बुधवार, 1 जून 2011

मुसलमाँ हूँ मगर अब्दुल हमीद ऐसा मुसलमाँ हूँ "रसूल अहमद सागर"

बचे कैसे कि पानी आ गया सर के ऊपर तक
अमन के खा गये दाने अमन के ही कबूतर तक

भलाई की करें उम्मीद क्या इन रहनुमाओं से
बुराई में सने बैठे है जब गांधी के बन्दर तक

चलो, चलते रहो चलने से ही गंतव्य पाओगे
नदी बहती हुई इक दिन पहुचती है समंदर तक

लगन हो आस्था हो प्रेम हो विश्वास हो दिल में
पिघलते से नज़र आयेगे तुमको यार पत्थर तक

मुसलमाँ हूँ मगर अब्दुल हमीद ऐसा मुसलमाँ हूँ
मिरा ये कौल पहुचा दो वतन के एक इक घर तक

                                              ........ शाइर ए वतन "डॉ रसूल अहमद सागर"
                                                                 रामपुर

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या बात है पवन जी

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ख़ूब साहब ! शुक्रिया इस ग़ज़ल के लिए !!

    जवाब देंहटाएं
  3. लगन हो आस्था हो प्रेम हो विश्वास हो दिल में
    पिघलते से नज़र आयेगे तुमको यार पत्थर तक
    उम्दा ग़ज़ल

    जवाब देंहटाएं
  4. भलाई की करें उम्मीद क्या इन रहनुमाओं से
    बुराई में सने बैठे है जब गांधी के बन्दर तक

    sundar vichaar

    जवाब देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर गजल जनाब शुक्रिया काश इन कबूतरों के पंख अभी भी .....


    बचे कैसे कि पानी आ गया सर के ऊपर तक
    अमन के खा गये दाने अमन के ही कबूतर तक
    शुक्ल भ्रमर ५

    जवाब देंहटाएं