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रविवार, 2 दिसंबर 2012

माटी की विरासत (गतांक से आगे )

  ' माटी 'परिवार विदेशी परम्पराओं के अन्धानुकरण में विश्वाश नहीं रखता ।वह औपनिशिदिक युग की विवेक और मीमान्सा पद्धति में विश्वास करता है ।ब्रम्हाण्ड के मूल में क्या है यही प्रश्न तो केनोपनिषद नें उठाया था ।केना का अर्थ है किसके द्वारा अर्थात वह कौन सी परमशक्ति है जो चेतन- अचेतन को गतिमान या नियन्त्रित करती है और फिर त्रिकालदर्शी श्रुतिकार स्वयं उत्तर प्रास्तुत करतें हैं ये वह शक्ति है जो मस्तिष्क को चिन्तन शक्ति से सुनियोजित करती है ।यह स्वयं में मष्तिष्क की  विचार सीमा से परे है पर मानव मष्तिष्क को अपनी असीमित ऊर्जा का एक अन्श देकर यह गतिमान करती रहती है ।यही शक्ति आँखों को द्रष्टि देती है ,कानों को श्रवण शक्ति  देती है और श्वांस प्रक्रिया का नियमन करती है ।इन्द्रियों की गतिमयता और क्रियाशीलता उसी परम शक्ति से संचालित है और यही कारण है कि मष्तिष्क चिन्तन के श्रेष्ठतम क्षणों में उस शक्ति का अभाष करके भी उसका सम्पूर्ण आंकलन नहीं कर पाता ।एक कौंध भरी झलक उसे यह अहसास तो कराती है किसी ब्रम्हाण्ड व्यापी परमसत्ता के कौतूहलपूर्ण प्रचलन प्रक्रिया का ।यह अहसास मानव जनित किसी भी भाषा में सम्पूर्णत :व्यक्त नहीं हो पाता ।इस अहसास को प्रत्येक व्यक्ति अपनी आंन्तरिक क्षमता के अनुरूप अनुभव करता है और यदि सदाशयी और आत्म प्रेरित ऐसे कुछ व्यक्ति मिल बैठे तो उच्च आदर्शों से प्रेरित एक नयी चिन्तना का प्रकाश फ़ैल उठता है ।भारत में एक लम्बे काल से कार्यरत कई प्रकाशन मनोंभूमि में नयी ऊर्जा लाने का काम नहीं कर रहें हैं ।वे भूंडी सम्पन्नता का प्रदर्शन करते हैं और विदेशी संस्कृति के क्रीतदास बनते जा रहें हैं ।भोग वादी व्यवस्था इन मण्डलियों में चरम परिणित पर पहुँच चुकी हैं भले हे वह समाज सेवा और विपन्नता उन्मूलन की चादर ओढ़े हुये हों ।"माटी "भारत की उभरती प्रतिभा को जीवन्त आदर्शों की ऊर्जा से अनुप्रेरित करने के लिये आगे आयी है ।प्रतिभा अपनें में देश काल और प्रस्तार की सीमाओं से परे होती है उसे कटघरे में बाँध कर नहीं रखा जा सकता पर उसे यदि मानव कल्याण की ओर प्रेरित कर दिया जाय तो उसमें अपार संभावनायें छिपी रहती हैं ।यदि प्रेरक शक्ति बचकाने चिन्तन की उपज हो और यदि उसमें इन्द्रिय विलास का रसायन घुला हो तो प्रतिभा मानव जाति के लिये वरदान की जगह अभिशाप भी बन सकती है ।अन्तर्राष्ट्रीय जगत में इतनें उदाहरण हैं नकारात्मक चिन्तन और नकारात्मक शक्ति प्रयोग के जिन्होंने मानव जाति का अकल्पनीय अहित किया है ।भारत के सन्दर्भ में भी इस प्रकार के अनेक खलनायक और चारवाकीय चिन्तक पाये जाते है ।पर भारत की सबसे अनूठी विशेषता रही है पथ भ्रमित विस्फोटक प्रतिभा पर कल्याणकारी मानवीय मूल्य पद्धति का नियन्त्रण ।यह मूल्य पद्धति धर्म ,नैतिकता ,आत्माहुति और तपश्चरण आदि कई नामों से व्यक्त होती रही है ।परतन्त्रता के काल में एक लम्बे दौर से गुजरनें के बाद भारतीय जीवन मूल्य की चमक जब कुछ धीमी पड़ी थी तब इसे फिर से प्राच्छालन पद्धति द्वारा बंकिम चन्द्र ,राम मोहन राय ,सुब्रमणयम भारती ,आदि आदि ने प्रान्जलता प्रदान की थी और फिर तो   महापुरुषों का एक युग ही शुरू हो गया ।बलिदान, त्याग और आत्म उत्सर्ग की होड़ लग गयी ।राष्ट्रीय गौरव के लिये सब कुछ निछावर करने की भारतीय ऋषि परम्परा अपने सम्पूर्ण वेग से उभर पड़ी । पर      आज स्वतन्त्रता के बाद एक बार फिर हमारे जीवन की ,हमारे जीवन मूल्यों की वेगमयी धारा शैवाल भरे वर्तुल चक्रों में फंस गयी है ।हम हीन भाव से ग्रस्त हो रहे हैं ।हमारी मातायें ,बहनें बेटियाँ नारी शरीर  के सौन्दर्य का बाजारीकरण  मन्त्र अपनानें लग गयीं  हैं ।तभी तो कविवर पन्त को लिखना पड़ा "आधुनिके तुम और सभी कुछ एक नहीं तुम नारी "

                                                     सौन्दर्य प्रसाधनों का बाजार भारतीय विश्व सुन्दरियों के बलबूते पर फलनें -फूलनें लगा है ।महिलायें कभी बृद्धा न बनना चाहें यह तो समझ में आ सकता है पर पुरुष भी हास्यास्पद वासना से प्रेरित होकर सदैव तरुण ही बना रहना चाहें ये पाश्चात्य क्लब सभ्यता की विशेष देन ही है ।प्रत्येक माटी -पाठक को इस पतनशील मनोंवृत्ति को रोकनें के लिये प्रतिबद्धित होना पड़ेगा ।बालपन का अपना सौन्दर्य है और तरुणाई का अपना शक्ति प्रस्तार। पर वार्धक्य भी एक गौरव की बात ही है अवमानना ,तिरस्कार या उपेक्षा की नहीं। सतत ऋषि साधना से ही भारत की सामूहिक आयु  रेखा अन्तर्राष्ट्रीय जीवन रेखा से ऊपर जा सकेगी ।हम मात्र कैप्सूल और इंजेक्शन लेकर ही लम्बे जीवन की कामना न करें वरन सहज जीवन शक्ति को प्रकृति के सामन्जस्य पूर्ण सहभागी बनकर प्राप्त करें।तभी तो सुदूर सहस्त्रों वर्ष पूर्व वृक्षों की अविरल व्यूह रचना में बैठे या सरिता तटों पर विचरते ऋषि ने गाया था -
                                                                  "जीवेन शरद : शतम
                                                                     श्रणुयाम शरद :शतम
                                                                    पुब्रयाम शरद :शतम
                                                                  अदीन :शाम शरद :शतम ।।"
                                           यह है भारतीय जीवन की कामना विकलांग ,पलंग सेवी निष्क्रिय जीवन की नहीं वरन स्वस्थ्य निर्माण समर्पित उच्चतर सोपानों की ओर बढ़ते निरन्तर ऊर्ध्वगामी जीवन स्पन्दनों की । और भारत ही नहीं पाश्चात्य संस्कृति में आशावादी कवियों का स्वर बुढ़ापे को नकारात्मक द्रष्टि से न लेकर सहज स्वीकारता हुआ हमें अपनी ओर बुलाता है
                                                       " Grow old along with me
                                                           for the best in yet to come
                                                          the last for which the first was made ."       

रविवार, 25 नवंबर 2012

हम माटी के रचनाकार और पाठक सृजन की रहस्यमयी ईश्वरीय सृष्टि में कुछ और ज्योतिपुंज जोड़ सकेंगें?

