रविवार, 30 जनवरी 2011

ऐसे विद्वानों से हम गवार अच्छे

"मै सच कहूँगा मगर फिर भी हार जाऊंगा
वो झूठ बोलेगा और लाजवाब कर देगा"
आजकल ब्लाग जगत में छीछालेदारी परंपरा सुव्यवस्थित रूप में स्थापित हो रही है तमाम  विद्वान  लोग जोर शोर से इस बात में लगे है कि जो वह कहते है १०१ फीसदी सच है जो ना माने वह १०१ फीसदी गलत. इस प्रक्रिया में विद्वान पुरुष ऐसी ऐसी भाषा और तरीको क़ा इस्तेमाल करते है कि पानी भी शर्म से भाप बन कर उड़ जाए. और तो और उनके समर्थन में पता नहीं कौन कौन से सी ग्रेड के तथाकथित ब्लागर आ जाते है जिनके ब्लॉग यदि दूर से देखो तो भी उबकाई सी आती है. अगर यही रचनाधर्मिता है तो मै दूर से इसको नमस्कार करता हूँ .यही विद्वान है तो ऐसी विद्वता को आग लगे ऐसे विद्वानों से हम गवार ही अच्छे. सवाल यह है कि सूकर प्रव्रित्तिधारक ब्लागरो के लिए कोई पैमाना तैयार होगा या इन्हें ऐसे ही झेलना होगा.  ब्लाग एग्रीगेटर के लोग क्या इस पर ध्यान देगे. यह स्थिति ज्यादा दिन रही तो ब्लागजगत क़ा कबाड़ा तय समझिये. भाई सतीस सक्सेना जी आपके विधिक प्रस्ताव क़ा क्या हुआ?
क्या हम अभी भी मध्ययुगीन मानसिकता से नहीं उबार पाए है? क्या हम शिक्षित  और सभ्य कहलाने के हक़दार है? यदि यही सभ्यता और शिक्षा है तो मै भोलेपन और गंवारो की दुनिया में जाना पसंद करूंगा. रही बात ब्लागरी की तो
"साकिया उठ गए है तेरे मयखाने से
अब यहाँ  मेरा आना आदतन होगा"

                                          सादर
                                          पवन कुमार मिश्र  

11 टिप्‍पणियां:

  1. पवन कुमार मिश्र @ आप की बात से सहमत हूँ.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अच्छा सवाल उठाया आपने...

    _______________________
    'पाखी की दुनिया ' में भी आपका स्वागत है.

    उत्तर देंहटाएं
  3. अपना आना जाना तो ऐसे ही बहुत कम हो गया है . आपकी बात से सहमत .

    उत्तर देंहटाएं
  4. पवन जी , आप से पूर्णतया सहमत

    उत्तर देंहटाएं
  5. पवन जी आप की बात से १०१ प्रतिशत सहमत ऐसे लोगो को रोकना ही नहीं चाहिए, साहित्य की मौत मर ही जायेगे चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, आप अपना काम करते रहिये बस

    उत्तर देंहटाएं
  6. पवन,

    सबसे पहले माफी क्योंकि मुझे अपने से छोटों के साथ जी लगाना पता नहीं क्यों उचित नहीं लगता वे स्नेह ह के पात्र होते हैं. तुम्हारे विचार से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ, ब्लॉग पर हो भी हो अपनी रचनाधर्मिता के अनुकूल हो और फिर ऐसा न हो कि लोग पीछे हमको गालियाँ दें. भले ही हम उत्कृष्ट कोटि का न लिख पाए लेकिन कुछ अपनी बात और भावों तो दूसरों तक पहुंचा तो पायें. उनमें कोई सन्देश हो. चिंता न करें ऐसे तो होता ही रहता है, अपने रास्ते पर चलते जाना हैं, मंजिलें तो मिलेंगी हीँ.

    उत्तर देंहटाएं
  7. भाषाई शुचिता की ओर तो बढ़ना ही पड़ेगा। आप को लगता है कि किसी ब्लाग पर जानबूझ कर ऐसा किया जाता है तो आप खुद उसे काली सूची में डाल सकते हैं। उसे मत पढ़िए। किसी ब्लाग को बंद कर पाना इतना आसान नहीं है, जब कि इंटरनेट पर पोर्न साइटस् धड़ल्ले से चल रही हों। हाँ एग्रीगेटर के स्तर पर यह अवश्य किया जा सकता है। लेकिन यह भी आवश्यक है कि आप एग्रीगेटर को ऐसे ब्लागों के बारे में सूचित तो करें।

    उत्तर देंहटाएं
  8. शत प्रतिशत सहमत हूँ आपकी बात से. समय-समय पे अपनी पोस्टों और कमेंट्स के माध्यम से मैंने ब्लॉगर बन्धुवों का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास भी किया है.

    उत्तर देंहटाएं
  9. really there are lot's of such blog who are creating pollution . some type of restriction is required . but one more thing until sch type of things are appreciated by some people . its tough to ban such writing practices.

    उत्तर देंहटाएं