शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

क्या कहा मर्द हूँ मै, फौलादी छाती है , फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?

क्या कहा मर्द हूँ मै ,फौलादी छाती है
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?
इसलिए कि मैंने साथ सत्य का लिया सदा ,
पर पाया जग का सत्य सबल की माया है ।
नैतिकता ताकत के पिंजड़े में पलती है ,
आदर्श छलावे की सम्मोहक छाया है ।
मै बुद्ध ,गान्धी को पढ़ गलती कर बैठा ,
सोचा दरिद्र नारायण हैं ,पग पूजूंगा ।
अपनी मछली वाली चट्टानी बाहों में ,
ले खड्ग सत्य का अनाचार से जूझूंगा ।
थे कई साथ जो उठा बांह चिल्लाते थे ,
समता का सच्चा स्वर्ग धरा पर लाना है ।
सोपान नये जय- यात्रा के रचने होंगे,
गांधी दर्शन का लक्ष्य मनुज को पाना है ।
पर चिल्लाकर हो गया बन्द उन सबका मुख ,
इस लिये कि उनके मुँह को दूजा काम मिला।
हलवा- पूड़ी के बाद ,पान से शोभित मुख ,
दैनिक पत्रों में छपा झूठ का नाम मिला ।
वे कहते अब भारत से हटी गरीबी है ,
रंगीन चित्र अब अन्तरिक्ष से आयेगें ।
अब उदर-गुहा में दौड़ न पायेंगे चूहे ,
भू कक्षा में वे लम्बी दौड़ लगायेंगे।
वे कहते बहुतायत की आज समस्या है ,
भण्डार न मिल पाते भरने को अब अनाज।
सब भूमि- पुत्र लक्ष्मी -सुत बनकर फूल गये ,
दारिद्र्य अकड कर बैठ गया है पहन ताज
छह एकड़ का आवास उन्हें अब भाता है ,
गृह- सज्जा लाखों की लकीर खा जाती है ।
हरिजन -उद्धार मन्च से अब भी होता है ,
हाँ बीच -बीच में अपच जँभाई आती है ।
मै आस -पास गिरते खण्डहर हूं देख रहा ,
सैय्यद चाचा का कर्जा बढ़ता जाता है।
प्रहलाद सुकुल ने खेत लिख दिये मुखिया को,
धनवानों का सूरज नित चढ़ता जाता है ।
चतुरी की बेटी अभी ब्याहने को बैठी ,
पोखरमल के घर रोज कोकिला गाती है।
क्या कहा मर्द हूँ मै फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रूलाई क्यों रह -रह कर आती है ?
कल के जो बन्धु -बान्धव थे ,थे सहकर्मी ,
सत्ता का देने साथ द्रोण बन भटक गये।
है उदर- धर्म पर बिका धर्म मानवता का ,
सच्चाई के स्वर विवश गले मे अटक गये।
युग़- पार्थ मोह से ग्रस्त खडा है धर्म छेत्र ,
है उसका क्या कर्तब्य न अब तक भान हुआ।
गाण्डीव शिथिल सो रहा पार्ष्व में अलसाया ,
चुप है विवेक का कृष्ण न गीता ज्ञान हुआ।
ताली पर देकर ताल थिरकते हैं जनखे ,
सत्ता- कीर्तन अब अमर काब्य कहलाता है।
भाषा भूसा बन गयी ,बीन भैंसे सुनती ,
हर क्षीण-वीर्य गजले गा मन बहलाता है।
वर्ण्-युक्त देह सतरंगी साड़ी से ढककर ,
कविता कामाक्षी कृमि बटोरे कर लाती है।
क्या कहा मर्द हूँ मै, फौलादी छाती है ,
फिर मुझे रुलाई क्यों रह -रह कर आती है ?