                                            हिन्दी  भाषा में स्तरीय साहित्य का सृजन करने वाली प्रतिभा अभी तक आर्थिक निर्भरता का पायदान नहीं सहेज पायी है ।विश्वविद्यालयों में लगाई गयी पुस्तकें और सरकारी अनुदानसे संरक्षित प्रकाशनों की बात छोड़ दें तो ललित साहित्य का लेखन हिंदी में अभी भी दो जून की रोटी जुटाने में असमर्थ है।राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त करने वाली लगभग चालीस करोड़ भारतीयों की मात्रभाषा         साहित्यकारों को यदि जीवन यापन का मूलभूत आधार भी प्रदान नहीं कर पाती तो हमें कंही गहरे जाकर हिन्दी -भाषा भाषियों की मनोवैज्ञानिक  टटोल करनी होगी।आश्चर्य है कि हिन्दी भाषा -भाषी मध्यवर्गीय शिक्षित परिवार अपनी मासिक आमदनी का एक प्रतिशत भी ललित साहित्य पर ब्यय करना नहीं चाहता।उसे अपनें अन्तर्मन की परिष्कृति के लिए श्रेष्ठ साहित्य की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती।वह हल्के फुल्के अखबारी चुटकुलों ,सिने तारिकाओं की प्रेम कहानियों और अपहरण और बलात्कार की नशीली खुराकों से अपने को एक भ्रामक छलना में घेर कर जीवन यापन करता रहता ह।उसे लगता ही नहीं कि भीतर का परिमार्जन उत्क्रष्ट विचारों और सर्वकालीन सांस्क्रतिक मूल्यों के विना संम्भव ही नहीं हो पाता।इसके पीछे हिंदी भाषा -भाषी प्रदेशों की भीषण गरीबी तो है ही पर साथ ही कहीं धार्मिक प्रवचनों की वाचिक परम्परा से निरंतर जुड़े रहने की अपरिहार्यता भी है ।उसे शताब्दियों से यही समझ दी जाती रही है कि धार्मिक प्रवचनों और दैनिक पूजा अनुष्ठानों से उसे आत्मदीप्ति मिल जाती है और बाकी अन्य ललित साहित्य कुछ विशेष पढ़ाकू या लिखाकू लोगों के बीच चर्चा के लिए ही लिखा जाता है।ऐसा संभवत :इसलिए भी रहा है कि परतन्त्रता के सैकड़ों वर्ष के लम्बे काल में पौराणिक कथा कहानियों और क्षेत्रीय साधुओं ,संन्तों और महन्तों के माध्यम से ही उन्हें भौतिक जीवन से परे मानव अस्तित्व के रहस्यात्मक पहलुओं से परचित कराया जाता था।स्वर्ग -नर्क,मोक्ष ,जन्म ,पुनर्जन्म ,वैभव ,दारिद्र्य ,वर्ग .वर्ण .लिंग और फेथ सभी कुछ एक बहुत पुरानी घिसी -पिटी तर्क पद्धति से भजनीकों और अर्ध शिक्षित ज्योतिषियों और पुरोहितों द्वारा सामन्य जन मानष में  भर दिए गए थे।वहां कोई तर्क नहीं था।वहां कोई प्रश्न नहीं था।वहाँ गणित की सम्पूर्ण समाधान क्षमता बतायी गयी बातों को सहज रूप से स्वीकार करनें में व्योहस्त होती थी।विपुल ब्रम्हाण्ड के विस्मय भरे रहस्य को जान लेने का अदम्य जीवट संजोये मानव मस्तिष्क की अपार क्षमता का घिसे -पिटे मार्ग के अतिरिक्त और भी कोई मार्ग हो सकता है ऐसा मानना शताब्दियों तक हिन्दी भाषा -भाषी समाज में असुरत्व की ओर बढ़ना माना जाता था।जीवन जीने की शत -शहस्त्र मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को एक काष्ठ घेरे में बन्द  कर किसी पूर्व निश्चित लीक पर चलने की बाध्यता ने हिन्दी भाषी समाज को काफी हद तक संवेदन शून्य बना दिया।ललित साहित्य को निरर्थक समझ कर उस पर किये गए व्यय को भी कही न कहीं लीक से अलग हटकर चलना मान लिया गया। यह धारणा इतनी गहरायी से अधिकाँश हिन्दी बोलने वालों के मन में जड़ें जमा चुकी हैं कि साहित्य पर किया गया व्यय अपव्यय के रूप में स्वीकृत हो चुका है।संभ्रांन्त ,प्रतिष्ठित ,अतिशिक्षित और उच्च पदस्त हिन्दी भाषा भाषी घरों में भी हिन्दी के ललित साहित्य की श्रेष्ठ रचनायें यदा कदा ही देखने को मिलती हैं।अंग्रजी में छपी भारतीय लेखकों की भारतीय परिवेश से नितान्त कटी  हुई किस्सा कहानियां  वहाँ वहुतायत से देखने को मिलेंगी पर हिन्दी के तरुण रचनाकारों की कोई भी पुस्तक वहां मिलना शायद मुमकिन ही  नहीं है ।यह बात दूसरी है कि ऊँची कक्षाओं में लगायी गयी कुछ उपन्यास ,कहानियाँ या आलोचना -ग्रन्थ वहाँ मिल जायँ ।
                                     व्यापार में सफल होने वाले लोग या राजनीति में तिकड़म से ऊँचाई में पहुचे हुये लोग शायद यह समझते हों कि कविता ,कहानी ,उपन्यास या साहित्य की ललित विधा के अन्य प्रकार विना प्रयास के ही जन्म ले लेते हैं।उनके लिये किसी साधना या लम्बे समय की मनोवैज्ञानिक तैय्यारी की आवश्यकता नहीं होती।उन्हें यह जान लेना चाहिये कि एक श्रेष्ठ कविता ,एक श्रेष्ठ कहानी ,एक श्रेष्ठ संस्मरण ,एक श्रेष्ठ औपन्यासिक कृति,एक श्रेष्ठ निबन्ध या लिखित अभिव्यक्ति का एक और कोई श्रेष्ठ आकार एक गहरी साधना और एक लम्बे समय की माँग करता है हाँ इसके लिये एक विशेष प्रकार की प्रतिभा भी अपेक्षित होती है जिसे प्रक्रति जन्य कहा जा सकता है।एक ब्रैड मैन ,एक सचिन तेन्दुलकर ,एक सोवर्स या एक धोनी निरन्तर अभ्यास के द्वारा ही श्रेष्ठता के शिखर पर पहुचें हैं पर मात्र अभ्यास या समय उन्हें उस ऊँचाई पर नहीं ले जा सकता जिस पर वे खड़े हैं।यदि उनमें नैसर्गिक खेल प्रतिभा न होती।अपने श्रेष्ठतम प्रदर्शन के दौरान क्रिकेट प्रेमी समाज उन्हें आदर और सम्मान के साथ ही साथ एक ऐसी आर्थिक सुद्रढ़ता भी प्रदान करता है जो उन्हें पूरे जीवन के लिये सशक्त और सामर्थ्यवान बना देता है।श्रेष्ठ साहित्यकार के लिये हिन्दी भाषा-भाषी समाज ऐसा क्यों नहीं कर पाता इस पर हमें मनन करना होगा।प्रेम चन्द्र जी और निराला जी का सारा जीवन अदम्य जीवट और भीषण  संघर्ष की कहानी रहा है ।जिन साह्त्यकारों का पारवारिक आधार आर्थिक रूप से सुद्रढ़ रहा हो उनकों छोड़ दें तो वाकी के लिये यदि आजीविका का अन्य कोई मार्ग नहीं है तो साहित्य रचना अभाव के संकट भरे द्वारों की ओर ही ढकेलती रहती है।विश्वविद्यालय या महाविद्यालय या माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षण कार्य पा जाने वाले साहित्यकार भले ही आर्थिक सुरक्षा पा जाते हों पर डिग्रियों की उच्चतम ध्वजा पताकाओं से दूर रहने वाले सैकड़ों सशक्त साहित्यकार अभाव का  दयनीय जीवन विताने पर विवश हैं।सरकार उनके लिये कुछ करे या न करे यह सरकार चलाने वालों की अपनी सोच है ।पर हम शिक्षित भाषा -भाषी लोगों का यह कर्तब्य अवश्य बन जाता है कि हम श्रेष्ठ रचनाओं और उन रचनाओं को प्रकाशित करने वाली पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने की आदत डाले।साहित्य अपने भब्यतम रूप में ईश्वरीय गौरव से मण्डित होता है।ईश्वर की आराधना करने वाला व्यक्ति जैसे पूजा को अपनी दिनचर्या का एक अनिवार्य तत्व मानता है ठीक वैसे ही हिन्दी भाषा -भाषी साहित्य प्रेमियों को ललित साहित्य को जन मानस तक पहचानें वाली रचनाओं और पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने की आदत डालनी होगी।हम कोटि कोटि जन यदि अपने सशक्त ,चरित्रवान ,तरुण शब्द शिल्पियों का संवर्धन ,सरंक्षण नहीं कर सकते तो निश्चय ही हमारे लिये शर्म की बात है।निरन्तर सरकारी आश्रय की मांग करना यह स्वीकार करना होगा कि हम हिन्दी भाषी वैसाखियों के बिना सांस्क्रतिक विकास के मार्ग पर चल ही नहीं सकते।
                                                         "माटी "निरन्तर इस चेष्टा में निरत है कि उसमें स्थान पाने वाली श्रेष्ठ रचनाओं के रचयिताओं को सम्मान- राशि के रूप में प्रोत्साहन दिया जाय।हम नहीं जानते कि हमारे सीमित साधन हमें कब उस आर्थिक आधार भूमि पर खड़ा कर पायेंगे जहां हम अपनी आंतरिक इच्छाओं को मूर्तरूप दें सकें।पर हमारे प्रयास के ईमानदारी में कोई खोट नहीं हैं ऐसा विश्वाश  हम अपने रचनाकारों को दिलाना चाहेंगे ।"माटी" के सौभाग्य से प्रतिभाशील लेखकों की उत्क्रष्ट रचनायें हमें मिलती जा रहीं हैं ।सभी रचनाओं का प्रकाशन प्रत्येक अंक में संभव नहीं हो पाता पर हम चुनी हुई रचनाओं को सुविधा नुसार आगामी मासिक अंकों में प्रकाशित करते रहेंगें ।यदि पाठक किसी रचनाकार के बारे में अधिक जानकारी पाना चाहें तो सम्पादकीय कार्यालय से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं ।प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि वे साहित्य की समझ रखने वाले अपने अन्य साथियों को भी माटी पढने के लिये प्रेरित करें । सिनेमा या क्रिकेट का इन्टरटेन्मेंट (मनोरन्जन )सामन्य जन तक भी सीधे पहुँच जाता है पर साहित्य को समझने ,सराहने के लिये एक उच्च मानसिक स्थिति की आवश्कता होती है ।"माटी "के प्रबुद्ध पाठक ज्ञान -विज्ञान के प्रसार का केन्द्र बिंदु बनकर साहित्यिक पुनर्जीवन के लिये नयी चेतना के चक्रों का निर्माण कर सकते हैं।चेतना के जिस धरातल पर आज मानव जाति खाड़ी है उसमें धरती का छोटापन और उभर कर हमारे सामने खड़ा हो गया है।भारत का चंद्रयान सितारों की खोज करके वापस आ गया है।विश्व मानव की तारपथी दौड़ में भारत भी कहीं खड़ा है इसका अहसास हमें गर्व से भर देता है। हम "माटी "के रचनाकार और पाठक सृजन की रहस्यमयी ईश्वरीय सृष्टि में कुछ और ज्योति पुंज जोड़ सकेंगे ।इसी कामना के साथ -
गिरीश कुमार त्रिपाठी

