बुधवार, 14 नवंबर 2018

तुम्हारे शक्ल जैसी एक लड़की रोज मिलती है

तुम्हारी ज़ुल्फ़ से गिरती मेरे कंधे भिगोती है,
बिना बादल बिना मौसम के ये बरसात कैसी है।

सियाही ख़त्म होती है मगर पन्ने नही भरते,
तुम्हे पाकर तुम्हे खोना कहानी बस ज़रा सी है।

उधर होंटों पे पाबन्दी इधर अल्फाज रूठे से,
हमारे बीच खामोशी की इक दीवार उठती है ।

बना कर बाँध क्या करते नही इक बूँद पानी की,
कभी कोई नदी थी अब जहां पर रेत रहती है।

मुहब्बत फिर से हो जाए खता मेरी नही होगी,
तुम्हारे शक्ल जैसी एक लड़की रोज मिलती है।

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

    क्षीरेश्वर के आँचल में

         चिदानन्द ढूढिया के साथ लक्ष्यहीन भटकने का मैं भी आदि हो गया हूँ । चिदानन्द जी तो चिर अन्वेषक हैं और चिर नवीनता की तलाश करते हैं तभी तो उन्होंने अपने नाम के साथ ढूढ़िया  जोड़ रखा है । और मैं  उनका  साथ देकर भी जहाँ कहीं भी पहुँचता हूँ वहाँ पहुँच कर उस स्थान ,तीर्थ या प्रकृति स्थल के अतीत में झाँकनेँ की कोशिश करता हूँ । उस बार जब वे मुझे कानपुर  देहात जनपद में शिवराजपुर स्टेशन से उतार कर कुछ किलोमीटर की दूरी पर स्थित खेरेश्वर मन्दिर में ले गये तो संध्या हो चुकी थी । यह तो कहिये कि खेरेश्वर में ढूढिया जी के कई मित्र पुजारियों की छोटी -मोटी धर्मशालायें हैं इसलिये वहाँ भोजन और विश्राम कर रात्रि काट लेनें का प्रबन्ध है । ऐसा न होता तो उस  देर शाम लौटनें की विकट समस्या खड़ी हो जाती । पर अच्छा ही रहा कि मैं उस रात को अकेले उस कमरे में सो गया जो मेरे लिये ढूढ़िया जी नें सुनिश्चित करवा दिया था । चिदानन्द जी अन्य किसी मित्र के परिवार सदस्य के रूप में मुझसे रात्रि भर के लिये विदा माँग कर चले गये ।
                                               मैं खेरेश्वर के मन्दिर में शिवलिंग पर गँगा जल की शीतलता देकर नतमस्तक होकर कमरे में विश्राम करने आया था । मन्दिर के पुजारी नें मुझे  बताया था कि खेरेश्वर का शुद्ध नाम क्षीरेश्वर है क्योंकि क्षीर यानि दूध की ही धार डाल कर यहाँ शिवलिंग को शीतलता प्रदान की जाती है । साथ ही उसनें यह भी बताया था कि प्रत्येक सुबह सूर्योदय से काफी पहले अचानक मन्दिर की घंटी बज उठती है न जाने कैसे मन्दिर का द्वार खुल जाता है । और कोई विशाल आकृति का छायापुरुष शिवलिंग को दूध से नहला जाता है । पुजारी नें कहा कई बार मैनें देखनें की कोशिश की है पर कोई अलौकिक कौंध मेरी आँखों को बन्द कर देती है । वह छाया वहाँ से पलक मारते ही लुप्त हो जाती है । उसनें कहा कि यहाँ के लोगों का ऐसा विश्वास  है कि अश्वत्थामा महाभारत काल से लेकर आज तक इस स्थान पर आते रहे हैं और शिवलिंग को दूध से स्नान कराते रहे हैं । मैंने आश्चर्य से पुजारी से पूछा था कि महाभारत काल को तो हजारों वर्ष हो गये फिर अश्वत्थामा अभी तक कैसे जीवित है ?तो उसनें कहा था ,"अरे आप इतना भी नहीं जानते । अश्वत्थामा अमर है । युद्ध की अन्तिम रात्रि को कृत वर्मा के साथ जाकर कैंम्प में सोये हुये द्रोपदी के पाँचों पुत्रों को भ्रम वश पाण्डव समझ कर ह्त्या कर दी गयी थी । अश्वत्थामा के शिवभक्त होने के कारण ही कैंम्प में पहरा दे रहे त्रिशूलधारी शिव नें उन्हें अन्दर जानें दिया था दण्ड के फलस्वरूप द्रोपदी के कहनें पर गाण्डीव धारी अर्जुन नें अश्वत्थामा को विवश कर द्रोपदी के समक्ष उपस्थित किया था । पर गुरु पुत्र होने के नाते चक्रधारी कृष्ण ने उसे निर्वासित कर पाण्डव साम्राज्य की सीमा से बाहर जाने का सुझाव दिया था । हाँ उसके माथे की गौरव मणि अवश्य निकाल ली गयी थी ताकि वह निस्तेज हो जाय । द्रोपदी नें भगवान श्री  कृष्ण से कहकर एक ऐसा वर दिला दिया था जो शाप से भी अधिक