शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

प्राणों की महावर

  
प्राणों की महावर
अर्चना की सुरभि प्राणों की महावर बन गयी जब ,
देह की आराधना का अर्थ ही क्या ?
साँस का सरगम विसर्जन गीत का ही साज है ,
मृत्तिका के घेर में क्या बंध सका आकाश है ,
चाह पंख पसार जब पहुँची क्षितिज के छोर तक
मिट गया आभाष कोई दूर है या पास है ।
बंध गयी  जो   चाह मरू का थूह ,कारावास है
मुक्त मन खग ज्योति मग पर लहरने दो
काल के उस पार अनभ अकाल तक
आस्था के चरण कवि के ठहरने दो
पुरा गाथा में लहरती श्रष्टि की उद्दभव कहानी
प्यार की चिर साधना थी ब्यर्थ ही क्या ?
अर्चना की सुरभि ............
देह की हर चाह बस शमशान जाती
राख के बर्तुल बगूले घूमते हैं
शून्यता मानव नियति का अन्त बनती
हो वधिर विक्षिप्त मद्यप झूमते है 
देह  के जो पार अमर निदेह काँक्षा
स्वास्ति का शुभ वृत्त उसी का राग है
रंग रहे चोला चहेते चाह के मद-मस्त जन
किन्तु अमर अनित्य केवल प्राण का ही फाग है
अमिर आमंत्रण मनुजता दे रही जब प्यार का
खण्ड -धर्मी हीन कर्मी भावना का अर्थ ही क्या ?
अर्चना की सुरभि ............
आज मंगल ,शुक्र से कल ज्योति पथ के पार से
और कल के पार ताराहीन धवल प्रसार से
हम सभी हैं पुत्र धरती के यही आह्वान होगा
तब हमें मानव नियति का झिलमिला सा भान होगा
उस महा आभास की प्रत्यूस बेला आ चुकी है
खण्ड धर्मी देह बन्धित चेतना नि:सार है
राष्ट्र की सीमा गगन का छोर पीछे छोडती है
ऊर्ध्व- कामी हर पुलक की कामना ही प्यार है
आज वामन नर डगों में अन्तरिक्ष समों रहा
टिमटिमाती तारिका पद -वन्दना का अर्थ ही क्या ?
'पिण्ड में ब्रम्हाण्ड है 'यह आर्ष वाणी
स्रष्टि के हर तार पर चिर सत्य की झंकार है
आज विघटन की दलीलें सर पटक कर रो रहीं हैं
हर जनूनी अन्धता की यह करारी हार है
कल मनुज तारा पथों पर स्वत :चालित-यान दोलित
ज्योति- नगरों में जगायेगा नयी पहचान के स्वर
श्याम ,पांडुर ,श्वेत लोहित वर्ण ,हिलमिल रहेंगे ,
तपश्चरण प्रधान होगा फिर मिलेंगे नये वर
उठ रहा हो जब त्रिकाली आशुतोषी नाद डिमडिम
क्षणिक जीवी रंजना का अर्थ ही क्या ?

1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही उम्दा और दिल को छू जाने वाली रचना है

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