रविवार, 25 नवंबर 2012

प्रतिभा किसी देश काल से न बंधकर सम्पूर्ण मानव जाति को सम्बोधित करती है

                            कितनी बार ऐसा होता है कि हम भीड़ -भाड़ से हटकर एकान्त में बैठना चाहते हैं ।तपस्वी ,साधु और गुफावासी ऋषि -मुनि एकान्त  में रहकर ही परम सत्य की खोज करते है ।अपने अपने मापदण्डों के अनुसार वे इस परम सत्य का साक्षात्कार भी कर लेते हैं ।विश्व की हर सभ्यता में एक काल ऐसा रहा है जब अन्तिम सत्य पा जाने का दावा करने वाले खोजियों ने मनुष्य को संसार छोड़कर मुक्ति ,मोक्ष या अन्तिम सत्य की तलाश में लग जाने के लिये प्रेरित और प्रोत्साहित किया ।एकान्तवास कर सत्य अन्वेषण की इस पुकार को मिथ्या कह कर नकार देना अनुचित ही होगा ।पर इस सत्य को भी हमें स्वीकार करना ही होगा कि मानव सभ्यता के लगभग सभी टिकाऊ मूल्य जो सभ्यता के आधार स्तंम्भ बने हैं सामूहिक जीवन से ही प्राप्त हुये हैं ।एकान्तवासियों के लिए भी सामाजिक सम्पर्क की आवश्यकता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितना मनन चिन्तन के लिये एकान्त  की।सुदूर अतीत में शायद कभी ऐसा रहा हो जब अकेला व्यक्ति अपने भरण पोषण के लिये प्रकृति संसाधन एकत्रित  कर लेता हो पर बिना हम जोलियों के सहवास के उसे जीवन निरर्थक ही लगता होगा।विगत के सन्दर्भ आज उतने सटीक नहीं हैं और अब हम एकान्त वास की कल्पना अपने जीवन के उन प्राईवेट क्षणों से जोड़ सकते है जब हम दिन के चौबीस घन्टों में अपने निजी आवासों पर होते हैं ।पारिवारिक जीवन भी विशाल मानव समुदाय से अलग हटकर अक प्रकार का एकान्तवास ही है ।जो हमें जीवन के बड़े सत्यों की तलाश में प्रवृत्त करता है ।समाज शास्त्री आज एक मत से यह सिद्धांत स्वीकार कर चुके हैं कि सामूहिक  जीवन में ही मानव विकास की अजेय विजय यात्रा का सूत्रपात किया था और आज भी मानव समाज की सामाजिक भावना ही हमें विकास के लम्बे दौर में पहुंचा सकेगी ।व्यक्ति परिवार का भाग होता है ,परिवार ग्राम का ,ग्राम कबीले का ,कबीला क्षेत्र का ,क्षेत्र छोटे या बड़े राष्ट्र का और राष्ट्र छोटे या बड़े भूखण्ड का तथा भूखंडों की ईकाइयाँ अन्तर राष्ट्रीय समुदाय का।चेतना की ये सामूहिक ऊँचाइयाँ मानव विकास के सोपानो को चिन्हित करती हैं।हममें से अभी भी कुछ कबीले ,कुछ क्षेत्र या कुछ भूखण्ड अन्तर्राष्ट्रीय मानव समुदाय का एक सहज अंग नहीं बन सके हैं क्योंकि उनका चिन्तन विकास की पूरी गति नहीं प्राप्त कर सका है ।सच तो यह है की जो व्यक्ति जितना बड़ा होता है उसका चिन्तन भी उतना ही बड़ा होता है।इस बड़े चिंन्तन  के लिये आधुनिक या अत्याधुनिक होना ही आवश्यक नहीं है ।ऐसा चिंतन कम से कम भारतीय संस्क्रति के प्रभात में भी देखा जा सकता है ।अंग्रेजी भाषा के प्रसिद्ध कवि JohnDonneनें सत्रहवीं शताब्दी में ही कहा था "यह मत पूंछने जाओ कि चर्च का घण्टा बजकर किसकी मृत्यु की सूचना दे रहा है  वह तुम्हारी अपनी मृत्यु की सूचना है क्योंकि तुम मानव जाति का एक अविभाज्य अंग हो ।"आज विश्व का लगभग सभी शिक्षित जन समुदाय इस सत्य को स्वीकार कर चुका है भौगोलिक,क्षेत्रीय और राष्ट्रीय सीमायें मात्र प्रबन्धन पटुता के लिये बनायी गयी हैं उन्हें मानव जाति को विभाजित करने के लिए स्तेमाल नहीं करना चाहिये।कौन ऐसा शिक्षित भारतवासी है जिसने अमरीकी राष्ट्रपति  बराक ओबामा के चुनाव में गहरी दिलचस्पी न दिखायी हो।या फिर बँगला देश में शेख हसीना की जीत पर खुशी का इज़हार न किया हो।