भयानक था । कृष्ण नें कहा था तू कभी मरेगा नहीं इसलिये ताकि युगों -युगों तक जीवित रहकर पश्चाताप की अग्नि में जलता रहे । तब अश्वत्थामा नें कृष्ण से यह याचना की थी कि जीवन से उसकी मुक्ति कैसे संभ्भव होगी । जो पाप उसके हाँथों हुआ था वह अन्जानें में हुआ था । दुर्योधन की मित्रता उसे दुर्योधन के शत्रु पाण्डवों को मार देने का सामरिक अधिकार तो देती थी पर पाण्डव पुत्र तो कुरुवंश की संपत्ति थे उन्हें मार कर वह आत्मग्लानि से जी  जी कर भी मरता रहा । देवकी नन्दन नें तब उसे यह कहकर आश्वस्त किया था कि वह किसी सुरम्य स्थल पर गंगा के किनारे किसी शिवमन्दिर में नित प्रातः भगवान शिव के लिंग को क्षीर से नहलाता रहे । जब कभी त्रिलोकेश्वर शिव सम्पूर्ण रूप से प्रसन्न हो जाएंगें उसी दिन तुझे शरीर के बन्धन से मुक्ति मिल जायेगी । :हजारों वर्ष बीत गये हैं  पर अश्वत्थामा का नित्य कर्म अभी भी उसी ढंग से चल रहा है । बताते हैं कि भगवान श्री कृष्ण नें यह भी कहा था कि धीरे -धीरे तुम्हारे माथे की मणि जिसका प्रकाश छीन लिया गया है फिर से ज्योतित हो जायेगी । और जब यह प्रकाश पूर्ण रूप से वापस हो जायेगा तो भगवान शिव तुम्हें देवलोक में जानें की अनुमति दे देंगें । पुजारी नें   आगे  कहा था कि शायद जो प्रकाश मेरी आँखों को चौंधिया देता है वह अश्वत्थामा के माथे की मणिका ही है । जान पड़ता है कि अब द्रोण पुत्र का देव लोक में जानें का समय आ गया है । मैनें कहा ,"मैं सुबह चार बजे से पहले ही तुम्हारे पास बाहर के कक्ष में आ जाऊँगा । मैं स्वयं देखना चाहता हूँ कि घंटियाँ अपने आप बज जाती है और दरवाजा अपनें आप खुल जाता है यह सब स्वाभाविक रूप से होता है या इसके पीछे कोई पुरुष योजना है । " पुजारी नें कहा था आप जैसे और भी कितनें अविश्वासी यहाँ आ चुके हैं और अन्त में महाकालेश्वर त्रिनेत्र भगवान शिव के प्रति शिवलिंग के सामनें दण्डवत लेटकर अपनें शंकालु स्वभाव के लिये क्षमाँ याचना कर चुके हैं । तुम आना ही चाहो तो कल सुबह आ जाना पर चार बजे से पहले पहले । तुम पास ही की धर्मशाला के ख़ास कमरे में तो हो । थोड़ी ही दूर तो है । मैं मन्दिर की बाहरी दालान में ही सोता हूँ । मैं अगली सुबह मन्दिर में गया या नहीं गया इस बात का उल्लेख करना यहॉं मुझे प्रासंगिक नहीं लगता । जिस बात का मैं  उल्लेख करना चाहता हूँ वह यह है कि उसी रात अपनें कमरे में मेरी द्रोण -पुत्र अश्वत्थामा से मुलाक़ात हो गयी ।
                                     हुआ यों कि मैं लगभग रात्रि 10 बजे अपनें कमरे में आकर तख़्त पर लेट गया । तख़्त पर  दरी बिछी थी और सिरहाने के लिये एक तकिया रखा हुआ था । थका मादा था ही पुजारी की बातों को मन ही मन तौलता हुआ मैं न जाने कब निद्रा की गोद  में चला गया । निद्रा गहरी होती चली गयी और मुझे लगा कि मैं सुबह होने के पहले ही उठ कर मन्दिर की ओर जा रहा हूँ । अचानक पास बहती गंगा में छप -छप की आवाज हुयी । लगा जैसे कोई 6.5 -7 फ़ीट का विशालकाय गौर वर्ण पुरूष ताम्बे के एक सुराहीदार लोटे में कुछ लिये हुये मन्दिर की ओर बढ़ रहा है । मैनें उसे देखते ही प्रणाम किया तो उसनें मुँह से कुछ कहा जिसे मैं समझ न सका । शायद कोई आशीष वचन कहे हों । नजदीक से मैनें देखा कि तांबे के पात्र में ऊपर तक दूध भरा हुआ था । उस महाकाय पुरुष की पूरी आकृति मुझे दिखायी नहीं पड रही थी पर उसके अत्यन्त गौर वर्ण की झलक अंधियारे में हल्की सी चमक पैदा कर रही थी । मैनें सोचा कि द्रोण पुत्र अश्वत्थामा से मन्दिर में मुलाक़ात करने के बजाय अगर रास्ते में ही बात -चीत कर ली जाय तो शायद मुझे कोई दुर्लभ ज्ञान प्राप्त हो सके । मैंने कहा , "हे महापुरुष ,क्या तुम अश्वत्थामा हो ?"उस महाकाया नें अपना सिर स्वीकृति में हिलाया । हो सकता है यह मेरा अनुमान मात्र ही हो । मैनें आगे कहा , "आप महाभारत काल से अब तक सहस्त्रों  वर्षो की जीवन यात्रा से अभी तक थके नहीं हैं ? उस महाआकृति नें वायु में कुछ ध्वनियाँ कीं उन ध्वनियों से मुझे यह लगा कि वे लौकिक संस्कृति की ध्वनियाँ हैं । पहले तो वह ध्वनियाँ मेरी समझ में नहीं आयीं फिर उनका अर्थ मेरे निकट स्पष्ट से स्पष्टतर होता चला गया ।
