कहने को तो संविधान मे
समान कार्य के लिये समान वेतन का प्रावधान है, किंतु व्यवहार मे यह
प्रावधान कूडा बन गया है. मै यहा सेल्फ फाईनेंस संस्थाओ मे कार्य कर रहे
शिक्षको के प्रति आप लोगो का ध्यान आकर्षित करना चाहता हू. वैसे तो निजी
क्षेत्रो मे कार्यरत सभी कर्मचारियो की स्थिति बन्धुआ और बेगारो जैसी हो
गयी है लेकिन जो समाज की संरचना मे मुख्य भूमिका निभा रहे है उनकी खस्ताहाल
स्थिति को देखते हुये यह कहना मुश्किल नही कि देश किस दिशा मे जा रहा है.
निजी स्कूलो महाविद्यालयो और तकनीकी संस्थाओ मे कार्यरत शिक्षक अवसादी
मानसिकता के शिकार हो गये है. निजी कालेजो के प्रबन्धक 'इंफ्रास्टक्चर' और
अन्य वाहियात चीजो मे जम कर इनवेस्ट करते है किंतु वेतन और अवकाश के नाम
पर धेला भर. शिक्षक की मजबूरी है कि उसे नौकरी से रोटी और दाल खरीदना है.
वैसे भी एक अनार और सौ बीमार वाली स्थिति है. तकनीकी संस्थाओ और
महाविद्यालयो मे फ्रेशर के दम से क्लासेज चलती है. जिसमे क्वालिटी के नाम
पर भ्रामक लेक्चर दिये जाते है. नाच गाने नौटंकी के नाम पर कालेज किसी नामी
गिरामी होटल को टक्कर देते मिल जायेंगे. महिला शिक्षको की एकमात्र ड्यूटी
सेंट वेंट लगा कर लिपपुत कर मैनेजर या चीफ गेस्ट के आगे पीछे मुसकान
चिपकाये चलना फिरना ही रह गया है. इन कालेज मे आने वाले छात्र भी मौज मस्ती
करते पूरा सेशन बिता देते है क्योकि उन्हे मालूम है कि नकल कर ले तो पास
ही हो जाना है. शिक्षा के इस बलात्कार की ओर हमारे युवा मुख्यमंत्री जी कब
ध्यान देंगे? स्थिति बद से बदतर होती जा रही है. शिक्षा और शिक्षको लत्ता
करके कोई भी व्यवस्था ज्यादा दिन तक चल नही सकती समय रहते इस मुद्दे पर न
चेता गया तो भारत का अस्तित्व समाप्त होते देर नही लगेगी.
कानपुर मात्र उद्योगों से ही सम्बंधित नहीं है वरन यह अपने में विविधता के समस्त पहलुओ को समेटे हुए है. यह मानचेस्टर ही नहीं बल्कि मिनी हिन्दुस्तान है जिसमे उच्चकोटि के वैज्ञानिक, साहित्यकार, शिक्षाविद राजनेता, खिलाड़ी, उत्पाद, ऐतिहासिकता,भावनाए इत्यादि सम्मिलित है. कानपुर ब्लोगर्स असोसिएसन कानपुर के गर्भनाल से जुड़े इन तथ्यों को उकेरने सँवारने पर प्रतिबद्धता व्यक्त करता है इसलिए यह निदर्शन की बजाय समग्र के प्रति समर्पित है.
गुरुवार, 23 मई 2013
मंगलवार, 7 मई 2013
बच्चो पर अब तो रहम करें ...
इन दिनों हमारे यहा कितनी ज्यादा गर्मी और उमस हो रही है ..बर्दाश्त के बाहर है ये मौसम ..सुबह छह बजे से ही घर के बाहर कदम रखने की हिम्मत नही होती ...इसके बावजूद हमारे यहाँ के स्कूल अभी भी खुले हुए है ....बच्चे दो -दो बजे इस भीषण गर्मी में ट्रेफिक जाम से जूझते हुए घर पहुचते है ..हालाँकि स्कूलों की छुट्टी अब घंटे भर पहले होने लगी है ..पर बच्चों के घर पहुचने के समय में कोई ज्यादा अंतर नही आया .....बहुत से स्कूलों में तो खुले मैदान में प्रार्थना ,खेल के घंटे .भी पूर्ववत ही है.पानी भी टीचर की परमीशन के बाद .मुश्किल से पीने को मिलता है .अच्छी -खासी फीस देने के बावजूद .कक्षाओं में पंखे बंद रहते है ...रोज़ ही बच्चे बेहोश होकर स्कूल में ही गिर रहे है ....और पढाई भी न के बराबर हो रही है ....तो क्यों न अब स्कूल से बच्चो को छुट्टी दे दी जाये ......ताकि बच्चे अनावश्यक कष्ट से बच सकें और उन्हें बीमार होने से भी बचाया जा सके ..
मंगलवार, 23 अप्रैल 2013
प्रथम मनु पिता नही, मा थी.. डा निर्मोही
कल डा निर्मोही से मुलाकात हुयी, डा निर्मोही फर्रुखाबाद के रहने वाले है. हिदू समाज की बनी बनाई मान्यताओ की धज्जिया उडाकर आजकल निर्मोही जी खूब सुर्खिया बटोर रहे मैने इनके साहित्य और शोधलेख को पढा. वाकई तर्क बहुत जोरदारी से रखे है डाक्टर साहब ने. अभी मै इनको पढ रहा हू, इनके आलेख जवाब मांगते है उन मठाधीशो से जो हिन्दू समाज के ठेकेदार बने बैठे है. एक उदाहरण मै देता हू .."हम सब मनु की संताने है यह बात सही पर मनु पिता न होकर माता थी, मनुश्यो के पिता तो कश्यप थे.
उन्ही कश्यप को ब्रम्हा की उपाधि दी गयी . कश्यप की 13 पत्नियो मे से मनु से मानव दिति से दानव अदिति से आदित्य या सुर ऋग्वेद मे प्रयुक्त 'मनुष्पिता' 'मनुरायेजेपिता' 'मनुवृणातापितानस्ता' जैसे शब्दोके अर्थ भाष्यकारो ने गलत किया और वही ट्रेंड चलता आया. यह शब्द दक्ष के लिये प्रयुक्त किया गया है जो मनु के पिता थे..
दूसरा कि सृस्टि की रचना के समय एक कहानी आती है कि ब्रम्हा अकेलेपन से उबकर दो होना चाहा और अपने अन्दर से एक स्त्री को प्रकट किया फिर सृष्टि की रचना हुयी. तो य मनु कहा से आ गया? उत्तर यही है कि वह स्त्री ही है जिसे भ्रमवश भाष्यकारो ने पिता मान लिया"
निर्मोही जी का लेखन तर्क और तथ्यपरक है अब ये तथ्य कितने खरे उतरते है कितने समझे जाते है और कितनो पर सहमति बनती है निर्भर करता है कि कौन इनके तर्को पर अपने तर्क दे सकता है पर मंथन से अमृत तो अवश्य निकलेगा इसमे सन्देह नही.
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