मंगलवार, 20 नवंबर 2012

"माटी " के प्रकाशन की क्या आवश्यकता आ पड़ी ?

                      आप पूछ सकते है -और यह पूछना सर्वथा उचित ही होगा -हिन्दी में निकल रही न जाने कितनी पत्रिकाओं और प्रसारिकाओं के बावजूद "माटी "  के प्रकाशन की क्या आवश्यकता आ पड़ी ?ऐसा तो नहीं कि यह पत्रिका आपकी पहचान शून्यता को भरने का खोखला उपाय है -या कि आपके व्यक्तित्व की पराजित मनोचेतना छपाई के माध्यम से कोई मनोवैज्ञानिक उपचार तलाश रही है ? और भी अनेक उल्टे- सीधे , उलझे -सुलझे प्रश्न इस बारे में उठाये जा सकते हैं इस सन्दर्भ में मुझे इतना ही कहना है कि इस भूग्रह पर मेरी जीवन यात्रा का अपना एक अनुभव है और वह  मुझे विशिष्ट और निराला लगता है -भले ही दूसरों के लिये उसमें कुछ नया न लगे , मेरा विश्वाश है कि इस धरती पर मेरा आगमन और सफ़र के दौरान सन्चित जीवन मूल्य बाहिरी दुनिया से संचयित होने के बाद मेरी आन्तरिक चेतना की अग्नि में पक कर मेरी अपनी विशिष्टता की छाप  पा चुके हैं अत:मुझे उन जीवन मूल्यों को ब्यक्त करने का और समकालीन स्रजनात्मक मनीषा में  समानान्तर उभर रहे साथियों के सहयोग पाने का पूरा अधिकार है ।"माटी "का प्रकाशन इस दिशा में एक प्राराम्भिक कदम है।हो सकता है एक एक कदम आगे बढ़कर हम मानव निर्माण की उस मंजिल पर बढ़ चलें जो कंही मानव  समानता के आदर्शों की ओर पहुँचाती हो ,हो सकता है कि कुछ सिरफिरे साथी मेरे साथ चल पड़ें और फिर काफिला बन जाय और फिर यदि अकेला भी चलना हो तो उसमें संकोच क्या ?क्योंकि खोना तो कुछ है ही नहीं ,एकांत में ही आत्म अनुभूति का सच्चा ज्ञान हो  पाता है ,न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हम ' माटी 'से कटकर कांक्रीट की मीनारों पर जा खड़े हुए हैं ?हम से मेरा अर्थ हिन्दी भाषा भाषी राज्यों का मध्यम वर्गीय जन समुदाय , मध्यम वर्ग  में भी यों तो कई स्तर हैं और सबसे निचले स्तर के घरों में अभी माटी की गन्ध आती है पर ज्यों ज्यों हम स्तर की ऊँचाई की ओर बढ़ते है यह गन्ध खडखडिया वाहनों की विषाक्त वहिर्गत साँसों में बदल जाती है माना कि तकनीकी युग में वृन्दावन में होनी वाली रास लीला की कल्पना ,उपहास की बात बन जाती हैं। माना कि सन्चार प्राद्योगिकी के युग में प्रवासी के गीतों की बात बचकानी लगती है ,माना कि अनुष्ठान से पवित्र नर -नारी सम्बन्ध की कल्पना प्रगतिशील कहे जाने वाले नर नारियों   के ओछे मजाक का विषय बन चुकी है पर मुझे कुछ ऐसा लगता है कि मैं अपने पूरे जीवन भर अप्रगतिशील कहे जाने का बोझ उठाना अच्छा समझूंगा बजाय इसके कि मैं भारत के सांस्क्रतिक अतीत और चिर प्रेरक जीवन मूल्यों से कट जाऊँ और मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे कोटि -कोटि प्रौढ़ और बृद्ध तो इस चिंतन में मेरे साथ खड़े ही होंगे पर सम्भवत : कोटि -कोटि तरुण भी इन मुद्दों पर मेरे साथ खड़े होने में अपनी हेठी नहीं समझेंगे।यह सत्य हैअटूट और निर्विवाद सत्यकि काल सबको खा जाता है पर यह भी उतना ही अटूट और निर्विवाद सत्य है कि मानव सभ्यता में कंही कुछ ऐसा भी है जो कालजयी है और जिसके बिना सभ्य मानव की कल्पना भी नहीं की जा सकती इन्ही जीवन मूल्यों में हैं नर -नारी के शारीरिक सम्बन्ध की नैष्ठिक पवित्रता।इन्ही जीवन मूल्यों में है पशु प्रवृत्ति से पायी गयी काम चेतना  पर सभ्यता द्वारा निर्धारित सयंम व्यवस्था ।इन्ही जीवन मूल्यों में शामिल है वैभव के बेलगाम प्रदर्शन पर ज्ञानी पुरुषों का आक्रोश और सच्चे संतों द्वारा उसकी भर्त्सना ।वैदिक ऋचाओं  से लेकर बुद्ध और गान्धी तक आने वाली अपरिग्रह की विचारधारा यदि आधुनिक अर्थशास्त्र नकारता है तो उसे "माटी "स्वीकार नहीं करती ।माटी का और माटी से जुड़े हुए सामान्य जन व मनीषियों का यह निरन्तर प्रयास रहेगा कि जनता के लिये विधि पूर्वक भेजे गये सौ पैसे सत्रह या पांच बनकर उन तक न पहुचें इस दिशा में निन्यानवे का चक्कर माटी स्वीकार करती है।सौ की पूरी संख्या तक पहुचने के लिये वह सदैव कृत -संकल्पित रहेगी ।यक्ष के प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर का यह बताना कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि लोग अपने आस -पास निरन्तर मरते हुए ब्यक्तियों को देखते हैं और फिर भी वे दुष्कर्मों की ओर और तेजी से झुकते हैं यह मानकर कि म्रत्यु उनके पास आयेगी ही  नहीं ।हमें इन पथ भ्रष्ट नर पशुओं को म्रत्यु का यह अहसास देना है जो उन्हें आचरण की पवित्रता पर सोचने को बाध्य करे ।हमारा प्रयास होगा कि माटी आप तक ताजी कटी हुई फसलों की सुगन्ध पहुचाये । हमारा प्रयास होगा कि "माटी " आपको "तमसो मा ज्योतिर्गमय "के व्यवहारिक रूप से रूबरू करे ।हमारा प्रयास होगा कि माटी बिल्लेसुर को विल्वेश्वर और बलचनमा को बालचन्द्र के रूप में देखने के लिये प्रेरित करे पर उन्हें अपनी मिट्टी में ही खड़ा करके विकसित होने दे।हम जानते हैं कि यह भगीरथ प्रयास है।हम जानते हैं कि यह टिटहरी का समुद्र भर देने का निष्फल प्रयास है।हम जानते हैं कि यह गिलहरी का लोट पोट कर सेतु निर्माण में सहयोग करने की सी हास्यास्पद योजना है।पर फिर भी न जाने क्यों माटी का संयोजक मण्डल और प्रेरक पुरुष चक्र मर मिटने की अदम्य लालसा लेकर आगे चल पड़ा है।अधूरे प्रयासों की श्रंखला भी मानव विकास की चिरन्तन प्रक्रिया में अनुल्लेखनीय नहीं मानी जानी चाहिये ।और फिर क्या पता अमस की पर्तों में ज्योति किरण कोई मार्ग बना ही ले।यह ठीक है कि हमसब मिट्टी के मटके हैं पर क्या यहआश्च्रर्य नहीं है कि मिट्टी का मटका भी राम राम बोल लेता है।कवि की यह पंक्ति "Dust Thou art,to dust returneth."एक अकाट्य सत्य है । पर एक ऐसी माटी भी होती है जो कभी नहीं मरती -जो मरण में से भी चिरन्तन जीवन के बीज स्फुरित करती है।"माटी "उपनिषद के मनीषियों को जन्म नहीं दे सकती ,ना ही "माटी "के माध्यम से बुद्ध ,गान्धी ,मार्टिन लूथर या मण्डेला आ पायेंगे पर" माटी "निश्चय ही किसी सूरदास (रंगभूमि ),बावन दास (मैला आँचल ),किसी पवेल (माँ ),किसी दशरथ मांझी (बिहार) ,या किसी बिलकिस बानों (गुजरात )को आगे ला पायेगी ऐसा हमारा विश्वास है ।                                        
                                 प्रगतिशील चिन्तकों ,विचारकों ,समर्थ जुझारू शब्दशिल्पियों और आदर्श के प्रति समर्पित सृजन शील रचना कारों से उर्जावान रचनाये पाकर "माटी "अपने को गौरवान्वित अनुभव करेगी ।"माटी " की गुणवत्ता या स्तरहीनता पर सुयोग्य पाठकों की प्रतिक्रियाएं साभार प्रकाशित की जायेंगी पर इतना तो अनुरोध आप मानेगे ही कि पत्रिका को पूरा पढ़े बिना अपनी प्रतिक्रियायें न भेजें ।
                                     