                              उस महाकाय धवल नर छाया नें कहा , " मृत्यु उसी का वरण करती है , हे जिज्ञासु , जिसे जीवित देखती है । मैं तो महाभारत के अन्तिम पटक्षेप के साथ ही मर चूका हूँ  । मेरी अमरता तो ब्राम्ह्णत्व की अमरता है  क्योकि ब्रम्ह कभी मरता नहीं है और ब्रम्ह और शिव का अनन्य सम्बन्ध है क्योंकि शिवलिंग के माध्यम से ही ब्रम्हा अपनी श्रष्टि योजना पूरी कर पाते हैं । लिंग पर  क्षीर  स्नान तो एक प्रतीतात्मक क्रिया है ।"
                                      लौकिक संस्कृत में कही हुयी उस महाकाया की बातों का मैं गलत सही हिन्दी अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ । अब चूँकि अश्वत्थामा जी नें मेरे प्रश्नों का उत्तर देना प्रारम्भ कर दिया था इसलिए मेरा साहस और बढ़ गया मैंने डरते हुये पूछा ," क्या मैं आपका स्पर्श कर सकता हूँ ?
                            छाया बोली ,"हे जिज्ञासु क्या तुम अपनी छाया का स्पर्श कर सकते हो चूँकि तुम हो इसलिये छाया है । अश्वत्थामा है तभी तो उसकी छाया तुम्हें दिख रही है । हे जिज्ञासु जीवन की थकान में एक मधुर मिठास होती है पर मृत्यु की थकान में अहसास शून्यता होती है । ये आश्चर्य में डालनें वाला विरोधाभाष है कि मानव जीवन की थकान मिटानें के लिये मरना चाहता है और मरनेँ की शून्यता भरने के लिये जीना चाहता है । मेरी त्रासदी देखो जिज्ञासु मैं न मर रहा हूँ और  न जी रहा हूँ । मैं शिवलिंग को नित्यप्रति क्षीर स्नान कराता हूँ कि वे जन्म और मृत्य के अन्तराल में फंसे मेरे निष्क्रिय जीवन को या तो फिर किसी महाभारत में लगावें या फिर मेरे मित्र दुर्योधन की भांति मुझे भी चिर निद्रा में सुला दें । पर मैं गुरु द्रोण का पुत्र हूँ । गुरु पुत्र तो हूँ ही साथ ही मैं ब्राम्हण पुत्र भी हूँ । परम्परागत पाये हुये इन दोनों मर्यादाओं का बोझ मुझे उठाना ही पडेगा । हे जिज्ञासु तुम नहीं होगे तब अगली पीढ़ी के खोजी इसी प्रकार के प्रश्नों के उत्तरों की तलाश करते रहेंगें । यह पुजारी नहीं होगा तो इसकी अगली पीढ़ियां और फिर अगली पीढ़ियां निरन्तर मेरे द्वारा शिवलिंग के क्षीर स्नान को कराये जाने वालों को देखते रहेंगें । हे जिज्ञासु तुम जानते हो परम्परा किसे कहते हैं । अब मैं घबडाया । अभी तक मैं प्रश्न करता था पर अब प्रश्न मुझसे किया गया । मैनें अपनी सामान्य बुद्धि से उत्तर दिया परम्परा ,'"पुराने जमाने से चले  आने वाली सामाजिक रिवाजों और विश्वासों को मान कर चलनें की रीति को कहते हैं ।" अश्वत्थामा जी बोले हे जिज्ञासु पुराने से तुम क्या समझते हो । क्या पुरातन है और  क्या नूतन है ?हर नूतन भूत से आकर भविष्य की ओर जाता है तुम नूतन शब्द का इस्तेमाल क्या वर्तमान के सन्दर्भ में कर रहे हो मैंने सोचा कि कहाँ फंस गया ? द्रोण पुत्र अश्वत्थामा न केवल महारथी हैं बल्कि गुरुपुत्र हैं उनसे तर्क करना सामान्य मनुष्य के सामर्थ्य से बाहर की बात है । अतः मैनें कहा , " हे ब्रम्ह श्रेष्ठ मैं काल की विशेष व्याख्या नहेीं जानता । आपके ज्ञान से लाभान्वित होना चाहूँगा । .... मुझे लगा कि वह लम्बी गौर आकृति कुछ मुस्करायी, धुंधलके में उजले कण से तिरते दिखायी दिये । हो सकता है यह मेरा भ्रम हो वह महाकाय आकृति बोली ," हे जिज्ञासु