ऐसा इसलिये है कि अब किसी भी राष्ट्र के हित उसके पड़ोसी राष्ट्रों के साथ तो मिले जुले हैं ही पर साथ ही उन हितों का सम्बन्ध समस्त मानव जाति के विकास से भी है।ब्रिटेन में प्रधान मंत्री मैकमिलन ने साउथ अफ्रीका के अपने दौरे के दरमियान जब यह बात कही थी कि रंग भेद एकाध दशक में इतिहास के कूड़े कचरे में फेंक देने वाली नीति के रूप में जाना जायेगा तब साउथ अफ्रीका के श्वेत नेताओं ने उनकी तीखी आलोचना की थी।पर प्रधान मन्त्री मैकमिलन नें जिस दूर द्रष्टि का परिचय दिया था वह आज इतिहास का अमर सत्य है ।यदि कोई शिक्षित आधुनिक युवक चाहे वह किसी भी देश का हो अज यह मानता है कि रंग भेद के कारण या जाति भेद के कारण वह जन्म से ही अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ है तो उसे एक मानसिक रोगी ही करार दिया जायेगा ।विज्ञान ,कला ,साहित्य खेल ,शौर्य ,राजनीति अन्तरिक्ष अनुसन्धान और सत्य धर्म की खोज -कोई भी  तो ऐसा क्षेत्र नहीं है जिसमे हर रंग ,हर जाति ,और हर नस्ल के श्रेष्ठ लोगों नें अपनी पहचान न बनायी हो राजनीति के सत्ता गलियारों में आज उन विदेश मन्त्रियों को सच्चे राष्ट्रीय सेवको के रूप में लिया जाता है जो अपनी कुशल दूरगामी द्रष्टि के द्वारा विश्व जनमत को अपनी ओर आकर्षित कर लेते हैं ।सच तो यह है कि अन्तरराष्ट्रीय संगठनों से जुड़े रहने वाले प्रबुद्ध मनीषी प्रशासन को विशालता का एक नया आयाम देने में समर्थ होते हैं ।भारत के मध्ययुगीन सभ्यता में कुछ समय ऐसा था जब शारीरिक श्रम की महत्ता को पूरे गौरव के साथ स्वीकार नहीं किया गया ।हिन्दी भाषा के कुछ शब्द जो कर्म वाचक संज्ञाओं या विशेषणों के रूप में प्रयोग होते थे अपना महत्व खोकर हीन भाव के प्रतीक बन गये ।भाषा के विचारकों को इन शब्दों को नयी प्रान्जलता देकर फिर से सार्थक ऊचाइयों पर पहुचाने का प्रयास करना चाहिये ।जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के शोधार्थिओं ने कुछ आवश्यक काम किया है ।माटी इस दिशा में किये जा रहे प्रयत्नों की तलाश में है और भाषा शास्त्रियों से संपर्क साधे हुये है ।सार्थक सामाजिक श्रम से जुड़े कुछ समुदाय स्वयंम भी इस दिशा में प्रयत्न शील हैं ।उनके प्रयत्नों को एक वैज्ञानिक आधार देने की आवश्यकता है ।गहरी सूझ बूझ वाले माटी के पाठक इस बात से भली भाँती परचित होंगे की हम अपने लेखों और रचनाओं में विश्व के जाने माने विचारकों की बातें उद्धत करते रहते हैं।ऐसा इस लिए है कि हम यह बताना चाहते हैं कि अपने सर्वोत्कर्ष रूप में  ।माटी कई बार प्रतिभा किसी देश काल से न बंधकर सम्पूर्ण मानव जाति को सम्बोधित करती हैअपनी रचनाओं में ऐसे शब्द समूहों को भी निखारती रहती है जो अर्थ संकुचन के कारण व्यापक स्तर पर प्रयोग नहीं किये जाते ।ग्राम सभ्यता जे जुड़े कई शब्द कल तक भले ही ऊँचे कद के योग्य न माने गये हों पर आज तो उन्हें पूरे आदर के साथ स्वीकारना होगा।हलवाहा यदि हलधर होकर अपने पौराणिक प्रसंगों के कारण गरिमा मण्डित हो जाता है या पापी यदि तन्तुवाय के रूप में सार्थक वनता है तो हमें इन शब्दों का संसकारी करण करना होगा।ये मात्र सुझाव की एक द्रष्टि है।इस दिशा में भाषा विदों द्वारा कई अधिक सार्थक प्रयोग किये जा सकते हैं ।हो सकता है हमारे कुछ सफल राजनीतिज्ञ समाज के उन वर्गों से उठ कर आये हों जिन्हें भाषा की क्षेत्रीय मान्यताओं ने उपेक्षित किया हो।मुझे  विशवास है कि उनका वैदूर्य हिन्दी भाषा के शब्द संसकारी करण में भी एक भूमिका निभायेगा।

हम माटी के रचनाकार और पाठक सृजन की रहस्यमयी ईश्वरीय सृष्टि में कुछ और ज्योतिपुंज जोड़ सकेंगें?