                       

रविवार, 18 नवंबर 2012

आइये हम मृत्यु को ललकारने की हिम्मत पा लें

                         भारत की सांस्क्रतिक परम्परा और धार्मिक प्राणपरता यह मान कर चलती है की मनुष्य का जीवन प्रभु की एक दुर्लभ देन है ।गोस्वामी जी की इस पंक्ति से तो आप ,हम सब परिचित ही हैं -"बड़े भग्य  मानुस तन पावा।"प्राक्रतिक विज्ञान भी यह मानकर चलता है की मानव अरबों वर्षों की विकास प्रक्रिया का चरम प्रतिफल है।अब यदि मनुष्य होकर भी हम मात्र अपने लिये जीते हैं तो इस जीनें  में और पशु जीवन में अंतर ही क्या ?मुझे चार्ल्स डिकन्स की बहुचर्चित कहानी क्रिसमस कैरल की याद आती है जिसमें एब्ने क्रूज को जब उसके मित्र पावल गोन का भूत मिलता है और उससे अपनी आत्मा की दारुण व्यथा की बात करता है तो एब्ने क्रूज उससे कहता है कि तुम तो एक अत्यन्त सफल व्यापारी थे इस पर ईथर में गूँजता उसके मृत मित्र का उत्तर आता है -कैसा व्यापारी ?मैनें मानव जाति के लिये क्या किया ?मैंने अपने अतिरिक्त दूसरों के लिये क्या कभी त्याग या बलिदान का भाव पाला ।कैसा वैभव ?अपने इन्द्रिय सुख के अतिरिक्त क्या उस वैभव से मैंने वृहत्तर मानव कल्याण की संयोजना की ।
                                                                                            बन्धुओं मानव जीवन निश्चय और अनिश्चय का एक ऐसा समुच्चय है जो विज्ञान की सारी चमत्कारी विशेषताओं के बावजूद अनुत्तरित है ।निश्चय इस लिये जो जन्मा है वह मरेगा अवश्य और अनिश्चय इसलिये कि उस महाप्रयाण की बेला गोधूलि की धुंधलके की  भाँति झिपी -अनझिपी रहती है।यही कारण है कि न जाने कितनी बार महामानव भी चाहते हुए कल की तलाश में बहुत कुछ नहीं कर पाते।हमें याद रखना है कि हमारे पास समय कम है और हमारे संकल्पों के यात्रा अत्यन्त कठिन और एक प्रकार अन्तहीन है।हमारे रास्ते में कितने ही मनमोहक पड़ाव आते हैं जहां रुकने का मन होता है।हम विचलित होते हैं अपने लक्ष्य पद से और सुहावन मरीचकाओं में भटकते हैं।हमें राबर्ट फ्रास्ट की उन अमर पंक्तियों को कभी नहीं भूलना चाहिये जिन्हें पंडित जवाहर लाल नेहरु ने अपनी राइटिंग टेबिल ग्लास के नीचे लगा रखा था।
 "The woods are lovely dark and deep
But I have promises to keep
And miles to go before I sleep
And miles to go before I sleep"
अभी कहाँ आराम बदा,यह मूक निमंन्त्र्ण छलना है ।
अरे अभी तो मीलों मुझको ,मीलों मुझको चलना है ।।
                         बन्धुओ अपने को दूसरों से बड़ा मानने का भाव अहंकार से जन्मता है और अहंकार सामाजिक समर्पण के रास्ते में रूकावट बन कर खड़ा हो जाता है इसलिये यह कहना कि हमारा जीवन अन्य लोगों के मुकाबले में कहीं अधिक स्वच्छ और सुथरा होना चाहिये ,शायद उपदेश की सी बात लगे पर इसमें दो राय नहीं हैं कि भारतवर्ष का लगभग समूचा तन्त्र जाल प्रशासन की भ्रष्ट लाल फीताशाही में फंसा हुआ है ।भ्रष्टाचार मिटाने के न जाने कितने संकल्प शीर्षस्थ पर बैठे राजनीतिज्ञों के किये थे और करते जा रहे थे पर भारत का हर सामान्य नागरिक यह मान कर चल रहा है कि प्रशासन की स्वच्छता एक असंभव उपलब्धि बनती जा रही है।असंभव   को संभव कर दिखाना असाधारण साहस की मांग करता है।उस साहस को उत्पन्न किया जाता है जन चेतना जगाने वाली सामाजिक संस्थाओं ,संगठनों ,क्लबों और प्रकाशनों के द्वारा।अर्नाल्ड ट्वायनबी नोबेल पुरस्कार विजेता इतिहासकार कहते है कि असाधारण जन नायक एक विशिष्ट चेतना से भरी सामाजिक गुणवत्ता के उपज होते हैं।हम इस दिशा में कुछ ठोस कदम उठा सकते हैं।हमारा आचरण ,हमारी भाषा ,हमारा व्यवहार ,हमारी सेवा वृत्ति और हमारी निर्मलता ,क्रांतिकारी चारित्रिक पवित्रता को जन्म दे सकती है।असत्य के खिलाफ भीरु बन कर बैठे रहना,घोर अनाचार के प्रति उदासीन रहना और ऐन्द्रिक कर्दभ में गले तक डूबे रहना भारतीय समाज का अभिशाप हो चुका है।आइये हम अपने भीतर वह शक्ति पैदा करें कि हम किसी भी अनुचित दबाव के आगे नो कहने की हिम्मंत रखें।निहारिकाओं से भरा आकाश हमारा लक्ष्य हो।नाबदान के गलीज में बुद बुद करते कीड़ों को मानव जीवन की अस्मिता का ज्ञान नहीं होता।प्रकाश का दिब्य पुन्ज,पावनता का दिब्य आलोक हमारे चारो ओर व्याप्त है यदि हममें आत्म मन्थन कर उसे पाने की शक्ति है।सभी कुछ परिवर्तनशील है।आज का यह कदाचार,यह तुच्छता ,यह राजनीतिक लम्पटता चिरस्थाई नहीं है।परिवर्तन सनातन है।कविवर पन्त ने परिवर्तन को वर्तुल वासुकिनाद का रूपक देते हुए लिखा है :-
                                         "  शत शत फेनोच्छासित स्फीत फुत्कार भयंकर।
                                           घुमा रहे हैं घनाकार जगती का अम्बर ।।
                                            विश्व तुम्हारा गरल दन्त कन्चुक कल्पान्तर ।
                                           अखिल विश्व ही विवर ,वक्र कुन्डल दिग मण्डल ।।  
                                           अये वासुकि सहस्त्र फन "
                                          मित्रो मुझे आप भले ही अतिरिक्त आशावादी कहें पर मुझे क्षितिज पर नये प्रभात की अरुणिमा का आभास हो रहा है।घोर जाड़े के बाद भी तो  वसन्त   का शुभ आगमन होता है।
"If winter comes can spring be for behind."
                           आइये हम नये युग के सार्थवाह बने।आइये हम म्रत्यु को ललकारने की हिम्मत पा लें ताकि जो अम्रत है,जो सत्य है ,जो सनातन है ,ऐसा शुद्ध परमार्थ भाव हममें जग सके।मेरा विश्वाश है कि माटी परिवार अपने चरण चिन्हों की ऐसी छाप अपने भू क्षेत्र में छोड़ सकेगा जिसका अनुसरण करके मानव जीवन को उद्देश्य प्राप्ति हो सके।
                                                    "O God !Illumine what is dark in me ."