जीवन के सबसे बड़े रहस्य को मैंने तब जाना जब वासुदेव कृष्ण नें मुझे बचाकर अमर होने का बरदान दे दिया । अरे जिज्ञासु कौन्तेय को युद्ध में प्रवृत्त करने वाला वह वेणु वादक गोपाल निश्चय ही आदि श्रष्टि से लेकर आज तक के जीवन ज्ञानियों में सर्व श्रेष्ठ है वह स्वयं चाहता तो अमरत्व उसकी मुठ्ठी में था पर जब  जीवन की उपयोगिता समाप्त हो जाय तब उसे बनाये रखने की कामना पीब भरे वण को सहजनें जैसी है । यदि धनन्जय मुझे मृत्यु दण्ड दे देते तो महाभारत की कहानी अपनीं सम्पूर्ण समाप्ति को प्राप्त हो जाती । पर उस चक्रधारी नें  तो मुझे इतनी अपार पीड़ा दी है कि जो शूली की नोक पर लटकाये उस दण्डित को मिलती है जो नोक से  मरनेँ के पहले उतार लिया जाता है और फिर कुछ ठीक होने पर शूली की नोक पर टाँग दिया जाता है । मैनें कुछ और हिम्मत बाँधी सोचा कुछ पंडित ,कुछ अन्य अमर लोगों की गाथायें गाते रहते हैं । शुकदेव जी तो हैं हीं पर कुछ अल्हैड़ी आल्हा के अमर होने की बात भी कहते हैं । और फिर पवन पुत्र हनुमान की अमरता तो सब मान कर ही चलते हैं । मैनें कहा गुरुपुत्र आपनें मुझे एक नयी जीवन दृष्टि दी है । आप की इस बात को मैं गाँठ बाँधकर रखूँगा कि जब जीवन समाज के लिये उपयोगी न रह जाय तो उसको बनाये रखनें की कामना एक मानसिक अपंगता के अतिरिक्त और कुछ  नहीं है पर आप अब शायद जाना चाहते हैं क्योंकि शिवलिंग को दुग्ध स्नान करा देने की घड़ी आ गयी है । जाते -जाते इतना बताते जाइये कि क्या आपको उन अमर पुरुषों का सानिध्य मिल सका है जो भारत की जनश्रुतियों और पण्डितों की कथाओं में सदैव शरीर धारण किये रहेंगें । द्रोण पुत्र ने आवेश में हाथ उठाया । शायद बांया हाथ क्योंकि दाहिने में तो दुग्ध पात्र था । ऐसा मैं इसलिये कह रहा हूँ क्योंकि बांये ओर का अन्धकार हटता हुआ सा दिखायी पड़ा । बोले हे जिज्ञासु एक बार तुम्हारे मित्र चिदानन्द ढूढिया नें भी मुझसे रात्रि के अन्तिम पहर में मुलाक़ात करके यही प्रश्न पूछा था मैनें जो उत्तर उसको दिया था वही उत्तर आज फिर दोहराता हूँ । हे जिज्ञासु जो जन्मा है उसे मारना ही चाहिये । नारी के उदर में निर्मित कोई भी मानव काया अमरत्व नहीं पाती । सौ वर्ष की आयु सीमा के आस -पास वह स्वयं ही जीवन की थकान मिटानें के लिये मृत्यु की कामना करता है तुम्हारे बताये हुये कथा कहानियों के अमर लोग यदि मेरी ही तरह नारी जन्मा होंगें तो जो अमरत्व वह भोग रहे हैं वह बरदान न होकर अभिशाप होगा । मुझे भी एक बार मर जाने दो और उन सबको भी । फिर नये सिरे से नये गुणों और युग मूल्यों से सुसज्जित कर युगानुकूल भेष -भूषा में मुझे जीवित कर दो ऐसा कर सकोगे तभी जीवन के नये महाभारत में हम धर्म पक्ष का साथ देंगें । पवन पुत्र तो सदा धर्म के साथ थे ही वे तो श्री राम के साथ रहेंगे ही।  शुकदेव जी तो सनातन सत्यों का प्रचार करते थे और करते ही रहेगें पर  मुझ अश्वत्थामा को तो एक बार श्री कृष्ण के साथ खड़ा होने दो अपनें पिता द्रोण की भूल का भी तो मुझे प्रायश्चित करना है यद्यपि उनकी भूल का मूल कारण पितामह के प्रति उनकी श्रद्धा थी । अच्छा जिज्ञासु यह मिलन मुझे काफी उत्तेजक लगा । फिर न जाने क्या हुआ हल्का सा प्रकाश छा गया शायद ऊषा का प्रकाश था । दरवाजे से बाहर किसी नें पुकारा अरे सोते ही रहोगे सुबह हो गयी । मेरी आँख खुल गयी जान गया चिदानन्द ढूढिया दरवाजे के बाहर खड़े हैं । यह उन्ही की पुकार थी । आखिर उन्होंने मुझे क्षीरेश्वर में आने वाले महाभारत के महापात्र द्रोण पुत्र अश्वत्थामा से मुलाक़ात करवा ही दी तो क्या मैं स्वप्न देख रहा था ?स्वयं अपनें ही व्यक्तित्व के ,अपनी ही चेतना के दो विभाजित अंगों के बात -चीत में लगा था । मनोविज्ञान ही इसका उत्तर दे सकेगा । 

