मंगलवार, 20 नवंबर 2012

"माटी " के प्रकाशन की क्या आवश्यकता आ पड़ी ?

                      आप पूछ सकते है -और यह पूछना सर्वथा उचित ही होगा -हिन्दी में निकल रही न जाने कितनी पत्रिकाओं और प्रसारिकाओं के बावजूद "माटी "  के प्रकाशन की क्या आवश्यकता आ पड़ी ?ऐसा तो नहीं कि यह पत्रिका आपकी पहचान शून्यता को भरने का खोखला उपाय है -या कि आपके व्यक्तित्व की पराजित मनोचेतना छपाई के माध्यम से कोई मनोवैज्ञानिक उपचार तलाश रही है ? और भी अनेक उल्टे- सीधे , उलझे -सुलझे प्रश्न इस बारे में उठाये जा सकते हैं इस सन्दर्भ में मुझे इतना ही कहना है कि इस भूग्रह पर मेरी जीवन यात्रा का अपना एक अनुभव है और वह  मुझे विशिष्ट और निराला लगता है -भले ही दूसरों के लिये उसमें कुछ नया न लगे , मेरा विश्वाश है कि इस धरती पर मेरा आगमन और सफ़र के दौरान सन्चित जीवन मूल्य बाहिरी दुनिया से संचयित होने के बाद मेरी आन्तरिक चेतना की अग्नि में पक कर मेरी अपनी विशिष्टता की छाप  पा चुके हैं अत:मुझे उन जीवन मूल्यों को ब्यक्त करने का और समकालीन स्रजनात्मक मनीषा में  समानान्तर उभर रहे साथियों के सहयोग पाने का पूरा अधिकार है ।"माटी "का प्रकाशन इस दिशा में एक प्राराम्भिक कदम है।हो सकता है एक एक कदम आगे बढ़कर हम मानव निर्माण की उस मंजिल पर बढ़ चलें जो कंही मानव  समानता के आदर्शों की ओर पहुँचाती हो ,हो सकता है कि कुछ सिरफिरे साथी मेरे साथ चल पड़ें और फिर काफिला बन जाय और फिर यदि अकेला भी चलना हो तो उसमें संकोच क्या ?क्योंकि खोना तो कुछ है ही नहीं ,एकांत में ही आत्म अनुभूति का सच्चा ज्ञान हो  पाता है ,न जाने मुझे ऐसा क्यों लगता है कि हम ' माटी 'से कटकर कांक्रीट की मीनारों पर जा खड़े हुए हैं ?हम से मेरा अर्थ हिन्दी भाषा भाषी राज्यों का मध्यम वर्गीय जन समुदाय , मध्यम वर्ग  में भी यों तो कई स्तर हैं और सबसे निचले स्तर के घरों में अभी माटी की गन्ध आती है पर ज्यों ज्यों हम स्तर की ऊँचाई की ओर बढ़ते है यह गन्ध खडखडिया वाहनों की विषाक्त वहिर्गत साँसों में बदल जाती है माना कि तकनीकी युग में वृन्दावन में होनी वाली रास लीला की कल्पना ,उपहास की बात बन जाती हैं। माना कि सन्चार प्राद्योगिकी के युग में प्रवासी के गीतों की बात बचकानी लगती है ,माना कि अनुष्ठान से पवित्र नर -नारी सम्बन्ध की कल्पना प्रगतिशील कहे जाने वाले नर नारियों   के ओछे मजाक का विषय बन चुकी है पर मुझे कुछ ऐसा लगता है कि मैं अपने पूरे जीवन भर अप्रगतिशील कहे जाने का बोझ उठाना अच्छा समझूंगा बजाय इसके कि मैं भारत के सांस्क्रतिक अतीत और चिर प्रेरक जीवन मूल्यों से कट जाऊँ और मैं समझता हूँ कि मेरे जैसे कोटि -कोटि प्रौढ़ और बृद्ध तो इस चिंतन में मेरे साथ खड़े ही होंगे पर सम्भवत : कोटि -कोटि तरुण भी इन मुद्दों पर मेरे साथ खड़े होने में अपनी हेठी नहीं समझेंगे।यह सत्य हैअटूट और निर्विवाद सत्यकि काल सबको खा जाता है पर यह भी उतना ही अटूट और निर्विवाद सत्य है कि मानव सभ्यता में कंही कुछ ऐसा भी है जो कालजयी है और जिसके बिना सभ्य मानव की कल्पना भी नहीं की जा सकती इन्ही जीवन मूल्यों में हैं नर -नारी के शारीरिक सम्बन्ध की नैष्ठिक पवित्रता।इन्ही जीवन मूल्यों में है पशु प्रवृत्ति से पायी गयी काम चेतना  पर सभ्यता द्वारा निर्धारित सयंम व्यवस्था ।