गुरुवार, 6 दिसंबर 2012

"Well begun is half done"

                            " Well begun is half done" जब दृढ निश्चय के साथ चल पड़े तो देर सबेर मन्जिल मिलेगी ही ,पर दृढ निश्चय को पूरी तरह से माप -तौल लेना प्रत्येक व्यक्ति के सामर्थ्य में नहीं होता।हम सब कई बार मिथ्या बड़पप्न का भ्रम पाले रहते हैं।अपनें भीतर ही छोटी -मोटी सफलता पा लेने के बाद हम अपने को सराहते रहते हैं।स्वाभमान शक्ति देता है पर मिथ्या अभिमान हमारी आन्तरिक शक्ति का अपब्यय है। हमें अपने साधारण होनें पर हीन भाव का शिकार नहीं बनना चाहिये।सच पूछो तो साधारण होकर ही असाधारण की ओर बढ़ा जा सकता है। अपनें जीवन के दैनिक सम्पर्क में हम भिन्न -भिन्न प्रकार के नर -नारियों के संपर्क में आते हैं। सच्ची सहजता एकान्त में ही होती है।थोड़ी बहुत सहजता परिवार में भी बनी रहती है । पर ज्यों ही हम बाहर के सम्पर्क में आते हैं सहज रहने का केवल बहाना बन जाता है। हम असहज हो जाते हैं। अन्जाने ही न जाने कितनें मुखौटे हमें लगाने पड़ जाते हैं। महापुरुषों की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि वे हर स्थिति में सहज रहते हैं । उनके पास कई चेहरे नहीं होते वे स्थिरता के आत्म संयम से सजायी हुई मनोंभूमि पर खड़े रहते हैं। महान होना एक दुर्लभ उपलब्धि है।महानता का चोन्गा पहन लेना बहुत कठिन नहीं हैं पर चोंगा तो चोन्गा है कभी न कभी उतर ही जाता है। इसलिये उचित यही है कि हम जो हैं , जो हमारी स्वाभाविक सामर्थ्य है उसे हमसच्चे मन से स्वीकार करे, यदि हम सामाजिक सेवा की बात करें तो अपना निजी स्वार्थ उसमें शामिल न करें। प्रशंसा की अभिलाषा भी एक निजी स्वार्थ ही है। अपना दुःख तो सभी झेलते हैं पर दूसरे के दुःख का हिस्सेदार होना ही बड़ा होना है। सन्त ह्रदय की बात करते हुए गोस्वामी जी लिखते हैं -" संन्त  ह्रदय नवनीत समाना , कहा कविंन पर कह बन जाना ।"
"निज परिताप द्रवय नवनीता, पर दुःख द्रवै सन्त सुपुनीता ।"
                                 सामान्य लोगों का ख्याल है कि सन्त होना सरल हैपर नेता होना कठिन। शायद वे ऐसा इसलिये सोचते हैं क़ि सन्त होने के लिये व्यक्ति को अपने मन पर अधिकार करना होता है जबकि नेता होने के लिये उसे दूसरों को भ्रमजाल  में फ़साना होता है। सामान्य व्यक्ति की यह सोच ठीक ही है क्योंकि सीधे -साधे पन  में वह समझता है कि अपने मन पर अधिकार पाना तो अपनी एक निजी बात है पर दूसरों के मन पर भ्रामक जाल फैलाना एक चमत्कारी काम  है।पर है ठीक इसके उल्टा सुहावना झूठ बोलना कोई बहुत बड़ी कला नहीं है इसके लिये केवल एक बात की आवश्यकता है आप इन्सान के चोले में गिरगिट बन जाइये ,हर मौसम में रंग बदलिये , हर प्रष्ठभूमि में छिपकर अद्रश्य रूप से अपना आहार तलाशिये। पर अपने मन पर अधिकार करना योग की सबसे विरलतम उपलब्धि है।यह चरम उपलब्धि तो संसार के बहुत थोड़े से महापुरुषों के भाग्य में लिखी होती है।