                                            हिन्दी  भाषा में स्तरीय साहित्य का सृजन करने वाली प्रतिभा अभी तक आर्थिक निर्भरता का पायदान नहीं सहेज पायी है ।विश्वविद्यालयों में लगाई गयी पुस्तकें और सरकारी अनुदानसे संरक्षित प्रकाशनों की बात छोड़ दें तो ललित साहित्य का लेखन हिंदी में अभी भी दो जून की रोटी जुटाने में असमर्थ है।राष्ट्रभाषा का गौरव प्राप्त करने वाली लगभग चालीस करोड़ भारतीयों की मात्रभाषा         साहित्यकारों को यदि जीवन यापन का मूलभूत आधार भी प्रदान नहीं कर पाती तो हमें कंही गहरे जाकर हिन्दी -भाषा भाषियों की मनोवैज्ञानिक  टटोल करनी होगी।आश्चर्य है कि हिन्दी भाषा -भाषी मध्यवर्गीय शिक्षित परिवार अपनी मासिक आमदनी का एक प्रतिशत भी ललित साहित्य पर ब्यय करना नहीं चाहता।उसे अपनें अन्तर्मन की परिष्कृति के लिए श्रेष्ठ साहित्य की आवश्यकता महसूस ही नहीं होती।वह हल्के फुल्के अखबारी चुटकुलों ,सिने तारिकाओं की प्रेम कहानियों और अपहरण और बलात्कार की नशीली खुराकों से अपने को एक भ्रामक छलना में घेर कर जीवन यापन करता रहता ह।उसे लगता ही नहीं कि भीतर का परिमार्जन उत्क्रष्ट विचारों और सर्वकालीन सांस्क्रतिक मूल्यों के विना संम्भव ही नहीं हो पाता।इसके पीछे हिंदी भाषा -भाषी प्रदेशों की भीषण गरीबी तो है ही पर साथ ही कहीं धार्मिक प्रवचनों की वाचिक परम्परा से निरंतर जुड़े रहने की अपरिहार्यता भी है ।उसे शताब्दियों से यही समझ दी जाती रही है कि धार्मिक प्रवचनों और दैनिक पूजा अनुष्ठानों से उसे आत्मदीप्ति मिल जाती है और बाकी अन्य ललित साहित्य कुछ विशेष पढ़ाकू या लिखाकू लोगों के बीच चर्चा के लिए ही लिखा जाता है।ऐसा संभवत :इसलिए भी रहा है कि परतन्त्रता के सैकड़ों वर्ष के लम्बे काल में पौराणिक कथा कहानियों और क्षेत्रीय साधुओं ,संन्तों और महन्तों के माध्यम से ही उन्हें भौतिक जीवन से परे मानव अस्तित्व के रहस्यात्मक पहलुओं से परचित कराया जाता था।स्वर्ग -नर्क,मोक्ष ,जन्म ,पुनर्जन्म ,वैभव ,दारिद्र्य ,वर्ग .वर्ण .लिंग और फेथ सभी कुछ एक बहुत पुरानी घिसी -पिटी तर्क पद्धति से भजनीकों और अर्ध शिक्षित ज्योतिषियों और पुरोहितों द्वारा सामन्य जन मानष में  भर दिए गए थे।वहां कोई तर्क नहीं था।वहां कोई प्रश्न नहीं था।वहाँ गणित की सम्पूर्ण समाधान क्षमता बतायी गयी बातों को सहज रूप से स्वीकार करनें में व्योहस्त होती थी।विपुल ब्रम्हाण्ड के विस्मय भरे रहस्य को जान लेने का अदम्य जीवट संजोये मानव मस्तिष्क की अपार क्षमता का घिसे -पिटे मार्ग के अतिरिक्त और भी कोई मार्ग हो सकता है ऐसा मानना शताब्दियों तक हिन्दी भाषा -भाषी समाज में असुरत्व की ओर बढ़ना माना जाता था।जीवन जीने की शत -शहस्त्र मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों को एक काष्ठ घेरे में बन्द  कर किसी पूर्व निश्चित लीक पर चलने की बाध्यता ने हिन्दी भाषी समाज को काफी हद तक संवेदन शून्य बना दिया।