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

चुनाव २०१७



अबकी बारी सोच समझ कर
मित्रों बैलेट पर बटन दबाओ
सोये रहे जो आज के दिन भी
फिर तो पाँच साल पछताओगे

है देश बचाना अब तो जानो
वोट की ताकत को पहचानो
ना घुसे सभा में पापी दरिन्दे
आज ही ये निश्चित कर डालो

नही है दिन ये मौज करने को
घर मे बस खाली पडे रहने को
मत का मूल्य सबको समझाओ
मत केन्द्र तक मिलकर आओ

जाति धर्म का ध्यान ना धरना
सही व्यक्ति को ही आगे करना
देश का जिम्मा अब तो उठाओ
चुनाव को राष्ट्रीय पर्व बनाओ

लगा उंगली पर नीला निशान
बनाना है अपना देश महान
बदल देंगे राजनीति की भाषा
नेताओं को ये संदेश सुनाओ

अबकी बारी सोच समझ कर
मित्रों बैलेट पर बटन दबाओ 

रविवार, 14 अगस्त 2016

a( matihindimasikblogspot.com): एक मात्र सत्य

a( matihindimasikblogspot.com): एक मात्र सत्य: कल तक इन वाणों  की नोकों से सहस्त्र -सहस्त्र शत्रु -सिर छेदे थे कल तक इस धनु  प्रत्यंचा से खींच शर लाखों लक्ष्य भेदे थे कितना अभिमा...

सोमवार, 25 जनवरी 2016

मुबारकें -

   आज गणतंत्र दिवस है आप सबको बहुत- बहुत बधाई।  ..दिन चाहे कोई सा भी हो..  .हमें मिला हुआ आज़ादी का हर एक पल सिर्फ और सिर्फ उनके नाम...  जो देश की सुरक्षा के लिए अपने घर-परिवार से दूर , किसी लालच के बगैर,  अपने बुलंद हौसलों से विपरीत परिस्थितियों में भी  संघर्ष करते हुए लगे है। सो आज  हम अपने ही नही विश्व के सभी सैनिकों को जो अपने देशके लिए समर्पित है .. सलाम करते है। 

मंगलवार, 3 मार्च 2015

जिंदगी की न टूटे लड़ी .......प्यार कर ले घडी दो घडी

जिंदगी की न टूटे लड़ी .......प्यार कर ले घडी दो घडी
मशहूर गीतकार संतोष आनंद डॉ.कुवर बेचैन ऐसे ही कई साहित्य के सितारों के बीच मिला 'निराला सम्मान 2015' ने अभिभूत कर दिया. ये सम्मान मेरे लिए कई कारणों से महत्वपूर्ण था पहला कारण मेरे प्रिय गीतकार संतोष आनंद जी द्वारा दिया जाना दूसरा मेरे हमसफर डॉ पवन विजय को ' ऋतुराज सम्मान 2015' मिलना तीसरा महान कवि श्री सूर्यकान्त निराला की स्मृति में दिया गया. निराला स्मृति में बने कॉलेज में मेरा पहला चयन प्रवक्ता पद पर उन्नाव में हुआ था जो निराला की जन्म भूमि है बस वही से मेरे लेखन की भी यात्रा शुरू हुई थी . बस ईश्वर से इतना ही मांगती हूँ कि मैं आगे भी मैं सत्यम, शिवम् और सुन्दरम लिखती रहूँ. इस दौरान अनेक साहित्य विभूतियों से मिलने का मौक़ा मिला. पद्मभूषण गोपालदास नीरज से मिलना सुखद था, बेबाक जौनपुरी जी का स्नेह और मार्गदर्शन हम दोनों लोगों को मिला. कार्यक्रम की सफलता के लिए भाई अमरेन्द्र जी बधाई के पात्र हैं .
आप सभी इस कार्यक्रम को दूरदर्शन पर देख सकते हैं .

