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शुक्रवार, 31 मई 2013

अबाधित धार हो प्रभु स्नेह की तुम : तारिणी

 









अज अनन्त निर्विकार
प्राणनाथ करुनागार
निरुद्वेल निरुद्वेग
निश्चल सरोवर चेतसः।
अन्तरज्ञ सर्वज्ञ
शब्द सर्वथा निरर्थ
जानो सब नाथ
करो कृपा काश्यप पर।

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अबाधित धार हो प्रभु स्नेह की तुम
ह्रदय के केंद्र में स्थित शुभ्र आसन ।
मनस् की शुद्धता के स्रोत हो हे!
प्राण का उल्लास हो!
सर्वथा शरण लो प्रभु,
संशय सभी हे! दूर कर दो।
निरंतर तव चरण रत रहे जन और
स्नेह जल से आप्लावित।

शनिवार, 23 जून 2012

निशा से.. तारिणी अवस्थी की कानपुर ब्लागर्स असोसिएसन पर प्रथम रचना: स्वागत्





















हे निशे! कितनी विचित्र!
वर्षों से रोज़ मुझको कहीं
बहका के ले जाती हो तुम |
एकांत है चहु और
हम ही हैं प्रकाशित इस समय |


व्याप्त हो हर वास्तु में तुम
दृश्य में, अदृश्य में |
स्वयं रहती हो मगर
अदृश्य सुदृढ़-निश्चयेन |
औ' तुम्हारा मौन
आकृष्ट मुझको नित्य करता |


स्वर नहीं सुन पा रही हूँ
देख भी सकती नहीं,
लेकिन अगर इस सृष्टि में
बस एक तुम हो और मैं,
सोचती हूँ ठीक हो |


संचार होता है ह्रदय में
शक्ति का तव शांति से |


तव उपस्थिति से नहीं
एकांत में व्यवधान पड़ता,
अपितु यह एकांत कुछ
अधिक सुन्दर हो गया!


रातभर जागकर जभी
लगता है मनो कुछ कहें,
लो भाग निकलीं यों ही तुम
मैं रह गयी अवाक ही |


नींद से बोझिल नयन से,
देख मैं हूँ पा रही,
सूर्या की किरणों को आते,
बल्ब को कुछ क्षीण करते |
     ...... तारिणी अवस्थी