ललित साहित्य को निरर्थक समझ कर उस पर किये गए व्यय को भी कही न कहीं लीक से अलग हटकर चलना मान लिया गया। यह धारणा इतनी गहरायी से अधिकाँश हिन्दी बोलने वालों के मन में जड़ें जमा चुकी हैं कि साहित्य पर किया गया व्यय अपव्यय के रूप में स्वीकृत हो चुका है।संभ्रांन्त ,प्रतिष्ठित ,अतिशिक्षित और उच्च पदस्त हिन्दी भाषा भाषी घरों में भी हिन्दी के ललित साहित्य की श्रेष्ठ रचनायें यदा कदा ही देखने को मिलती हैं।अंग्रजी में छपी भारतीय लेखकों की भारतीय परिवेश से नितान्त कटी  हुई किस्सा कहानियां  वहाँ वहुतायत से देखने को मिलेंगी पर हिन्दी के तरुण रचनाकारों की कोई भी पुस्तक वहां मिलना शायद मुमकिन ही  नहीं है ।यह बात दूसरी है कि ऊँची कक्षाओं में लगायी गयी कुछ उपन्यास ,कहानियाँ या आलोचना -ग्रन्थ वहाँ मिल जायँ ।
                                     व्यापार में सफल होने वाले लोग या राजनीति में तिकड़म से ऊँचाई में पहुचे हुये लोग शायद यह समझते हों कि कविता ,कहानी ,उपन्यास या साहित्य की ललित विधा के अन्य प्रकार विना प्रयास के ही जन्म ले लेते हैं।उनके लिये किसी साधना या लम्बे समय की मनोवैज्ञानिक तैय्यारी की आवश्यकता नहीं होती।उन्हें यह जान लेना चाहिये कि एक श्रेष्ठ कविता ,एक श्रेष्ठ कहानी ,एक श्रेष्ठ संस्मरण ,एक श्रेष्ठ औपन्यासिक कृति,एक श्रेष्ठ निबन्ध या लिखित अभिव्यक्ति का एक और कोई श्रेष्ठ आकार एक गहरी साधना और एक लम्बे समय की माँग करता है हाँ इसके लिये एक विशेष प्रकार की प्रतिभा भी अपेक्षित होती है जिसे प्रक्रति जन्य कहा जा सकता है।एक ब्रैड मैन ,एक सचिन तेन्दुलकर ,एक सोवर्स या एक धोनी निरन्तर अभ्यास के द्वारा ही श्रेष्ठता के शिखर पर पहुचें हैं पर मात्र अभ्यास या समय उन्हें उस ऊँचाई पर नहीं ले जा सकता जिस पर वे खड़े हैं।यदि उनमें नैसर्गिक खेल प्रतिभा न होती।अपने श्रेष्ठतम प्रदर्शन के दौरान क्रिकेट प्रेमी समाज उन्हें आदर और सम्मान के साथ ही साथ एक ऐसी आर्थिक सुद्रढ़ता भी प्रदान करता है जो उन्हें पूरे जीवन के लिये सशक्त और सामर्थ्यवान बना देता है।श्रेष्ठ साहित्यकार के लिये हिन्दी भाषा-भाषी समाज ऐसा क्यों नहीं कर पाता इस पर हमें मनन करना होगा।प्रेम चन्द्र जी और निराला जी का सारा जीवन अदम्य जीवट और भीषण  संघर्ष की कहानी रहा है ।जिन साह्त्यकारों का पारवारिक आधार आर्थिक रूप से सुद्रढ़ रहा हो उनकों छोड़ दें तो वाकी के लिये यदि आजीविका का अन्य कोई मार्ग नहीं है तो साहित्य रचना अभाव के संकट भरे द्वारों की ओर ही ढकेलती रहती है।विश्वविद्यालय या महाविद्यालय या माध्यमिक विद्यालयों में शिक्षण कार्य पा जाने वाले साहित्यकार भले ही आर्थिक सुरक्षा पा जाते हों पर डिग्रियों की उच्चतम ध्वजा पताकाओं से दूर रहने वाले सैकड़ों सशक्त साहित्यकार अभाव का  दयनीय जीवन विताने पर विवश हैं।