शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों

                            भारत के महानगरों की सड़कों पर भारत की आश्चर्य जनक विभिन्नता के अभावोत्पादक छवि चित्र देखे जा सकते हैं ।अपार वैभव की झलक के साथ दारुण ह्रदय विदारक भुखमरी ,उल्लास और करुणा का मर्म भेदी द्रश्य प्रस्तुत कर देते हैं \साढ़े आठ प्रतिशत से लेकर नौ प्रतिशत तक बढ़ी हुई आर्थिक विकास गति 40-50लाख से ऊपर की गाड़ियों में दोलायित रहती है।जब किसी क्रासिन्ग पर लाल बत्ती इन गाड़ियों को कुछ देर के लिये रोकती है तो इनके आस -पास कितनी ही याचना भरी आँखें गाड़ी में बैठी महिलाओं के कानों से झूलते स्वर्ण कुण्डल निहारती हुई दिखाई पड्ती हैं।आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता का यह  भयानक अन्तर गाड़ियों के पीछे लम्बी लगी मोटर साइकिलों में थोड़ा बहुत सन्तुलन पा लेता है पर राजमार्ग के फुटपाथ से लगे किनारों पर श्रमिकों की साइकिलों की लम्बी लाइनें वर्ग विभाजन की निचली रेखाओं सी जान पड़ती हैं। शासन व्यवस्था का प्रत्येक तन्त्र सभ्य समाज की सामाजिक व्यवस्था के प्रारम्भ से ही यह दावा करता रहा है कि शासन तन्त्र न्याय की समानता तो देगा ही पर उसके साथ आर्थिक समानता के लिये भी प्रयत्न शील रहेगा ।इतना अवश्य है कि आर्थिक समानता ज्यामित की रेखाओं की तरह एक जैसी नहीं होंगी पर इतना अवश्य होगा कि जिस आधार पर यह खड़ी की जायेगी वह आधार अपने युग के सभ्य जीवन स्तर का बोझ उठा लेने में समर्थ होगा ।अधिकाँश भारतवासी यह मानते हैं कि आर्थिक समानता की कुछ ऐसी ही व्यवस्था महानायक श्री राम के राज्य में स्थापित हो सकी थी और सम्भवत :इसीलिये महात्मा गान्धी के स्वराज्य  की कल्पना राम राज्य से मेल खाती थी ,जैसा अतीत में था वैसा ही चित्र आज भी दिखाई पडता है ।हर राजनितिक पार्टी आम आदमी की खुशहाली का काम करने का दावा करती है पर आम आदमी की परिभाषा अर्थवान निरूपण के सभी प्रयासों को नकारती दिखाई पड़ती है ।स्वर्ण धूलि में लोटते कार्पोरेट जगत के डायरेक्टरों के मुकाबले में दस हजार मासिक तनख्वाह पाने वाला चौकीदार ,चपरासी एक आम आदमी ही है और इन चौकीदार ,चपरासियों के मुकाबले में फटी धोती में शिशु को संभ्भाले कटोरी फैला कर भीख मांगती हुई दयनीय नारी को हम क्या कह कर पुकारें इसके लिये शब्द पाना कठिन होता है ।जनता से या जनता जनार्दन से जो अर्थपूर्ण ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं उनकों एक सुस्पष्ट व्याख्या में बाँधना एक दुष्कर कार्य है ।हीरों के जगमगाते अम्बारों और गन्दली नालियों में पलते शिशु समूहों के बीच का अंन्तर  तो सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है ।हाँ, यह दूसरी बात है कि कामन वेल्थ गेम्स के आयोजन के पखवारे में विदेशि यों की आँखे इस द्रश्य को न देख सकें इसके लिये पुलिस के आतंक के बल पर कोई अल्पकालीन व्यवस्था भले ही कर ली जाय ।
                       पर हम जिस अपार विभिन्नता की बात कर रहें हैं वह केवल आर्थिक धरातल पर ही सिमट कर नहीं रह जाती ।महानगरीय सड़कों पर आप वेष -भूषा ,केश -राशि का रख - रखाव ,वाहन चालन की भद्रता -अभद्रता और मौखिक मुद्राओं के न जाने कितने आश्चर्य भरे रूप देखे जा सकते हैं ।इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशाब्ध की समाप्ति तो होने जा रही है पर आप भारत की महानगरी की सड़कों पर बाइसवीं सदी के परिधानों ,प्रकारों ,और उत्तेजक आचरणों की झांकियां भी प्रचुर मात्रा में सहेज सकते हैं ।इसके साथ ही साथ साम्राज्यवाद का उन्नीसवीं सदी  वाला बोलचाल का वह लहजा भी सुननें को मिल जाएगा जब Properको Propah कहा जाता था और My lord मिलार्ड कहना वकील होने की शान मानी जाती थी ।इतना ही नहीं कई बार आप अट्ठारहवीं शताब्दी या उससे पीछे के मध्य युगीन काल की झलकियाँ भी पा सकतें हैं जब फारसी अपने हुस्न पर थी और खाने खाना होना दरबारी गौरव का चरम शिखर था ।महिलाओं की वेशभूषा की विभिन्नता ,उनकी केश -राशियों की गुम्फन -अगुम्फन शैली कभी हमें अजन्ता के गुफाकाल के चित्रण तक पहुंचाती दिखाई पड़ती है ।तो कभी उस आच्छादन युग की ओर जब अन्धकार ही नारी आकृति को देख सकता था।इतनी अपार विभिन्नता के साथ भारत सहस्त्रों काल से चलता ,रुकता , बढ़ता ,ठहरता ,गिरता -सँभलता ,गति मान रहा है और जब तक मानव श्रष्टि है शायद गतिमान रहेगा ।ज्ञात इतिहास के समुद्रगुप्त विक्रमादित्य काल को पहले इतिहास के विद्यार्थियों को स्वर्ण काल के रूप में चित्रित कर पढ़ाया जाता था पर अब कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले इतिहास विदों ने उसे स्वर्ण काल न कहकर पुकारने की अपील की है ।उनका कहना है कि उस काल में भी आम आदमी या सामन्य जन शोषित ही था ।प्रगति की क्या व्याख्या है इसे तो प्रगतिशील कहे जाने वाले विचारक ही जाने इनमें से कई विचारक तो राम -राज्य को भी शोषण व्यवस्था से मुक्त नहीं पाते ।पर सब इतिहासों से उठकर एक ऐसा इतिहास होता है जो अप्रयास ही संस्कारों द्वारा हमें मिलता है ।यही विश्वास हमें बताता है कि स्वयं मर्यादा में अपनी इ च्छा से बंधकर ही जब कोई शासक मर्यादा पुषोत्तम हो जाता है तो जन मानष उसे भगवान् के रूप में पूजने लगता है ।हमें अपने शासकों से जो हमारे ही प्रतिनिधि हैं इसी मर्यादा की अपेक्षा है ।पर्ण कुटी में रहकर राज्य का संचालन करना रामानुज भरत के जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी और भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों ।

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