शनिवार, 17 नवंबर 2012

माटी की विरासत

मानव विकास का वैज्ञानिक विश्लेषण आधुनातन शिक्षा का एक अनिवार्य अंग बन गया है । ऐसा होना भी चाहिए क्योंकि न्रतत्वशास्त्र के प्रामाणिक ज्ञान के बिना जीवन मूल्यों के विकास की विश्वसनीय व्याख्या अधूरी रह जाती है। वैज्ञानिक विकासवाद दस लाख वर्ष से अधिक किसी कुहासे भरे अतीत से वानर मानव से प्रारम्भिक आदि मानव के विकास की कहानी दुहराता रहा है।इस विकास के कुछ विश्वसनीय प्रस्तरीकृत अस्थि पिन्जर और पाषाण उपादान मिलने से ऐसा लगता है कि विकास की यह अनवरत धारा सत्य से बहुत हट कर नहीं है।पर भारतीय मनीषा इस दिशा में एक सनातन विकास व्यवस्था की बात करती रही है जो प्रगति के अन्तिम छोर तक जाकर विनिष्ट हो जाती है और फिर विनाश में छिपे सृजन के बीच से पुन:प्रस्फुटित होकर प्रगति के और अधिक उच्चतर सोपानों की ओर चल पड़ती है । सतयुग ,त्रेता ,द्वापर और कलयुग की विभाजन प्रक्रिया के पीछे एक ऐसी ही विश्लेषण पद्धति सक्रिय रही होगी। ऐसे विभाजन को रूढ़ अर्थों में लेना अवैज्ञानिक होगा क्योंकि कलियुग के साथ अपार तकनीकी संम्भावनाओं का जुड़ाव रहता है जब कि सतयुग मानव की बाल सुलभ सरलता और सहज ज्ञान से जुड़ता है ।जैसे जैसे यह बाल सुलभ सरलता  यानि ईश्वरीय सम्पर्क  की आसन्नता कम होती जाती है वैसे वैसे सांसारिक ज्ञान का विकास, चातुर्य जो कालान्तर में छल छदद्म में बदलता है बढ़ता जाता है ।यह विकास होकर भी विकास नहीं रहता क्योंकि आत्म तत्व का विस्मरण हमें शुचिता और सरलता से दूर करके मूल पशुत्व की ओर ढकेलता है ।मानव इन्द्रियों के एक सामूहिक संयत्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता।द्वापर में तुला के दोनों पलड़े लगभग बराबर से रहते हैं और रह रह कर वहिरावलोकन और अन्तरावलोकन में अदलाव -बदलाव होता रहता है ।कलियुग आते ही यन्त्र शक्ति परमात्म शक्ति पर भारी पड़ती दिखायी पड़ती है।इन्द्रिय सुख के अनूठे और अकल्पनीय साधनों की भरमार हो उठती है।भक्षण वृत्ति संम्पोषण वृत्ति पर हावी हो जाती है।भाषा के अर्थवान शब्द विपिरीतार्थक बन जाते हैं। चातुर्य का अर्थ हेराफेरी बुद्धिमान का अर्थ धूर्त और सफलता का अर्थ परपीडन कुशलता में बदल जाता है ।गीता  के अर्जुन सर्वभावेन परन्तय न रहकर सर्व विनाशक आत्म रत भोगी बन जाते हैं ।विकास की यह अद्दभुत गाथा सतत अवाधित अपरिहार्य और अथक रूप से गतिमान रहती है |कुछ ऐसी ही व्यवस्था के कलुष भरे मार्ग से आधुनिक  मानव गुजर रहा है।इन्द्रिय सुख की मिथ्या मरीचका के पीछे वह इतना भ्रमित हो चुका है कि परस्पर सौमनस्य ,सहकारिता और सहभागिता के उन ऊर्जापूर्ण विचारों से वह बहुत दूर जा चुका है जिन विचारों ने उसे चार पैरों पर चलने वाले नर मानव से प्रज्ञा मंडित मानव बनने की ओर विकसित किया था।प्रक्रति के स्वाभाविक दौर में इन्द्रिया जब सुख भोगने के योग्य नहीं रहती तब वह सुरा,मारीजुवाना और Ecstasy की तलाश में दौड़ता है ताकि इन्द्रिय सुख के कुछ क्षण और जुटाये जाँय।और फिर यौवन पार करते ही या उससे पहले ही मानसिक रोगों से भरी खचाखच दीर्घाओं के अतिरिक्त और कहीं  रहने का मार्ग ही कहाँ रह जाता है ।इस घोर कलियुग में भी जिसे वैज्ञानिक विकासवाद मानव के चरम उत्थान की गाथा कह रहा है कहीं कुछ बिन्दु हैं जंहा पहुच कर मानव मनीषा अन्तरावलोकन कर कर सनातन सत्यों को खोजती है ।ऐसे बिन्दु हैं उन मानव मनीषियों द्वारा खोजे गये संजीवनी जीवन मन्त्र जो इस कलयुग के बीच  भी आत्मा की सतयुगी गरिमा और शुचिता को अक्षुण रख सकें हैं ।ऐसे ही महापुरुषों में उदाहरणार्थ राम क्रष्ण परमहंस ,विवेकानन्द ,स्वामी रामतीर्थ .महर्षि दयानन्द ,महर्षि रमण ,महर्षि कणवे ,रवीन्द्र  नाथ ,व महात्मा गान्धी आदि आदि में हमें नव सृजन के सतयुगी बीज देखने को मिलते है ।हमें विकास की नयी परिभाषाओं को खोजने के लिये संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के सर्वोच्च पद पर बैठे पूर्व राष्ट्रपति की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। मोनिका लिवंगस्की से कामातुर आचरण करने वाले राष्ट्रपति क्लिंटन जो वयस्क पुत्री के पिता हैं भले ही अमेरिका में अनादर के पात्र न हों पर वह भारतीयों के लिए आदर्श नहीं सकते ।हमें इस दिशा में भारत के अतीत में आदर्श खोजने होंगे और सहस्त्रों वर्ष पूर्व मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम का ही अनुशरण करना होगा।आधुनिक भारतमें  भी यदि हम पांच प्रतिशत अत्याधुनिक पश्चिमी दासता वाले वर्ग को छोड़ दें ,जो अभी जीवन मूल्यों के उस विघटन स्थल से थोड़ा ऊँचे हैं जहाँ नर नर न रहकर नर पशु बन जाता है" माटी "का प्रकाशन इन्ही जीवन मूल्यों की तलाश की ओर एक छोटा पर विश्वास  भरा प्रयास है ।संकल्प की शक्ति ही मन्त्र शक्ति होती है और नये जीवन मूल्यों का उद्दभव निर्मम भौतिक वाद की खाद से ही सम्भव हो पायेगा ।
                                                               आज के इस निराशा संत्राष ,और आत्म जड़ता से भरे तुमुल कोलाहल के बीच रहकर भी प्रत्येक जिज्ञासु को ज्ञान सागर में गोता लगाकर सच्चे मोती खोजने होंगे ।हठ धर्मिता या जेहादी जनून किसी भी काल में भारतीय संस्क्रति का अपरिहार्य अंग नहीं रहा है हम हर युग और हर काल में विशुद्ध बुद्धि की कसौटी पर कसने के पश्चात ही मूल्यों और समाज रचना की संहिताओं को स्वीकार करते रहें हैं। ऐसा ही हमें आज भी करना है ।दरअसल जनूनीपन कुछ धर्मों का ही अंग नहीं है यह आज विज्ञान कहे जाने वाले आधनिक धर्म प्रवंचना का भी अंग बन गया है।विज्ञान का कोई भी सकारात्मक अनुयायी इस बात का हठ नहीं करेगा कि जो कुछ उसने जाना है वही अन्तिम सत्य है ।ईजाक न्यूटन के काल में सर्वमान्य  वैज्ञानिक मान्यतायें आइन्स्टाइन के युग तक पहुँच कर अपनी सार्थिकता से वन्चित हो गयीं ।और अब तो प्रक्रति की रहस्यमयी प्रक्रिया को सुलझाने का दावा करने वाले नोबेल लारियेट भी नेति नेति की पुकार लगाने लगे हैं। क्लोनिंग की समस्यायें और अल्पकालीन जिजीविषा उभर कर सामने आ चुकी है ।
                                                                   जैविक गुण सूत्रों का सूक्ष्म विश्लेषण नयी मीमान्साओं की मांग कर रहा है ।बौनी मानव बुद्धि ब्रम्हाण्ड के अपार विस्तार में उलझ कर दिशा हीन सी  हो गयी है ।प्रोफ़ेसर हाकिन्स ब्लैक -होल की थियरी लेकर रहस्य व्याख्या का प्रयत्न कर रहें हैं जबकि आकाश गन्गाओं का उत्फूर्जन और विकरण किसी भी नियम संहिता को चुनौती दे रहा है।सत्य अभी बहुत दूर है और सत्य को क्या कोई मरणशील शरीर में पलती चक्षुबिन्दुओं से देख सकने की क्षमता रखता है।ज्ञान -विज्ञान का अहंकार कुछ राष्ट्रों को इतना निरंकुश बना चुका है की वे  संसार को एक ठोकर मारने वाला खिलौना समझ बैठे हैं।उनका दं म्भ है की वे मानव मात्र के नियामक हैं और वे मानव सन्तति को अपनी इच्क्षा के अनुसार आरोपित जीवन पद्धतियों में बाँध देंगे।भारत यह अहंकार न जाने कितनी बार देख चुका है और अभिमान से भरी न जाने कितनी संस्क्रतियों को रेत के विशाल विस्तारों में बदलता देख चुका है।केवल मानव संस्कृति ही नहीं देव संस्कृति भी अहंकार के इस विस्फोट से कितनी बार निर्मूल हो चुकी है ।तभी तो महाकवि प्रसाद ने कामायनी में मनु से यह विचार व्यक्त करवायें हैं ।