सरकार उनके लिये कुछ करे या न करे यह सरकार चलाने वालों की अपनी सोच है ।पर हम शिक्षित भाषा -भाषी लोगों का यह कर्तब्य अवश्य बन जाता है कि हम श्रेष्ठ रचनाओं और उन रचनाओं को प्रकाशित करने वाली पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने की आदत डाले।साहित्य अपने भब्यतम रूप में ईश्वरीय गौरव से मण्डित होता है।ईश्वर की आराधना करने वाला व्यक्ति जैसे पूजा को अपनी दिनचर्या का एक अनिवार्य तत्व मानता है ठीक वैसे ही हिन्दी भाषा -भाषी साहित्य प्रेमियों को ललित साहित्य को जन मानस तक पहचानें वाली रचनाओं और पत्रिकाओं को खरीद कर पढ़ने की आदत डालनी होगी।हम कोटि कोटि जन यदि अपने सशक्त ,चरित्रवान ,तरुण शब्द शिल्पियों का संवर्धन ,सरंक्षण नहीं कर सकते तो निश्चय ही हमारे लिये शर्म की बात है।निरन्तर सरकारी आश्रय की मांग करना यह स्वीकार करना होगा कि हम हिन्दी भाषी वैसाखियों के बिना सांस्क्रतिक विकास के मार्ग पर चल ही नहीं सकते।
                                                         "माटी "निरन्तर इस चेष्टा में निरत है कि उसमें स्थान पाने वाली श्रेष्ठ रचनाओं के रचयिताओं को सम्मान- राशि के रूप में प्रोत्साहन दिया जाय।हम नहीं जानते कि हमारे सीमित साधन हमें कब उस आर्थिक आधार भूमि पर खड़ा कर पायेंगे जहां हम अपनी आंतरिक इच्छाओं को मूर्तरूप दें सकें।पर हमारे प्रयास के ईमानदारी में कोई खोट नहीं हैं ऐसा विश्वाश  हम अपने रचनाकारों को दिलाना चाहेंगे ।"माटी" के सौभाग्य से प्रतिभाशील लेखकों की उत्क्रष्ट रचनायें हमें मिलती जा रहीं हैं ।सभी रचनाओं का प्रकाशन प्रत्येक अंक में संभव नहीं हो पाता पर हम चुनी हुई रचनाओं को सुविधा नुसार आगामी मासिक अंकों में प्रकाशित करते रहेंगें ।यदि पाठक किसी रचनाकार के बारे में अधिक जानकारी पाना चाहें तो सम्पादकीय कार्यालय से सम्पर्क स्थापित कर सकते हैं ।प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि वे साहित्य की समझ रखने वाले अपने अन्य साथियों को भी माटी पढने के लिये प्रेरित करें । सिनेमा या क्रिकेट का इन्टरटेन्मेंट (मनोरन्जन )सामन्य जन तक भी सीधे पहुँच जाता है पर साहित्य को समझने ,सराहने के लिये एक उच्च मानसिक स्थिति की आवश्कता होती है ।"माटी "के प्रबुद्ध पाठक ज्ञान -विज्ञान के प्रसार का केन्द्र बिंदु बनकर साहित्यिक पुनर्जीवन के लिये नयी चेतना के चक्रों का निर्माण कर सकते हैं।चेतना के जिस धरातल पर आज मानव जाति खाड़ी है उसमें धरती का छोटापन और उभर कर हमारे सामने खड़ा हो गया है।भारत का चंद्रयान सितारों की खोज करके वापस आ गया है।विश्व मानव की तारपथी दौड़ में भारत भी कहीं खड़ा है इसका अहसास हमें गर्व से भर देता है। हम "माटी "के रचनाकार और पाठक सृजन की रहस्यमयी ईश्वरीय सृष्टि में कुछ और ज्योति पुंज जोड़ सकेंगे ।इसी कामना के साथ -
