बुधवार, 12 दिसंबर 2012

"अकेला चना भाड़ नहीं फाड़ सकता "

अर्नाल्ड ट्वायनवी ,नोबेल पुरुष्कार विजेता इतिहासकार की मान्यता है कि यदि कोई देश विदेशी तकनीक ,विदेशी भेष -भूषा ,विदेशी खान -पान और जीवन निर्वाह की विदेशी शैली स्वीकार कर लेता है तो उस देश में रहनेवाले मानव समाज के मूल्य बोधों में भी परिवर्तन हो जाता है ।इस परिवर्तन में एक लम्बा समय लग सकता है ।क्योंकि किसी भी देश का सम्पूर्ण समाज एक साथ विदेशी विचार धारा की समग्र पकड़ में नहीं आता ।कई स्तरों पर 
और कई खण्डों में यह परिवर्तन चलता रहता है ।यही कारण है कि कई बार शताब्दियों तक सविंधान में लक्षित जीवन मूल्य जन समुदाय के एक विशाल हिस्से के भाग नहीं बन पाते ।ट्वायनबी नें मानव सभ्यता के भिन्न -भिन्न खण्डों से उदाहरण प्रस्तुत कर अपनी बात को वैज्ञानिक तर्क पर आधारित करनें का प्रयत्न किया है ।बीसवीं शताब्दी के मध्य तक मानव विकास के दिग्गज विद्वान यह मानकर चलते थे कि संस्कृति का सम्बन्ध मानव जाति की भिन्न नस्लों के साथ जुडा रहा है।मानव जाति को पाँच .छह नस्लों में बांटकर उनके साथ संस्कृतियों की भिन्नता को ब्याख्यायित करनें का प्रयास होता रहता था।फिर आये वे विद्वान न्रातत्व शास्त्री जिन्होनें प्रागैतिहासिक और ऐतिहासिक काल को मिथकों ,कल्पानाओं और म्रत्यु तथा जीवन से सम्बंधित अनुमानों को एक दूसरे का पूरक बताया।उनका कहना था कि नस्लवादी सांस्क्रतिक ब्याख्यायें अवैज्ञानिक हैं। प्रागैतिहासिक काल की बचकानी ,अधपकी पशु मानव चिन्तन पर आधारित अनुमान और कल्पनायें ही मिथिकीय रूप लेकर ऐतिहासिक काल में दार्शनिक अवधारणाओं को जन्म दे सकी थीं ।इस प्रकार संस्कृति का सम्बन्ध विशिष्ठ ,सामन्य या निम्न नस्लों के आधार पर व्याख्यायित करनें का अर्थ सभ्यता की विकास वाली धारणा को जड़ मूल से नकारना होगा।सस्क्रतियों की विभिन्नतायें वस्तुत :भौगोलिक ,जलवायुकि ,ब्रम्हांडीय और जीवन संरक्षणीय कारणों की अपार विभिन्नताओं के कारण अपने प्रारम्भिक रूप में उद्द्भुत् हुई थी।सहस्त्रों वर्षों के लम्बे काल में वे एक दूसरे के घुलती -मिलती और टूटती -जुडती रहीं ।कहीं परस्त्रण हुआ कहीं संकुचन ।कहीं विस्फोटन हुआ कहीं अवगुंठन इस प्रकार विश्व की कोई भी संस्कृति अपने में इतनी विशिष्ट नहीं है कि उसे अन्य संस्क्रतियों सर्वथा अलग एक नयी मानव जीवन शैली के रूप में स्वीकार कर लिया जाय।बहुत गहरायी से झाँकने पर हम पायेंगे कि अपने प्रारम्भिक काल में संस्कृति सभ्यता के साथ अभिन्न रूप से जुडी थी।उदाहरण के लिये मानव द्वारा नग्न शरीर को आच्छादन देने की क्रिया को लीजिये। प्रजनन से जुड़े शरीर के कुछ अंगों को विकास के जिस दौर में मनुष्य ने मनुष्य ने ढक कर सभ्य बननें का प्रयास किया वह प्रागैतिहासिक काल के उस दौर में पहुचता है जहाँ मनुष्य वनमानुष से अलग होकर अगले दो पैरों पर हाँथ बनाने की आदिम चेष्टा में रत था।