर धरती के अधिकाँश भागों में फैले थे ।यह सरीस्रपों का ज़माना था और वे भी अण्डों के द्वारा ही म्रत्यु की अमिट विभीषिका को मिटाकर नयी स्रष्टि को जन्म देते थे ।पक्षी जगत तो इन्ही सरीस्रपों से विकसित होकर लाखों वर्ष बाद अस्तित्व में आया ।अन्डे बनाने वाली प्रोटीन की कई किस्में पहले से ही स्रष्टि की अद्दभुत प्रयोगशाला में उपस्थित थी और बाद में इन्ही प्रोटीनों में से Ovocleidin-17एक नया रूप लेकर अस्तित्व में आयी ।यह विकासवादी वैज्ञानिक कहते हैं कि मुर्गी और अन्डे वाला प्रश्न वैज्ञानिक सन्दर्भों में अधिक सार्थक नहीं लगता ।न तो अण्डा पहले था न मुर्गी ।इनसे बहुत पहले थे सरीस्रपों के नाना रूप और आकार। दैत्याकार ,मध्यम ,लघु तथा द्रश्य और अद्रश्य अनगिनित जीवकणों की अप्रतिहत अविरल अनन्त कोटि धारा प्रवाह के अस्तित्व को ही वैज्ञानिक उत्तर के रूप में ही स्वीकारना चाहिये।वैज्ञानिक शोधकर्ताओं के लिये और विकासवादी पण्डितों के लिए यह विस्मयकारी वैज्ञानिक उत्तर प्रणाली भले ही शोध संतोष प्रदान कर दे पर हम सामन्य जनों के लिये तो यह प्रश्न अबूझा ही खडा है कौन पहले था अण्डा या मुर्गी।गहरायी से इस प्रश्न पर झाँक के देखें तो इसमें वेदान्त का सबसे गूढ़ प्रश्न छिपा हुआ है ।जीवात्मा और जीवात्मा को परिवेष्ठित करने वाला कलेवर इन दोनों में से प्राथमिक कौन है ।सबसे पहले दैव है या पदार्थ और क्या दैव और पदार्थ अनन्य रूप से जुड़े तो नहीं हैं ।"माटी "का सम्पादक तो माटी में ही मानव जीवन की अनन्य संभावनायें तलाशने में लगा है और 'माटी "को ही ब्रम्ह का प्रतीक मान कर उसकी पूजा अर्चना की आराधना करता है।ज्ञान -विज्ञान ,धर्म -धारणा ,स्पन्दन और स्तंभ्भन ,शुक और शायिका सभी में उसे मृत्तिका में घुले -मिले परमतत्व के दर्शन होते हैं ।ऊर्ध्वगामी अंकुरों को मेरा नमस्कार समर्पित है।

                                                                                                              गिरीश कुमार त्रिपाठी
                                                                                                         

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