                                                              देव न थे, वे देव न हम हैं
                                                             सब परिवर्तन के पुतले
                                                             हाँ की गर्व रथ में तुरंग सा      
                                                             जो चाहे जितना जुत  ले ।
                                             तो मित्रो हमें दंम्भ नहीं सकारात्मक आत्म गौरव से प्राण शक्ति लेनी होगी ।पाश्चात्य जीवन पद्दति को सर्वोत्तम मानकर अपनी जीवन पद्धति को हीन भाव से देखना दासत्व की पहली पहचान है।भारत भारती की जिस पंक्ति ने स्वतन्त्रता सं ग्राम के निर्णायक क्षणों में राष्ट्र में प्राण फूंके थे वह शक्ति आज फिर और अधिक सार्थक हो उठी है ।"हम कौन थे क्या हो गये सोचो विचारों तो सही। "माटी का प्रकाशन भारतीय अस्मिता की अमर गौरव गाथा को हर आट बाट में प्रसारित करने का रचनात्मक प्रयास है।हम चाहेंगे की संसार से आती हुई हवाओं की ताजगी हम अवश्य लें ताकि हममें और अधिक स्वस्थ रक्त का संचरण हो सके पर श्वास प्रक्रिया का सयंत्र तो हमारी अपनी स्वस्थ देह में ही परिपुष्टता पा सकेगा।अन्धी गुलामी मानसिक वैश्या वृत्ति है और नयी पीढ़ी को हम इस ओर नहीं बढ़ने देंगे।महान उपलब्धियां सहज और सीमित प्रयासों को भक्ति तत्परता के साथ निरन्तरता देने से आती हैं।अपने सीमित साधनों लेकिन अपार विश्वाश का बल लेकर माटी इस दिशा में सक्रिय है।पत्रिका प्रकाशन के नाम पर हमारे देश में बहुत से प्रकाशन ऐसे हैं जो भोंडी नक़ल के अतरिक्त और कुछ नहीं।पाश्चात्य जीवन में भी काफी कुछ ऐसा है जो यदि अनुकरणीय नहीं तो ग्रहणीय तो अवश्य कहा जा सकता है पर निराशा की बात तो यह है की जीवन्त स्पन्दनों को छोड़कर मृत औपचारिकताओं के पीछे दौड़ना हमारी युवा पीढ़ी की मानसिकता बनती जा रही है।इसमें बहुत कुछ दोष हमारी शिक्षा पद्धति का रहा है मानव विकास की भ्रामक धारणाये फैलाना और प्रजातीय विशेषताओं की विरुदावली गाना साम्राज्यवादी व्यवस्था का एक संयोजित संयत्र रहा है ।भारत विश्व की श्रेष्ठतम संस्कृति का प्रतीक होने के नाते इस संयत्र का और उसके परिणाम स्वरुप देशीय संस्कृति के अधपतन का विशेष लक्ष्य बनता रहा है।स्वतन्त्रता के पश्चात भी राष्ट्रपिता महात्मा गान्धी का "हे राम"और वैष्णव जन तो तेने कहिये जे पीर परायी जाने रे "को भुलाकर हम भ्रामक मार्क्सवादी भूल भुलैयों में फंस गये।फलस्वरूप भारत का इतिहास हमारे राष्ट्रीय महापुरुषों  के उपहास का कारण बन गया ।हमारी सर्वसहिष्णु धार्मिक परम्परायें और हमारी मूल राष्ट्रधर्मिता ठिठौली भरी वाग्मिता के घेरे में फंस गयी ।लगभग पांच दशकों तक ऐतिहासिकता के नाम पर जो कुछ पढ़ाया गया वह मात्र एक आरोपित और विकृत साम्यवादी दर्शन का आरोपित रूप था ।अयोध्या नगरी और मथुरा नगरी की ईशा पूर्व अस्तित्व संभावनाओं और प्रस्तार संभावनाओं पर प्रश्न चिन्ह लगाये गये ।मानव श्रष्टि के सर्वोत्तम विकास संभावनाओं से परिपूर्ण मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और निष्काम कर्म अमर  विचारक वंशीधर श्री कृष्ण के अस्तित्त्व पर बचकानी टिप्पणि याँ लिखीं गयी।एक क्षण को भी इन छद्द्म इतिहासकारों ने यह नहीं सोचा की वे मात्र तत्कालीन शासन से झूठी प्रशंसा और झूठी कागजी मुद्रा पाने के लिये राष्ट्र का कितना अहित कर रहे हैं।ऐसे ही कपूतों ने परतन्त्रता के लम्बे काल प्रस्तार में माँ भारती का मुंह काला किया है।प्रभात की नयी बयार चल निकली है अन्धकार की अभेद्य चादर भेद कर रश्मि रथ पर सवार राष्ट्रीय चेतना का भास्कर गतिमान हो चुका है।माटी का सम्पादक मण्डल इस दिशा में अग्रगामी पहल करेगा और असत्य के अम्बारों को अग्नि समर्पित करके उसकी भस्म से नयी मान्यताओं का संवर्धन संपोषण करेगा।हम चाहते हैं कि प्रत्येक पाठक यह मान कर चले कि अपने और अपने परिवार के प्रति उसका उत्तरदायित्व तभी पूरा माना जायेगा जब वह राष्ट्रीय चेतना के लिये निरन्तर समर्पित रहेगा और यदि आवश्यकता पड़े तो महत्तर हितों के लिये लघुत्तर हितों का परित्याग करेगा।ऐसा नहीं है कि पाश्चात्य के विचारकों ,कवियों और सृजन कारों ने भारतीय दर्शन को सदैव ही हीन भाव से देखा हो कवि वर्ड्सवर्थ जब यह लिखता है।
"trailing clouds of glory ,do we come from God
That is our home or our birth is but a sleep and a forgetting."
तो वह भारतीय जीवन दर्शन को ही अंग्रेजी स्वरों में ढाल रहा है या आधुनिक काल में जब T.S.Eliot यह लिखते हैं ।" Have measured my life in coffee spoon "तो वे एक तरीके से भारतीय दर्शन में अन्तर्निहित जीवन की उच्चतर भावभूमि की तलाश की बात ही करते हैं।अमेरिकन  Emersonऔर  Thoreau  तो भारतीय दर्शन से अनुप्राणित ही हैं इतना होने पर भी अंग्रेजी का अधकचरा ज्ञान रखने वाला सामान्य भारतवासी भी विकलांग शिक्षा के कारण पाश्चात्य जीवन पद्धति अपनाने की गुलामी लेकर बड़ा होता है।उसे नहीं बताया जाता है कि हम पहनाव -उढ़ाव,खान-पान ,स्वागत -समारोह य अन्य सांसारिक रीति -रिवाजों के न जाने कितने विविधता भरे मार्गों से गुजर चुके हैं । हम कितनी बार कन्ठ लंगोट लगा चुके हैं ,कितनी बार सुत्थ्न पहिन चुके हैं और कितनी बार सुरा -सुन्दरी का अप्रतिबन्धित जीवन दर्शन जी चुके हैं।इसमें ऐसा कुछ नहीं है जो भारत नहीं जानता और सच पूछो तो यह भारत का फेका हुआ जीर्ण -शीर्ण आवरण तन्त्र या केन्चुल है जो दुनिया आभूषण समझ कर पहिन रही है।हाँ कुछ है ऐसा जो भारत का,भारतीय जीवन दर्शन का ,भारतीय आचारसंहिता का और भारतीय अस्मिता का प्राण तत्व है।और जिसे संसार के कुछ अत्यन्त विशिष्ट आत्म सम्पन्न व्यक्ति ही समझ पाये हैं यह है भारत की जल में पलकर भी कमल जैसी निर्लिप्त रहने की क्षमता। यह है भारत की निष्काम समर्पण भावना -"त्वमैव वस्तु गोविन्दम तुभ्य मेव समर्पये "
                                                                              माटी किसी भी एकांगी दर्शन में विश्वाश नहीं करती।एक समन्वित जीवन पद्धति ,अनेकान्त दर्शन से अनुप्रेरित जीवन द्रष्टि और ब्रम्हांडीय विस्तार की प्राणवत्ता उसका आधार है।हर धर्म के मूल में मानव कल्याण की भावना सन्निहित है \सर्वे भवन्तु सुखिन :सर्वे सन्तु निरामय :।सुदूर अतीत से गूँज कर आता यह स्वर हमें जकझोर देता ,अनुप्रेरित करता है और प्राणवान बनाता है -तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्यो माँ अम्र्तम गमयेत
                                                                                         आइये महाकवि मिल्टन के इन शब्दों के साथ हम अपनी बात समाप्त करें ।
           "  Illumine what is dark in me Raise and support to the heigth of that argument so that I may justify the ways of God to man "
                                    माटी संस्क्रति उत्थान के इस श्रम साध्य मार्ग पर चल निकली है ।हम आपके सहयोग की आकांक्षा करते हैं और महाकवि गुरु रवीन्द्र का यह अमर सन्देश हमारे पास है "यदि तोर डाक शुने ,केऊ न आसे।तबे तुम एकला चलो ,एकला चलो ,एकला चलो रे ।।" तो आइये इस चिरपरचित शेर को एक बार फिर दोहरावें "हम अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर .हमसफ़र मिलते गये और कारवाँ बनता गया ।"