सभ्यता की यह प्रक्रिया गोर ,पीले ,काले ,गेहुंए आदि किसी भी रंग या नाक ,आँख के किसी भी डिजाईन सर बिल्कुल मुक्त वनमानुषों की शाखा में से निकलकर आने वाली आज की मानव जाति की सबसे आदिम पीढी से था।व्यक्तिगत रूप से वहां भी अपार विभिन्नता रही होगी पर सामूहिक रूप से नग्न ,द्विपद वनचारियों का एक ऐसा समूह अस्तित्व में आ गया था जो सीधे खड़े होकर प्रजनन के लिए प्रयुक्त होने वाले अपनें शारीरिक अंगों को देख सकता था। धीरे -धीरे शताब्दियों तक चलते हुये प्रजनन व्यापार में उसे यह लगा होगा कि मिथुन की प्रक्रिया अकेले एकान्त में अधिक आनन्द दायक और बाधारहित होती है।प्रजनन के लिये प्रकृति द्वारा बनाये गये इन शारीरिक अंगों को आच्छादन से ढक लेने में उसे पशुओं से अलग अपनी वशिष्ट पहचान बनाने का एक मार्ग मिल गया । सामूहिक रूप से स्वीकृत हो जाने पर वस्त्र धारण मानव सभ्यता की सबसे सबल आधारभूमि बननें लगा।प्रागैतिहासिक काल में आच्छादन की भिन्नता क्षेत्र विशेष की वानस्पतिक भिन्नता पर आधारित रही होगी।सहस्त्रों वर्षों के विकास क्रम में शरीर का यह आच्छादन सहस्त्रों रूप में अपना रूप ,रंग बदलता रहा है । इस शारीरिक आच्छादन को हमें किसी संस्कृति विशेष से जोड़कर देखना न तो वैज्ञानिक लगता है और न ही तर्क संगत ।यह समझ में आने वाली बात है कि प्रारम्भिक अवस्था में शरीर को किसी भांति ढक लेना ही आवश्यक होता होगा और फिर सैकड़ों पीढ़ियों तक मस्तिष्क की तन्त्रिकाएं विकसित होकर परिधान के नये नये आकार खोजती रहीं । हाँथ ,पैर , ग्रीवा ,कटि और वक्ष की बनावट नें विकसित मस्तिष्क से नये परिधान रूपा कटियों की मांग की और इस प्रकार आज संसार के फैशन बाजारों में परिधान का निराला पन सभ्यता और विशिष्टता का प्रतीक बन गया ।जो बात वस्त्रों पर लागू होती है वही भोजन की अपार विभिन्नताओं पर भी ।बाधा रहित प्रजनन नें विपुल श्रष्टि की योजना बनायी और समूहों में बटकर आदिम मानव जाति जीवन का जोखिम उठाती हुई घनें जगलों ,गहरे दलदलों ,जलते रेगिस्तानों और ऊंचे पहाड़ों में घूम फिर कर भोजन की सहज उपलब्धता की तलाश करती रही ।यद्यपि आज धरती पर अहार की अपार विभिन्नता और चक्राकार विपुलता है पर फिर भी अभी तक सम्पूर्ण मानव जाति को भोजन उपलब्ध करनें की योजनायें फलीभूत नहीं हो पायी हैं ।खान पान की इस विभिन्नता को भी किसी विशेष प्रजाति से जोड़ने का अर्थ आधारभूत कारणों की नासमझी से ही संभव है । जो बात भोजन और आच्छादन की विभिन्नता पर लागू होती है वही बात शीत ,आतप और बरसात से बचने के लिये घरौंदे बनाने पर भी लागू होती है। गुफाओं से निकलकर गुफानुमा घरौंदे और फिर द्विपदी होने के कारण ऊँचाई पर पड़ा कोई आवरण जो शरीर को ढककर भी सिर को सुरक्षित रखे। यह बहुत