बचे कैसे कि पानी आ गया सर के ऊपर तक
अमन के खा गये दाने अमन के ही कबूतर तक भलाई की करें उम्मीद क्या इन रहनुमाओं से
बुराई में सने बैठे है जब गांधी के बन्दर तक
चलो, चलते रहो चलने से ही गंतव्य पाओगे
नदी बहती हुई इक दिन पहुचती है समंदर तक
लगन हो आस्था हो प्रेम हो विश्वास हो दिल में
पिघलते से नज़र आयेगे तुमको यार पत्थर तक
मुसलमाँ हूँ मगर अब्दुल हमीद ऐसा मुसलमाँ हूँ
मिरा ये कौल पहुचा दो वतन के एक इक घर तक
........ शाइर ए वतन "डॉ रसूल अहमद सागर"
रामपुर