गिरीश कुमार त्रिपाठी

शुक्रवार, 23 नवंबर 2012

भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों

                            भारत के महानगरों की सड़कों पर भारत की आश्चर्य जनक विभिन्नता के अभावोत्पादक छवि चित्र देखे जा सकते हैं ।अपार वैभव की झलक के साथ दारुण ह्रदय विदारक भुखमरी ,उल्लास और करुणा का मर्म भेदी द्रश्य प्रस्तुत कर देते हैं \साढ़े आठ प्रतिशत से लेकर नौ प्रतिशत तक बढ़ी हुई आर्थिक विकास गति 40-50लाख से ऊपर की गाड़ियों में दोलायित रहती है।जब किसी क्रासिन्ग पर लाल बत्ती इन गाड़ियों को कुछ देर के लिये रोकती है तो इनके आस -पास कितनी ही याचना भरी आँखें गाड़ी में बैठी महिलाओं के कानों से झूलते स्वर्ण कुण्डल निहारती हुई दिखाई पड्ती हैं।आर्थिक सम्पन्नता और विपन्नता का यह  भयानक अन्तर गाड़ियों के पीछे लम्बी लगी मोटर साइकिलों में थोड़ा बहुत सन्तुलन पा लेता है पर राजमार्ग के फुटपाथ से लगे किनारों पर श्रमिकों की साइकिलों की लम्बी लाइनें वर्ग विभाजन की निचली रेखाओं सी जान पड़ती हैं। शासन व्यवस्था का प्रत्येक तन्त्र सभ्य समाज की सामाजिक व्यवस्था के प्रारम्भ से ही यह दावा करता रहा है कि शासन तन्त्र न्याय की समानता तो देगा ही पर उसके साथ आर्थिक समानता के लिये भी प्रयत्न शील रहेगा ।इतना अवश्य है कि आर्थिक समानता ज्यामित की रेखाओं की तरह एक जैसी नहीं होंगी पर इतना अवश्य होगा कि जिस आधार पर यह खड़ी की जायेगी वह आधार अपने युग के सभ्य जीवन स्तर का बोझ उठा लेने में समर्थ होगा ।अधिकाँश भारतवासी यह मानते हैं कि आर्थिक समानता की कुछ ऐसी ही व्यवस्था महानायक श्री राम के राज्य में स्थापित हो सकी थी और सम्भवत :इसीलिये महात्मा गान्धी के स्वराज्य  की कल्पना राम राज्य से मेल खाती थी ,जैसा अतीत में था वैसा ही चित्र आज भी दिखाई पडता है ।हर राजनितिक पार्टी आम आदमी की खुशहाली का काम करने का दावा करती है पर आम आदमी की परिभाषा अर्थवान निरूपण के सभी प्रयासों को नकारती दिखाई पड़ती है ।स्वर्ण धूलि में लोटते कार्पोरेट जगत के डायरेक्टरों के मुकाबले में दस हजार मासिक तनख्वाह पाने वाला चौकीदार ,चपरासी एक आम आदमी ही है और इन चौकीदार ,चपरासियों के मुकाबले में फटी धोती में शिशु को संभ्भाले कटोरी फैला कर भीख मांगती हुई दयनीय नारी को हम क्या कह कर पुकारें इसके लिये शब्द पाना कठिन होता है ।जनता से या जनता जनार्दन से जो अर्थपूर्ण ध्वनियाँ उच्चरित होती हैं उनकों एक सुस्पष्ट व्याख्या में बाँधना एक दुष्कर कार्य है ।हीरों के जगमगाते अम्बारों और गन्दली नालियों में पलते शिशु समूहों के बीच का अंन्तर  तो सभी को स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ता है ।हाँ, यह दूसरी बात है कि कामन वेल्थ गेम्स के आयोजन के पखवारे में विदेशि यों की आँखे इस द्रश्य को न देख सकें इसके लिये पुलिस के आतंक के बल पर कोई अल्पकालीन व्यवस्था भले ही कर ली जाय ।