सोमवार, 15 सितंबर 2014

कानपुर साहित्य और फक्कड्पन

इस पोस्ट को पलाश पर भी आज शेयर किया है, किन्तु कानपुर के बारे में बात हो और काबा पर इसकी चर्चा ना हो कुछ अधूरा सा लगता है, सो यहाँ पर भी लिखने का एक मात्र उद्देश्य ज्यादा से ज्यादा पाठ्कों को कानपुर के साहित्य की विशेषता से परिचित कराना है 
कानपुर का कनपुरिया, जिसकी पहचान है उसकी बोली, उसका बात करने का अंदाज, उसका एक दूसरे के प्रति अपनापन। उसकी इसी खासियत ने उसको विश्व पटल पर पहुँचाया है। वो फर्राटेदार अंगरेजी भी बोल सकता है, तो अपनी भाषा को हमेशा अपने दिल में रखता है।
और यही कनपुरिया दिल दिखता है कानपुर के साहित्यकारों में । साहित्य समाज का दर्पण होता है, ये यूँ ही नही कहा गया। हम किसी भी स्तरीय साहित्य को अगर पढ कर देखे तो हम पायेगें कि उसमें देशकाल, समाज का जिक्र अवश्य ही होगा। लेखक की लेखनी भावनाओं से परे हो कर चल ही नही सकती, उसमें उसके यथार्थ का पुट आ जाना स्वाभाविक ही है।
कानपुर के साहित्य के दर्पण में कनपुरियों के स्वभाव को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।हिन्दी साहित्य के शिरोमणि भूषण निर्भीकता से औरंगजेब के क्रूरतापूर्ण व्यवहार का उल्लेख करते हुए अपनी रचना में लिखते हैं - 
”देवल गिरावते फिरावते निसान अली, ऐसे समै राव-रानै सबै गए लबकी

गौरा गनपति आय, औरंग को देखि ताप, अपने मुकाम सब मारि गए दबकी”
वहीं कानपुर की धरा पर जन्मे प्रताप नारायण मिश्र जिन्होने अपने ब्राह्मण अखबार को बन्द करना तो स्वीकार किया किन्तु पत्रकारिता के आदर्श को दांवपर लगाकर किसी से कोई समझौता नहीं किया। बेबाक लेखनी से अपनी बात को फक्कड मगर ना चुभने वाले तरीके से कहने का अंदाज उनकी किसी भी रचना में स्पष्ट रूप से दिखता है। अपनी रचना ' पेट' में वे कहते है -
" यदि दैव ने हमे कुछ सामर्थ्य दी है तो चाहिये कि उसे अपने ही पट में न पचा डालैं, कौरा किनका दूसरों की आत्मा में भी डालें। और जो यह बात अपनी पहुंच से दूर हो तो भी केवल मुँह से नही बरंच पेट से यह ग्रहण कर लेना योग्य है कि पेट से पर्थर बाँध के परिश्रम केरेंगें, दुनिया भर के पांव फैलावेंगें, सबके आगे न पेट दिखाते लजाएँगें, न पेट चिरवा के भुस भराने में भर खाएँगे"

तो वही भगवती चरण वर्मा जी अपनी रचना "मातॄभूमि " में गाँव का वर्णन मिला अलंकारों के लाग लपेट के ढेठ कनपुरिया भाषा में करते हुये लिखते हैं-
उस ओर क्षितिज के कुछ आगे, कुल पाँच कोस की दूरी पर,
भू की छाती पर फोड़ों-से हैं, उठे हुए कुछ कच्चे घर !
मैं कहता हूँ खंडहर उसको, पर वे कहते हैं उसे ग्राम ,

ऐसा नही कि कानपुर के साहित्यकारों का कवियों की भाषा के अलंकारों या रस पर पकड ढीली थी, जगन्नाथ त्रिपाठी जी अनुप्रास अंलकार से सजी रचना लिखते हुये अपने कवि बनने की कहानी कुछ इस तरह कहते है-
परम पुनीत प्राच्य पथ-परिपंथियों के, परिमर्दनार्थ कभी पवि बनना पड़ा
राम की रुचिर रूप रेखा-रश्मि राशि द्वारा, रोते राहियों के लिए रवि बनना पड़ा।
छाई छिति छोर-छोर छल-छद्म-क्षपा छाँटने,  को क्षपाकर की कभी छवि बनना पड़ा
कुटिल कुचालियो की कूट-नीति काटने को,   काव्य की कृपाण ले के कवि बनना पड़ा।।


कानपुर के साहित्य में देश प्रेम की कई कालजई रचनाओं से भरा हुआ है, चाहे हमारे सोहन लाल दिवेदी का अपने राष्ट्रीय ध्वज के प्रति आस्था दिखाती हुयी ये रचना हो -
जय राष्ट्रीय निशान! 
जय राष्ट्रीय निशान!!! 
लहर लहर तू मलय पवन में, 
फहर फहर तू नील गगन में, 
छहर छहर जग के आंगन में, 
सबसे उच्च महान! 

या फिर जगदम्बा प्रसाद 'हितैषी' जी की किसी की जुबां से सुनी जा सकने वाली ये कविता हो-
शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा


समय काल कोई भी रहा हो, कानपुर की धरती पर हमेशा ही ऐसे लेखक और कवि हुये जिन्होने उस समय की समस्याओं पर पूरे फक्कड तरीके से अपनी लेखनी को चलाया । और उसके असर भी समाज में देखने को मिले। कानपुर की कुछ फिजा ही ऐसी है कि यह पन्नो में नही दिलों में बसता है । कानपुर में जो भी आया वो कभी उसे भुला ना सका, तभी तो गोपाल दास नीरज जी "नीरज की पाती" मे कानपुर से अपनी जुडी यादों को याद करके उभर आये दर्द को कुछ इस तरह बयां करते है-
कानपुर! आह!आज याद तेरी आई फिर, स्याह कुछ और मेरी रात हुई जाती है,
आँख पहले भी यह रोई थी बहुत तेरे लिए, अब तो लगता है कि बरसात हुई जाती है॥