इन्ही जीवन मूल्यों में शामिल है वैभव के बेलगाम प्रदर्शन पर ज्ञानी पुरुषों का आक्रोश और सच्चे संतों द्वारा उसकी भर्त्सना ।वैदिक ऋचाओं  से लेकर बुद्ध और गान्धी तक आने वाली अपरिग्रह की विचारधारा यदि आधुनिक अर्थशास्त्र नकारता है तो उसे "माटी "स्वीकार नहीं करती ।माटी का और माटी से जुड़े हुए सामान्य जन व मनीषियों का यह निरन्तर प्रयास रहेगा कि जनता के लिये विधि पूर्वक भेजे गये सौ पैसे सत्रह या पांच बनकर उन तक न पहुचें इस दिशा में निन्यानवे का चक्कर माटी स्वीकार करती है।सौ की पूरी संख्या तक पहुचने के लिये वह सदैव कृत -संकल्पित रहेगी ।यक्ष के प्रश्न के उत्तर में युधिष्ठिर का यह बताना कि दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि लोग अपने आस -पास निरन्तर मरते हुए ब्यक्तियों को देखते हैं और फिर भी वे दुष्कर्मों की ओर और तेजी से झुकते हैं यह मानकर कि म्रत्यु उनके पास आयेगी ही  नहीं ।हमें इन पथ भ्रष्ट नर पशुओं को म्रत्यु का यह अहसास देना है जो उन्हें आचरण की पवित्रता पर सोचने को बाध्य करे ।हमारा प्रयास होगा कि माटी आप तक ताजी कटी हुई फसलों की सुगन्ध पहुचाये । हमारा प्रयास होगा कि "माटी " आपको "तमसो मा ज्योतिर्गमय "के व्यवहारिक रूप से रूबरू करे ।हमारा प्रयास होगा कि माटी बिल्लेसुर को विल्वेश्वर और बलचनमा को बालचन्द्र के रूप में देखने के लिये प्रेरित करे पर उन्हें अपनी मिट्टी में ही खड़ा करके विकसित होने दे।हम जानते हैं कि यह भगीरथ प्रयास है।हम जानते हैं कि यह टिटहरी का समुद्र भर देने का निष्फल प्रयास है।हम जानते हैं कि यह गिलहरी का लोट पोट कर सेतु निर्माण में सहयोग करने की सी हास्यास्पद योजना है।पर फिर भी न जाने क्यों माटी का संयोजक मण्डल और प्रेरक पुरुष चक्र मर मिटने की अदम्य लालसा लेकर आगे चल पड़ा है।अधूरे प्रयासों की श्रंखला भी मानव विकास की चिरन्तन प्रक्रिया में अनुल्लेखनीय नहीं मानी जानी चाहिये ।और फिर क्या पता अमस की पर्तों में ज्योति किरण कोई मार्ग बना ही ले।यह ठीक है कि हमसब मिट्टी के मटके हैं पर क्या यहआश्च्रर्य नहीं है कि मिट्टी का मटका भी राम राम बोल लेता है।कवि की यह पंक्ति "Dust Thou art,to dust returneth."एक अकाट्य सत्य है । पर एक ऐसी माटी भी होती है जो कभी नहीं मरती -जो मरण में से भी चिरन्तन जीवन के बीज स्फुरित करती है।"माटी "उपनिषद के मनीषियों को जन्म नहीं दे सकती ,ना ही "माटी "के माध्यम से बुद्ध ,गान्धी ,मार्टिन लूथर या मण्डेला आ पायेंगे पर" माटी "निश्चय ही किसी सूरदास (रंगभूमि ),बावन दास (मैला आँचल ),किसी पवेल (माँ ),किसी दशरथ मांझी (बिहार) ,या किसी बिलकिस बानों (गुजरात )को आगे ला पायेगी ऐसा हमारा विश्वास है ।                                        
                                 प्रगतिशील चिन्तकों ,विचारकों ,समर्थ जुझारू शब्दशिल्पियों और आदर्श के प्रति समर्पित सृजन शील रचना कारों से उर्जावान रचनाये पाकर "माटी "अपने को गौरवान्वित अनुभव करेगी ।"माटी " की गुणवत्ता या स्तरहीनता पर सुयोग्य पाठकों की प्रतिक्रियाएं साभार प्रकाशित की जायेंगी पर इतना तो अनुरोध आप मानेगे ही कि पत्रिका को पूरा पढ़े बिना अपनी प्रतिक्रियायें न भेजें ।
                                     
                       

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