                       पर हम जिस अपार विभिन्नता की बात कर रहें हैं वह केवल आर्थिक धरातल पर ही सिमट कर नहीं रह जाती ।महानगरीय सड़कों पर आप वेष -भूषा ,केश -राशि का रख - रखाव ,वाहन चालन की भद्रता -अभद्रता और मौखिक मुद्राओं के न जाने कितने आश्चर्य भरे रूप देखे जा सकते हैं ।इक्कीसवीं शताब्दी के प्रथम दशाब्ध की समाप्ति तो होने जा रही है पर आप भारत की महानगरी की सड़कों पर बाइसवीं सदी के परिधानों ,प्रकारों ,और उत्तेजक आचरणों की झांकियां भी प्रचुर मात्रा में सहेज सकते हैं ।इसके साथ ही साथ साम्राज्यवाद का उन्नीसवीं सदी  वाला बोलचाल का वह लहजा भी सुननें को मिल जाएगा जब Properको Propah कहा जाता था और My lord मिलार्ड कहना वकील होने की शान मानी जाती थी ।इतना ही नहीं कई बार आप अट्ठारहवीं शताब्दी या उससे पीछे के मध्य युगीन काल की झलकियाँ भी पा सकतें हैं जब फारसी अपने हुस्न पर थी और खाने खाना होना दरबारी गौरव का चरम शिखर था ।महिलाओं की वेशभूषा की विभिन्नता ,उनकी केश -राशियों की गुम्फन -अगुम्फन शैली कभी हमें अजन्ता के गुफाकाल के चित्रण तक पहुंचाती दिखाई पड़ती है ।तो कभी उस आच्छादन युग की ओर जब अन्धकार ही नारी आकृति को देख सकता था।इतनी अपार विभिन्नता के साथ भारत सहस्त्रों काल से चलता ,रुकता , बढ़ता ,ठहरता ,गिरता -सँभलता ,गति मान रहा है और जब तक मानव श्रष्टि है शायद गतिमान रहेगा ।ज्ञात इतिहास के समुद्रगुप्त विक्रमादित्य काल को पहले इतिहास के विद्यार्थियों को स्वर्ण काल के रूप में चित्रित कर पढ़ाया जाता था पर अब कुछ प्रगतिशील कहे जाने वाले इतिहास विदों ने उसे स्वर्ण काल न कहकर पुकारने की अपील की है ।उनका कहना है कि उस काल में भी आम आदमी या सामन्य जन शोषित ही था ।प्रगति की क्या व्याख्या है इसे तो प्रगतिशील कहे जाने वाले विचारक ही जाने इनमें से कई विचारक तो राम -राज्य को भी शोषण व्यवस्था से मुक्त नहीं पाते ।पर सब इतिहासों से उठकर एक ऐसा इतिहास होता है जो अप्रयास ही संस्कारों द्वारा हमें मिलता है ।यही विश्वास हमें बताता है कि स्वयं मर्यादा में अपनी इ च्छा से बंधकर ही जब कोई शासक मर्यादा पुषोत्तम हो जाता है तो जन मानष उसे भगवान् के रूप में पूजने लगता है ।हमें अपने शासकों से जो हमारे ही प्रतिनिधि हैं इसी मर्यादा की अपेक्षा है ।पर्ण कुटी में रहकर राज्य का संचालन करना रामानुज भरत के जीवन की सबसे बड़ी सफलता थी और भारत आशा भरी द्रष्टि लेकर उन नवयुवक जन प्रतिनिधियों की ओर देख रहा है जो भरत परम्परा को पुनर्जीवित करने की क्षमता रखते हों ।