छोटी -छोटी आदिम क्रियायें मानव सभ्यता का आधार रही हैं। आज आसमान छूती अट्टालिकाओं की बगल में बने छोटे -छोटे पोलीथीन से ढके घरौंदे जिन्हें हम झुग्गी -झोपडी कहतें हैं दरअसल मस्तिष्क की एक ही चिन्तन प्रक्रिया से जन्में हैं। यह सोचना कि अट्टालिकायें गोरी संस्कृति का प्रतीक है और घरौंदे काली संस्कृति का महज एक बचकानी समझ ही मानी जायेगी । हम अर्नाल्ड ट्वायनवी को सम्पूर्ण रूप से स्वीकार न करते हुये केवल इतना मान सकते हैं कि सभ्यता और संस्कृति निरन्तर एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है।पश्चिमी और पूर्वी संस्कृतियाँ कल तक बहुत अलग -अलग दिखायी पड़ रही थी पर आज एक मिली जुली विश्व संस्कृति समाज में उभर कर आती दिखाई पड़ती है। बंगाल के पूर्व मुख्यमन्त्री जब यह कहते हैं कि बाबरी मस्जिद का गिराना एक बारबैरिक घटना है तो वह सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि सभ्य मनुष्य मजहब के नाम पर हिन्सा या विध्वंस नहीं करता। आदिम या जंगली जातियां ही ऐसे काम कर सकती हैं।इस सबका अर्थ यह है कि विध्वंस और हिंसा से दूर रहना मानव सभ्यता का एक अनिवार्य गुण होना चाहिये ।अहिंसक बुद्ध और अहिंसक गाँधी इसीलिये बड़े हैं कि उन्होंने पशुबल को आत्मबल से नियंत्रित करने की बात कही है।इसी प्रकार विश्व की किसी भी सभ्यता में चोरी ,परस्त्रीगमन और बलात सम्पत्ति हरण निंदनीय कार्य माने जाते हैं।स्पष्ट है कि मानव संस्कृति में इनका बहुत महत्वपूर्ण योगदान है और एक सभ्य मनुष्य तभी संस्कृत बनता है जब वह इन निन्दनीय कार्यों से ऊपर उठ जाता है। दरअसल तानाशाही और साम्राज्यवाद के युगों में चिन्तन भी अहंकार की सीढ़ी पर चढ़कर अपना सर ऊंचा करनें लगता है । एक युग था जब यूनान की सभ्यता दुनिया में सर्वश्रेष्ठ मानी जाती थी। फिर रोम विश्व सभ्यता का केन्द्र बन गया। साम्राज्यवादी ब्रिटेन सैकड़ों वर्षों तक यह सोचता रहा कि उसकी सभ्यता ही संसार को सर्वश्रेष्ठ संस्कृति को जन्म दे सकती है । आज सारी दुनिया के आगे उसके अंहकार का खोखलापन साबित हो चुका है।अमेरिका का एक वर्ग भी इस गलतफहमी में पड़ गया कि अमेरिकन सभ्यता ही विश्व संस्कृति का आधार बनेगी। सौभाग्य वश अमेरिका में विचारकों का एक शक्तिशाली वर्ग अभी भी स्वस्थ्य चिन्तन में लगा हुआ है। उसे इस बात का अभिमान नहीं है कि दुनिया अमरीका की राह पर चले पर इस बात पर आग्रह जरूर है कि दुनिया जनतंत्र की राह पर चले। अब जनतन्त्र की धारणा पर भी चीन की अपनी दार्शनिक व्याख्या है और ईरान की अपनी। इन विवादों में पड़कर हमें मानव संस्कृति को खण्ड रूपों में नहीं देखना होगा। विश्व संस्कृति का विकास आदिम मानव के अन्तरिक्ष मानव तक विकसित होनें की अमर गाथा है। राष्ट्रीय सभ्यताओं के अपने -अपने चेहरे हैं। उन चेहरों पर अपने अपने टॉप ,मुकुट ,पगड़ियां ,टोपियाँ और केश अलंकृतियां है पर विश्व संस्कृति का आधार बननें के लिये जो मूलभूत उपादान आवश्यक हैं वे भारत की पावन मिट्टी में जन्में -पलें हैं और सदैव जन्मते -पनपते रहेंगे। बुद्ध का अष्ट मार्ग , गान्धी का अहिंसा दर्शन , नानक का मानव समानता का मूल मन्त्र यही तो है मानव संस्कृति का मूल आधार। यदि पश्चिम इन्हें यह कहकर स्वीकार नहीं करता कि ये सब भारत में जन्में हैं तो हम भारतवासी अहिंसा , क्षमा और दया के देवता ईसा मसीह को भी भारतीय बना लेने के लिये सहर्ष प्रस्तुत हैं।सूफी पैगम्बर शेख सलीम चिस्ती तो हमारे पास हैं ही और यदि जिहादी अपना जनून छोड़ दें तो हम मुहम्मद साहब को भी अपने गले का हार बना सकते हैं। भारत ही है जिसने सेकुलरीजम की नास्तिकवादी व्याख्या को नकारा है और उसे सर्व धर्म समभाव में ढाला है । यदि धर्म को हिंसा के द्वार से हटाना है तो भारत की सर्व धर्म सम भाव की धारणा ही विश्व को स्वीकार करनी पड़ेगी।कब ऐसा होगा "माटी "नहीं जानती पर ऐसा हुए बिना विश्व संस्कृति का मूल आधार दृढ नहीं किया जा सकता यह बात "माटी "को भलीभांति विदित हैं।"माटी " का हर अंक इस दिशा में एक नयी ईंट जोड़ रहा है। जोड़नें के इस पावन कार्य में आप सबका सहयोग अत्यन्त मूल्यवान है।व्यक्ति कितना भी महान क्यों न हो उसे किसी श्रेष्ठ उपलब्धि के लिये विचारशील समुदाय से सहयोग पाने की आवश्यकता होती है।इस देशी कहावत में एक बहुत बड़ा सत्य छुपा हुआ है "अकेला चना भाड़ नहीं फाड़ सकता "यह ठीक है कि कवि गुरू रवीन्द्र नाथ नें एकला चलो ,एकला चलो की आवाज लगायी थी पर उनकी यह आवाज किसी पवित्र लक्ष्य की ओर सम्पूर्ण निष्ठा से समर्पित होने के लिये ही थी। यदि कोई अकेला भी महान लक्ष्य की ओर अविचल क़दमों से बढ़ता है तो उसके पीछे कारवाँ बनता जाता है। उर्दू शायर की इस पंक्ति में आत्म विश्वाश के साथ गहरी सूझ -बूझ भी झलकती है ,"हम अकेले ही चले थे जानिबे मंजिल मगर ,हमसफ़र मिलते गये और कारवाँ बनता गया ।" माटी परिवार भी अपने विस्तार की ओर है। हंम चाहेंगे कि यह विस्तार एक जनपथ से दूसरे जनपथ से घेरता हुआ राज्य की सीमाओं तक पहुँचे और फिर राज्य की सीमाओं के आर -पार राष्ट्रीय व्याप्ति का उल्लेखनीय मापान्क प्राप्त करे। अब्दुल रहीम खानखाना के दोहे कभी -कभी गहरी मार करते हैं क्योंकि उनमें सहयोगी जीवन की अचूक अभिव्यक्ति पायी जाती है। "माटी " में जन्म पाते प्रसून पादप पल्लवित होकर पुष्पित होते जा रहे हैं इसकी हमें अपार खुशी है। साहित्यकारों का गोत्र बढ़ते देख कर हम कविवर रहीम के निम्न दोहे से निश्छल प्रसन्नता का भाव ग्रहण कर सकते हैं

" रहिमन यों सुख हॉत है बढ़त देखि निज गोत
ज्यों बड़ी अखियाँ निरख आँखिन को सुख हॉत।"
इसी कामना के साथ

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