मंगलवार, 13 नवंबर 2012

मरुथल की छाती फोड़कर निकलने वाला जीवन्त अंकुर किसी सिचाई की मांग नहीं करता।

योरोपीय सभ्यता प्राचीन यूनानी सभ्यता को अपने आदि स्रोत के रूप में स्वीकार करती है। निसन्देह ईसा पूर्व यूनान में विश्व की कुछ महानतम प्रतिभायें देखने को मिलती हैं। सुकरात ,प्लेटो (अफलातून )और अरिस्टों टल (अरस्तू )का नाम तो शिक्षित समुदाय में सर्वविदित ही है पर बुद्धि परक मीमांसा का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जहाँ प्राचीन यूनानी प्रतिभा ने अपनी अमिट छाप न छोड़ी हो इसी प्राचीन यूनान में स्पार्टा के नगर राज्य में मानव शरीर की प्राकृतिक विषमताओं से लड़ने की आन्तरिक क्षमता को मापने का एक अद्धभुत प्रयोग किया था। ऐसा माना जाता है कि स्पार्टा नगर राज्य में जन्म लेने वाला प्रत्येक शिशु नगर के छोर पर स्थित एक विशाल समतल प्रस्तर पर निर्वस्त्र छोड़ दिया जाता था । दिन रात के चौबीस घन्टे उसे अकेले चीखते,चिल्लाते छांह ,धूप ,प्रकाश,अन्धकार और कृमि कीटों से उलझते -सुलझते बिताने पड़ते थे । आंधी आ जाय या मूसलाधार वर्षा उसे आठ पहर ममता रहित उस चट्टान पर निर्वस्त्र काटने ही होते थे । इस दौरान यदि प्रकृति उसका जीवन समाप्त कर दे तो स्पार्टा का प्रशासन उसे मात्र भूमि की माटी में अर्पित कर देता था और यदि वह बच जाय तो उसका हर प्रकार से लालन -पालन कर उसे स्पार्टा नगर राज्य का समर्थ चट्टानी पेशियों वाला जागरूक नागरिक बनाया जाता था ।प्राचीन इतिहास के मनीषी पाठक जिन्होंने विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं का गहनतम अध्ययन किया है जानते ही हैं की स्पार्टा नगर राज्य और एथेन्स  के नगर राज्य में बहुत लम्बे समय तक संघर्ष की स्थिति रही थी और अन्तत :अपनी सारी सम्रद्धि ,वैभव और ज्ञान विपुलता के बावजूद स्पार्टा का पलड़ा भारी रहा था । हमें स्वीकार करना ही होगा कि मरुथल की छाती फोड़कर निकलने वाला जीवन्त अन्कुर किसी सिचाई की मांग नहीं करता। ब्यक्ति का आन्तरिक सामर्थ्य जिसमें शारीरिक और मानसिक क्षमताओं का कान्चनमणि संयोग शामिल है उसे जीवन संग्राम में अपराजेय योद्धा के रूप में प्रतिष्ठित करती है। काया का बाह्य आकार अन्तर की विशालता का प्रतीक नहीं होता।शरीर की प्रतिरोधात्मक क्षमता किन्ही उन आन्तरिक शक्तियों से प्रतिचालित होती है जिन्हें मानव के वरण -अवरण की प्रक्रिया के द्वारा लाखो -लाख वर्षों में पाया है।बौद्धिक कुशाग्रता और जिसे हम प्राण शक्तियां प्राणवत्ता के रूप में जानते हैंवो  भी चयन -अचयन की लाखों वर्षों की दीर्घ प्रक्रिया से गुजर कर आयी है। हर श्रेष्ठ मानव सभ्यता  प्राचीन या अर्वाचीन इसी विरासत में पायी असाधारण आन्तरिक क्षमता को प्रस्फुटन -पल्लवन का काम करती है ।पोषण ,सिंचन और संरक्षण पाकर भी कुछ लता ,पादप- तरु थोड़ा बहुत बढ़कर सीमित विकास को समेटे विलुप्त होने की सनातन प्रक्रिया का अंश बन जाते हैं।और कुछ हैं जिन्हें ओक ,बरगद और देवदार बनना होता है। शताब्दियाँ उनको छूकर निकल जाती हैं और वे सिर - ताने खड़े रहते हैं।पर आकार की विशालता ही श्रेष्ठता का पैमाना नहीं है। रग पेशियों की द्रढ़ता प्रभावित अवश्य करती है पर सनातन नहीं होती।कुछ पैरों से निरन्तर दलित,मलिन होने वाली वनस्पति प्रजातियाँ भी हैं जो काल की कठोर छाती पर अपनी कील ठोंककर अजेय खड़ी हैं।विनम्र घास और सदाबहारी निरपात और प्रान्तीय लतायें इसी श्रेणी में आती हैं। सनातन धर्म वाले सनातन  भारत का विश्व को यही सन्देश है कि केवल आन्तरिक ऊर्जा,दैवी स्फुरण , प्रज्ञा पारमिता या समाधिस्त संचालित जीवन ही काल को जीतकर अकाल पुरुष तक ले जाता है ।      