फर्श पर तेरे 'तिलक हाल' के अब भी जाकर, ढीठ बचपन मेरे गीतों का खेल खेल आता है 

आज ही तेरे 'फूलबाग' की हर पत्ती परओस बनके मेरा दर्द बरस जाता है।।

शनिवार, 6 सितंबर 2014

फक्कड़पन मात्र मनोरंजन का विषय नही बल्कि एक शहंशाही परंपरा है।

कनपुरिया  साहित्यकारों  के बारे में खास बात यह है कि वे  पहले ठेठ फक्कड़  होते हैं बाद में रचनाकार। यही फक्कड़पन  उनकी रचनाधर्मिता का आधार है। कितना भी बड़ा साहित्यकार हो अगर कनपुरिया है तो दूर से ही अपनी ख़ास  हरकतों  और बोल बचन से पहचाना जा सकता है। पुराने साहित्यकारों से लेकर आज  तक फक्कड़पन को राष्ट्रीय चरित्र का दरजा दिलाने वाले लेखकों कवियों की  एक लम्बी फेहरिश्त है। फक्कड़पन के प्रवर्तक कविराय  राजा  बीरबल की परंपरा को  आज आप आलोक पुराणिक के लेखन में बखूबी देख सकते हैं। एक बढ़कर एक लेखक कवि किस किस का उल्लेख किया जाय। 

आज राजू श्रीवास्तव नामक  एक कनपुरिये ने  ग़दर काट रखी है, यदि  इस ग़दरकाण्ड के पन्ने खोले जायें तो इसकी  भूमिका में कवि  बलई काका खींस काढ़े दिख जाएंगे। कनपुरिया साहित्य का  फक्कड़पन न केवल साहित्य को समृद्ध करता है बल्कि अन्य कलाओं पर इसका असर साफ़ देखा जा सकता है। नौटंकी, लावनी लोकगीत मुहावरे इत्यादि के ऊपर साहित्य के मस्तमौला स्वभाव को शिद्दत से महसूस किया जा सकता है।

प्रताप नारायण मिश्र जी तो लावनी के इतने रसिया थे की लोग उन्हें लावनीबाज कर कर चिकाई  करते थे. उनकी लावनी का एक अंश देखिये.
दीदारी दुनियादारे सब नाहक का उलझेडा है,
सिवा इश्क के यहाँ जो कुछ है निरा बखेड़ा है.। 
लावनी ने  शहर की  कविता में मौज के  संस्कार को और पुष्ट किया  है।  कानपुर के पुराने फक्कड़ रचनाकारों   तुर्रेवाले मदारी लाल ,आसाराम, बदरुद्दीन, प्रेमसुख भैरोंसिंह, बादल खान, दयाल चंद,गफूर खान, मजीद खान, मथुरी मिस्र, राम दयाल त्रिपाठी, गौरीशंकर, पन्ना लाल खत्री भगाने बाबू   मुन्नू गुरु इत्यादि उस्ताद लोग थे जिन्होंने कानपुर के चरित्र को साहित्य के साथ सिल दिया। 
यह फक्कड़पन मात्र मनोरंजन का विषय नही बल्कि एक शहंशाही परंपरा है। गणेश शंकर विद्धार्थी,नवीन,सनेही जी ,नीरज आदि से लेकर आज तक सैकङों ख्यातनाम कानपुर की इसी फक्कड़ परम्परा के वारिस हैं।

बुधवार, 3 सितंबर 2014

फक्कड़ पन और कनपुरिया साहित्य एक दूसरे के पर्याय और ताकत हैं।

जहाँ  फिरंगियों को  पडी मुंह  की खानी है,
ये कानपुर है भईया  यहाँ का कड़ा पानी है। 

सनेही जी की ये पंक्तियाँ कानपुर के साहित्यकारों के फक्कड़ स्वभाव को परिलक्षित करती हैं। हाजिरजवाबी और मस्त मौलापन  कानपुर की मौलिकता है। कानपुर के जितने भी साहित्यकार हैं   चाहे वह पहले के  प्रताप नारायण मिश्र हो नवीन जी सनेही जी हो या फिर हितैसी जी या फिर आज के  मशहूर लेखक अनूप शुक्ल 'कट्टा कानपुरी ' हों सभी की रचनाओं में एक चीज समान रूप से देखी  जा सकती है और वह है 'मौज'  प्रताप नारायण मिश्र इस 'मौज' प्रदायनी  कनपुरिया माटी के  बारे लिखते हैं  

बागे ज़न्नत से नही  कम फिजायें  कानपुर,
मुर्दा जी जाए जो खाए हवायें  कानपुर। 
भूल रिज्बा इस्म को जो आये कानपुर,
छोड़ कर हरगिज़ न वो जाए फिर  कानपुर। 

