गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

बंधन

आज मिली वो मुझे युही एक  रास्ते के मोड़ पे ,
 शायद जल्दी में थी या लज्जा थी कारण,

की बस मुस्कराहट ही देख पाया मै उसकी शक्ल  पे.
और आंगे बढ गयी वो, 

आज मुझे देख के फिर मुस्काई वो ,

कभी हो जाती थी बाते उससे युही  ऐसी ही टक्करों पे ,
 पर अब सिर्फ मुस्कराहट ही बाकी थी होठों पे ,
 शब्दों  की माला  गायब थी.

सोचा और याद आया  फिर वो इज्जत का ताना
 ,जिसे न पसंद था मेरा उसका साथ .

वो समाज का चेहरा जो दिखता था बड़ा अच्छा ,
पर बातो में काटे से थे उसके .

बस यही बंधन था उसके मेरे बीच ,
हमारी बातो में ,और हमारी मुस्कराहट पे.

                                                ''अमन मिश्र ''

1 टिप्पणी:

  1. बस यही बंधन था उसके मेरे बीच ,
    हमारी बातो में ,और हमारी मुस्कराहट पे.
    बढिया है सुन्दर्

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