                                         अब इन दोनों परिस्थितियों के बीच एक और परिस्धिति है। समाज में रहकर हम गुहाओं , कन्दराओं या बन प्रान्तरों में रहनें वाले तपस्वियों की जीवन पद्धति का अनुसरण नहीं कर सकते। जीवन चलाने के लिये कुछ उद्योग करना होता है , कुछ सामाजिक गाँठ-जोड़ ,कुछ थोड़ा सा मिला -जुला झूठ -सच। यह कहना कि हमनें जीवन भर गलती ही नहीं की है जीवन की सच्चाई से इन्कार करना है। मानव शरीर पाया है तो सामाजिक जीवन जीने और समाज के स्वीक्रत माप दण्डों पर खरा उतरनें के लिये कुछ ऐसा भी करना पड़  जाता है जो हमें अपने भीतर बहुत अच्छा नहीं लगता।कई बार कुछ अरुचिकर भी करना पड़ता है,कई बार हम किसी से मिलना नहीं चाहते फिर भी मिलना पड़ता है , कई बार हम किसी का स्वागत नहीं करना चाहते फिर भी स्वागत करना पड़ता है\ कई बार गल्ती दूसरे की होती है पर भूल हमें स्वीकार करनी पड़ती है पर जीवन व्यापार में यह सब करके भी जब तक हमें अपने भीतर ग्लानि न उठने लगे अपने को छोटा नहीं समझना चाहिये हाँ ऐसी कोई बात या व्यवहार या अनुचित आचरण जो आपके मन में स्वयं के प्रति तिरष्कार पैदा कर दे उसे सर्वथा त्याग देना होगा। गृहस्थ होकर भी सन्तों के रास्तों पर चलने का यही एक सीधा ,सरल और सपाट मार्ग है। मंजीर बजाने और मशीनी ढंग से होठ हिलाने से मन में  उच्च वृत्तियों का सँचार हो जायेगा ऐसा सोचना बेमानी है।मैं जानता हूँ कि "माटी "के पाठक भारत के उस कोटि -कोटि जनसमुदाय का भाग हैं जो अपनी ईमानदारी की वृत्ति से अपने शारीरिक या मानसिक परिश्रम से जीवन यापन के साधन अर्जित कर ऊर्ध्वगामी विचारों की वायु में सांस लेना चाहते हैं।गलीज का कोई भी स्पर्श उन्हें ग्लानि से भर देता है। वे महामानव बननें का स्वप्न नहीं पाले हुए हैं पर वे मानव होकर भ्रष्ट होने का अपावन धब्बा भी अपने दामन से दूर रखना चाहते हैं।ऊपर कही हुई छोटी -मोटी सीखें और अनुभवों की अभिव्यक्तियाँ हमारे ऐसे सदाशयी पाठकों के विचारार्थ ही प्रस्तुत की गयीं हैं। "माटी "अपने पन्नों यह दावा करे कि उसमें पैगम्बरी सन्देश है या उसमें युग निर्माण की क्षमता है ऐसा करना उसे बडबोलापन लगता है।"माटी "का विस्तार अपार है , धरती विपुला है,जीवन संकुला है।"माटी " परिवार तो अपनी छोटी -मोटी खुर्पियों से खर -पतवार की निराई में लगा है शायद इस खर -पतवार के बीच कोई ऐसा बीज छिपा हो जिससे एक जीवनदायी वृक्षावली का प्रारम्भ हो जाय।हमारे प्रयत्नों की असफलता हमें कभी भी इतना हतोत्साहित नहीं करेगी कि हम प्रयत्न करना छोड़ दें ,पर जो भी आंशिक सफलता मिलेगी उसका श्रेय "माटी "के पाठकों को ही जायेगा मेरा व्यक्तिगत अहंकार उनके योगदान की महत्ता की स्वीकृति के राह में कभी बाधा बन कर नहीं खडा होगा ।

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