फक्कड़ पन  की  बात मुन्नू गुरु के बिना अधूरी है। मुन्नू गुरु ने न केवल  हिंदी शब्द कोष को नये नये शब्दों से समृद्ध किया बल्कि आने वाले साहित्यकारों के लिए नव शब्द निर्माण की परंपरा भी छोड़ गए। चिकाई /चिकाही, गुरु ,लौझड़ जैसे अनगिनत शब्द कनपुरिया साहित्यबाजों ने  गढ़े हैं कि वेबस्टर डिक्शनरी की सात पुश्ते भी उसे न खोज पायें। कनपुरिया साहित्य की ख़ास बात यह है कि शब्द के अर्थ किसी शब्दकोष से नही बल्कि  उस  शब्द के उच्चारण और शरीर की भावभंगिमा से  तय होते हैं। 

कानपुर की साहित्य  उर्वरा भूमि को छू कर कितने पत्थर पारस हो गए।  देश के जाने किस कोने से भटकते हुए कलमकार यहां आये और यहाँ के मूलमंत्र 'झाङे रहो कलट्टरगंज' में दीक्षित होकर गणेश शंकर 'विद्यार्थी' , अटल बिहारी बाजपेयी,  गोपाल दास 'नीरज'  और सुरेश फक्कड़ बनते चले गये। फक्कड़ पन और कनपुरिया साहित्य एक  दूसरे के पर्याय और ताकत हैं। इसी ठसक के चलते कानपुर के साहित्यकारों की पूरे विश्व में पहचान है।  

शनिवार, 10 मई 2014

बहक जाते हैं



 


















कुछ  चीज  दूर  से  देखन  में  भली  होती  है
आग छूता है वहीँ जिसकी अंगुली न जली होती है
भटक जाता है  मुसाफिर  उस  गली  में  अक्सर
जो   उसके    लिए   अनजान  गली   होती है

लोग   अक्सर  बहक  जाते  हैं  उन  बहारों  में
जिन  बहारों  में  हजारों  ही  कली   होती   हैं
भ्रमर  अक्सर  ही  बहकते  हैं  उन्हीं कलियों पर
चमन गुलजार  में  जो  अधखिली  सी  होती  हैं

महक  का  जाल  चमन  फेका  जब फिजाओं में
हो मद में मस्त चमन  में  ही  उलझे  जाते  हैं
प्यार  का  जाल  बुना  है  गजब  शिकारी   ने
उलझ एक बार  जो  गया  तो  उलझे  जाते  हैं

                        दीपक कुमार मिश्र प्रियांश

शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

एनडीए नीत गठबंधन को 283 सीटें


पीपुल अवेयरनेस फोरम द्वारा कराये गए एक  सर्वे के मुताबिक़ एनडीए को पूर्ण बहुमत के आसार दिख  रहे हैं। किये गए  सर्वेक्षण  के आधार पर  प्राप्त  निष्कर्ष  से एनडीए नीत  गठबंधन  को 283  सीटें  मिल  रही है। सांख्यिकीविद प्रो एन के शर्मा ने सर्वे को मानको के अनुरूप एवं सटीक बताया है। हालांकि सैंपल साइज को लेकर सर्वे पर प्रश्न चिन्ह लगाए जा सकते है किन्तु  सैंपलिंग वृहत का एक लघु प्रतिनिधि ही होता है।  अब 16 मई को ही इस की सत्यता का पता चलेगा।

Survey  is  done by People Awareness Forum(PAF)


4.Question: Where you’ll cast/ casted your vote?
(a)    NDA ,  (b)   Others 

S #
States & Ut's
Toal PC's
Opinion NDA
Universe
1
ANDHRA PRADESH
42
20
300
2
ARUNACHAL PRADESH
2
1
30
3
ASSAM
14
5
100
4
BIHAR
40
25
300
5
CHHATTISHGARH
11
8
100
6
GOA
2
1
30
7
GUJARAT
26
21
200
8
HARYANA
10
8
100
9
HIMACHAL PRADESH
4
4
25
10
JAMMU & KASHMIR
6
1
50
11
JHARKHAND
14
8
100
12
KARNATAKA
28
12
225
13
KERLA
20
1
200
14
MADHYA PRADESH
29
26
250
15
MAHARASTRA
48
36
350
16
MANIPUR
2
0
30
17
MEGHALAYA
2
1
30
18
MIZORAM
1
0
30
19
NAGALAND
1
0
30
20
ORISHA
21
3
200
21
PUNJAB
13
8
100
22
RAJASTHAN
25
22
200
23
SIKKIM
1
0
30
24
TAMILNADU
39
8
300
25
TRIPURA
2
0
30
26
UTTAR PRADESH
80
49
500
27
UTTRAKHAND
5
5
50
28
WEST BENGAL
42
2
300
29
AND & NIC ISLANDS
1
1
30
30
CHANDIGARH
1
1
30
31
DADRA & NAGAR
1
0
30
32
DIM & DIU
1
0
30
33
DELHI
7
6
100
34
LAKSHADEEP
1
0
30
35
PUDDCHERRY
1
0
30
                         Total                        543             283                        4470
 1.Standard  Deviation 5% 
 2.Universe :Surey has been done on 4470 persons.
3.Sampling: Respondents are selected by random sampling method.