शुक्रवार, 11 फ़रवरी 2011

एक दास्ताँ



 उन भुली बिसरी बातों में
खोई हूँ तुम्हारी यादों में
बीते थे वो सावन मेरे
बैठ के डाली पर तेरे
तुम्ही पर तो था प्यारा घोंसला मेरा
तुम्हारे हीं दम से था बुलंद हौंसला मेरा
तुम्ही पर रह मैंने चींचीं  कर उड़ना सीखा
जीवन की हर मुश्किल से लड़ना सीखा
काट कर कँहा ले गए तुम्हे इंसान ?
बन गए हैं ये क्यूँ हैवान ?
मुझे रहना पड़ता है इनके छज्जों पर
जीना पड़ता है हर पल डर डर कर 
मैंने तो खैर तुम पर कुछ साल हैं गुजारे
पर कैसे अभागे हैं मेरे बच्चे बेचारे
कुछ दिन भी वृक्ष पर रहना उन्हें नसीब न हुआ
कुदरती जीवन शैली कभी उनके करीब न हुआ
काश! वो दिन फिर लौट आये
हरे पेड़ पौधे हर जगह लहराए

3 टिप्‍पणियां:

  1. क्या बात कही
    वो दिन जरूर आयेगा
    हम लायेगे
    धरती की हरियाली के लिए संकल्प लिया है

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  2. काश! वो दिन फिर लौट आये, वो दिन जरूर आयेगा.......

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  3. its the time when wo require to do something in realty. and for thing there is a need that we must meet at some place for deciding that what could "KBA" could do for India.

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