रविवार, 20 फ़रवरी 2011

कानपुर की गंगा अब गंदानाला में तब्दील हो रही है. गंगा से कोई प्यार नही करता

 कानपुर गंगा  में प्रदूषण का मुख्य कारक टेनरियो का अवशिष्ट जल और सीवर का गन्दा पानी है. जाजमऊ में सारे सीवर और टेनरियो के नाले सीधे गिरते है. कहने को तो जल शोधन हेतु   संयंत्र लगाए गए है पर उनकी वास्तविकता के क्या है आइये जाने



सीवेज-टेनरियों से निकलता गंदा पानी
42.1 करोड़ लीटर
जाजमऊ में ट्रीटमेंट प्लांटों की क्षमता
17.1 करोड़ लीटर
वर्तमान में शोधित हो रहा गंदा पानी
8.5 करोड़
गंगा में रोज गिर रहा प्रदूषित पानी
33.6 करोड़ लीटर

गौर करने वाली बात है की लगभग ३४ करोड़ लीटर गन्दा पानी प्रतिदिन गंगा  में गिर रहा है. कोढ़ में खाज यह है की जाजमऊ का  90 इंच सीवर नाला धंस गया है जिसकी वजह से  ट्रीटमेंट प्लांट तक पानी नहीं पहुंच रहा है  और ऊपर से बहकर  होकर सीधे गंगा में गिर रहा है. प्रशासन की निरीक्षण टीम की ने मामले की लीपापोती के बाद  इसकी जिम्मेदारी का ठीकरा सम्बंधित विभागों पर फोड़कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है.
एक तो शहर में पहले ही प्रदूषित पानी का शोधन नहीं हो पा रहा है। उस पर सीवर का पानी ट्रीटमेंट प्लांट तक लाने वाली 100 साल पुरानी 90 इंच ट्रंकलाइन जाजमऊ चौकी के नीचे, छबीलेपुरवा व अन्य स्थानों पर धंस गयी है। जाजमऊ चौकी के पास मिंट्टी डालकर उसे पाट दिया गया।  11 जनवरी  २०११ को अपर नगर मजिस्ट्रेट द्वितीय, क्षेत्राधिकारी कैंट, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अभियंताओं व जल निगम के परियोजना अभियंता ने निरीक्षण किया था। निरीक्षण रिपोर्ट में कहा गया था कि 45 से 50 फीसदी ही सीवर का पानी ट्रीटमेंट प्लांट पहुंच पा रहा है। शेष डबका नाला से ओवरफ्लो होकर सीधे गंगा में गिर रहा है। इस पर जिलाधिकारी मुकेश कुमार मेश्राम ने जल निगम महाप्रबंधक सीएस चौधरी को पत्र भेज व्यवस्था कराने को कहा। जवाब में श्री चौधरी ने डीएम को पत्र लिखा कि जलकल विभाग व नगर निगम इस नाले की देखरेख करते हैं लिहाजा मरम्मत की कार्रवाई उन्हीं के स्तर से प्रस्तावित है। जलकल विभाग के महाप्रबंधक रतनलाल ने कहाकि जल निगम सीवरलाइन डलवाने का काम करा रहा है तो उसे ही वह काम भी कराना है। कुल मिलाकर अब तक यह तय नहीं हो पाया है कि इस लाइन की मरम्मत कौन करायेगा।
गंगा मर रही है और उसे मारने वाले हमी है. संस्कृति की दुहाई देने वाले वलेंताईन डे पर उछलकूद करने वाले मक्कार लोगो से कोई उम्मीद नहीं है. हम ब्लागर्स को इस दिशा में कदम उठाने होगे.
परिवर्तन दौड़ने से नहीं आएगा. परिवर्तन के लिए जमीनी स्तर पर काम करना पड़ता है जिसके लिए लोग एक दूसरे का मुह देखते है.
ये मुह दिखाई बंद कब होगी ?

7 टिप्‍पणियां:

  1. अफ़सोसनाक स्थिति है! हम असहाय बने देख रहे हैं।

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  2. कानपूर की गंगा हो या मुंबई का समुन्द्र या फिर जौनपुर की गोमती. सबका यही हाल है और चिंता का विषय है

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  3. प्रदुषण नियत्रण बोर्ड को सब दिखता है लेकिन वो जानबूझकर अँधा बना हुआ है . गंगा का पानी क्रोमियम की अधिकता से कानपुर में जहरीला हो गया है .

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  4. गंगा की म्रत्यु हमारी अस्मिता ,संस्कृति की म्रत्यु है

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  5. बहुत शर्मनाक स्थिति है यह। अफसोस कोई इसमें रूचि नहीं लेना चाहता।
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    ब्‍लॉगवाणी: ब्‍लॉग समीक्षा का एक विनम्र प्रयास।

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  6. सर्वप्रथम प्रदुशण से संबंधित इतनी सारी जनकारी हम सब तक पहुचाने के लिये आभार. आपके इस रिपोर्ट पर सहानुभुति के ढेरो शब्द उठेंगे पर कितने लोग इसके लिये आगे आते हैं ये बात देखने वाली होगी. देश मे सबसे बडी समस्या कथनी और करनी मे अंतर का है. आप इस मुहीम को आगे बढाइये मै यथा संभव सह्योग के लिये तैयार हूं.

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