छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के चपरासी से कम वेतन पा रहे है निजी महाविद्यालय के प्रवक्ता.जी हां ये बात एकदम १०० फीसदी सत्य है.छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से सम्बद्ध निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी से भी कम वेतन पा रहे है.इस विश्वविद्यालय के निजी महाविद्यालय में पढाने वाले टीचर जो कला एवं विज्ञान स्नातक को पढाते है उनको ३ हजार से १० हजार के बीच वेतन इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको के द्वारा दिया जाता है बहुत से महाविद्यालय के प्रबंधक तो पूरे साल में टीचर को केवल १० या ११ महीने तक का ही वेतन देते है.अब जरा ये जाने की ये ५ से १० हजार का वेतन किन टीचर को दिया जाता है -ये वो टीचर है जिनका विश्वविद्यालय में अनुमोदन है.जी हां ये टीचर नेट ,पी-एच०डी ० और एम् ० फिल ० धारक होते है.इन महाविद्यालय में जो टीचर गैर अनुमोदित होते है उनको २ हजार से ५ हजार के बीच में वेतन दिया जाता है.गैर अनुमोदित टीचर से यहाँ मतलब है वो टीचर जो परास्नातक करके इन महाविद्यालय में शिक्षण कार्य कर रहे है.गैर अनुमोदित टीचर को महाविद्यालय के प्रबंधक द्वारा पूरे साल में केवल ६ से ८ महीने तक ही वेतन दिया जाता है.अगर इस विश्वविद्यालय में काम करने वाले नियमित चपरासी का वेतन देखे तो चपरासी का वेतन शायद आप निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन से दुगुना देखेगे.
असल में निजी महाविद्यालय प्रबंधको की उच्च शिक्षा की दुकाने है जहां डिग्री बिकती है.इन निजी महाविद्यालय के खिलाफ विश्वविद्यालय भी कुछ नहीं करता क्योकि इन निजी महाविद्यालय में विश्वविद्यालय के कर्मचारी और कूटा के सदस्यों के रिश्तेदारों की उच्च शिक्षा की दुकाने सजी हुयी है.एक सत्य यह भी है अगर शासन इन निजी महाविद्यालय के टीचर के वेतन के संशोधान के लिए कुछ करता भी है तो हो सकता है की ये दूकानदार हड़ताल कर दे.
आज आवश्यकता है कि सभी टीचर्स मिलकर इस इन कालाबाजारी करे वाले दूकान दरो की दुकाने बंद कराएं.
सूबे की मुखिया जी सब कुछ चुप चाप देख रही है क्योंकी इसी विश्वविद्यालय में उनके विधायको ,मंत्रियो के शिक्षा की दुकाने भी सजी हुयी है.