             व्यक्ति का चाहना या न चाहना निर्मम प्रक्रति के विस्मयकारी और अबाधित गतिमयता में कोई परिवर्तन ला पाता है इस पर मुझे सन्देह है।पर यदि चाहना का कोई सकारात्मक प्रभाव होता है तो मैं चाहूँगा कि माटी अपनी अमरता अपने कलेवर में समेंट लेने वाली मन्त्र -पूत सामिग्री से सन्चित करे निर्वात दीप्त शिखा की भांति प्रकाश पुंजों की श्रष्टि ही उसके साधन बने और साध्य भी।आकाश गंगा की तारावलियां और ज्योतित पथ उसे अमरत्व का ऊर्ध्वगामी पथ दिखायें -इसी कामना के साथ ।

सोमवार, 12 नवंबर 2012

माटी चाहेगी कि समर्थ रचनाकार अपनी सबल अभिव्यक्तियाँ कलात्मक रूप में सवांर कर माटी में प्रकाशनार्थ भेज कर हमें गौरवान्वित करेंगें।

धरती पर जीवन का आविर्भाव क्यों और कैसे हुआ -इस विषय पर विश्व के मनीषियों के मत- मतान्तर युगों युगों से ध्वनित होते रहे हैं । मानव आविर्भाव के पीछे आकस्मिक संयोजन की शक्ति थी या कोइ दैवी विधान इस बात को लेकर भी सहस्त्रों ग्रन्थों ,उपग्रन्थों की रचना हुई है । माटी का सम्बन्ध माँ भारती के रजकणो से अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। इसलिये माटी भारतीय दर्शन की पक्ष धर है ।और यह मानकर चलती है कि ऊर्ध्वमुखी विकास निरन्तर परमसत्ता की ओर ले जाने का सोद्देश्य प्रयास है।आर्ष मनीषियो ने सौ वर्षों तक स्वस्थ्य रूप से जीने की मानवीय क्षमता  का न केवल उपदेश दिया है बल्कि इस जीवनावधि के लक्ष्य को प्राप्त कर शत- सहस्त्र रूप में इसे व्यवहारिक धरातल पर भी सिद्ध करके दिखाया है।मानव प्रजाति के बेजोड़ शोधकर्ता फ्रान्स के महान बुद्धिजीवी लेवी स्ट्रास ने पूरे सौ वर्ष जीकर विश्व के समक्ष मानव के शतायु होने की क्षमता को पूर्ण रूप से चरितार्थ कर दिखाया है ।भारत में तो कर्मयोगियों और जितेन्द्रिय महापुरुषों के ऐसे अनगिनित उदाहरण उपस्थित हैं ।कृमि -कीटों ,पशु -पक्षियों,सरी -स्रपों ,जलचरों और नभचरों की भी अपनी अपनी आयु सीमाएं हैं। भूमण्डल भी परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजरता रहता है ।जलनिधि ,मरुनिधि बन जाते हैं ।और पर्वत श्रंखलायें क्षार -क्षार होकर अनेकानेक रूप लेती रहती हैं । शायद विनाश ,नव श्रष्टि और निरन्तर परिवर्तन का यह क्रम हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं पर भी उतने प्रभावी रूप से लागू होता है जितना कि पदार्थ निर्मित ब्रम्हांड की प्रत्येक वस्तु पर। पदार्थवादियों की द्रष्टि में पदार्थ ही परम सत्ता है।और इसलिये वह भले ही असंख्य रूपों में परिवर्तित हो पर उस परिवर्तन में उसका अम्रत्व निश्चित होता है ।हिन्दी की साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी जन्म,विकास और म्रत्यु की न जाने कितनी सरड़ीयाँ पार की हैं।इसलिये माटी शाश्वत निरन्तरता का दावा नहीं कर सकती पर जिस इच्छाशक्ति से उसका प्रकाशन प्रारम्भ हुआ है वह इच्क्षाशक्ति शक्ति  अभी तक समुद्र की विक्षोभ भरी लहरियो के बीच अटल लाइट हाउस की तरह अपने केंन्द्र पर स्थित है।यदि माटी के सुधी पाठक अपने आदर ,विश्वाश और ज्ञान की ऊर्जा हमें प्रदान करते रहेंगे तो माटी अपने अस्तित्व की निरन्तरता के लिये नयी शक्ति लेकर आगे बढ़ती जायेगी ।                                    

              शरद ऋतु का आगमन रचनात्मक प्रतिभा के लिये वैचारिक क्षमता के  शक्ति मान तत्व प्राक्रतिक परिवर्तनों में बिखेर जाता है। ऋषियों ने जब जीवेन शरद : शतम के बात कही थी तो सम्भवत : वर्ष का प्रारम्भ भी शरद ऋतु से ही माना जाता होगा। मैथली शरण जी ने कहा भी तो है कि शीत में ही सत होता है।माटी चाहेगी कि समर्थ रचनाकार अपनी सबल अभिव्यक्तियाँ कलात्मक रूप में सवांर कर माटी में प्रकाशनार्थ भेज कर हमें गौरवान्वित करेंगें। विश्व के इतने बड़े जन समुदाय की अभि व्यक्ति का माध्यम होकर भी हिन्दी का कोई शब्द शिल्पी अभी तक अन्तराष्ट्रीय ख्याति अर्जित नहीं कर सका है।अपनी विभिन्न बोलियों को समावेशित करने के बाद हिन्दी का स्थान विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली दो -तीन भाषाओं में आ जाता है।पर विस्तार के इस अपार वैभव को अभी तक एक अन्यतम छवि के रूप में वह परिवर्तित नहीं कर सकी है । हम जानते हैं कि अनेक कारणों में से भारत की पराधीनता भी इसका एक प्रमुख कारण है।पर अब जब हम एक आर्थिक और सामरिक शक्ति के रूप में विश्व पटल पर उभर कर आ रहे हैं।तो हमें हिन्दी के रचनाकारों से विश्वस्तरीय रचनाओं की अपेक्षा करनी ही होगी।और इसके लिये चाहिये अध्ययन की विशालता। संस्क्रत के अतिरिक्त विश्व की प्रमुख भाषाओं का साहित्यिक परिचय यदि मूल भाषा के माध्यम से हो नहीं तो कम से कम अंग्रेजी भाषा के माध्यम से।  साथ ही रचनाकारों को, आधुनिकतम तकनीकीविकास , सूचना प्रोद्योगकीय और अंतरिक्ष प्रवेश के मूलभूत सिद्धान्तों से भी परचित होना होगा। जीवन मूल्यों की सनातनता सुनिश्चित करने के लिये उन्हें सामाजिक अग्निपरीक्षा से निकाल कर विश्वस्तरीय मान्यताओं से संयुक्त करना होगा।माटी यह विज़न अपने सामने रख कर चल रही है।हम जानते हैं हमारी क्षमतायें सीमित हैं और माटी से सबन्धित प्रतिभाये भी असीमित नहीं हैं।पर अपनी सीमाओं में हम माटी के पन्नो पर काल को चुनौती देने वाले अक्षर उद्द्गारों को समाहित करने का अथक प्रयत्न करते रहेंगे।इस दिशा में हमारी प्रतिबद्धता किसी भी सन्देह से ऊपर है।हाँ हमें चाहिये आपका भरपूर प्यार और यदि आपको आवश्यक जान पड़े तो रचनात्मक सुझाव और समालोचना द्रष्टि।इस अवसर पर आप सबके जीवन में दीपावली का त्यौहार और कपासी चाँदनी उल्लास बिखेरती रह माटी की झोली में भी चांदनी की ये मिठास भरी खीलें पड़ती रहें यही हमारी कामना है ।