कानपुर मात्र उद्योगों से ही सम्बंधित नहीं है वरन यह अपने में विविधता के समस्त पहलुओ को समेटे हुए है. यह मानचेस्टर ही नहीं बल्कि मिनी हिन्दुस्तान है जिसमे उच्चकोटि के वैज्ञानिक, साहित्यकार, शिक्षाविद राजनेता, खिलाड़ी, उत्पाद, ऐतिहासिकता,भावनाए इत्यादि सम्मिलित है. कानपुर ब्लोगर्स असोसिएसन कानपुर के गर्भनाल से जुड़े इन तथ्यों को उकेरने सँवारने पर प्रतिबद्धता व्यक्त करता है इसलिए यह निदर्शन की बजाय समग्र के प्रति समर्पित है.
मंगलवार, 11 जून 2013
शनिवार, 8 जून 2013
ये कैसा भारत निर्माण ...
मूल्यों के गिरते स्तर पर ,
ये कैसा भारत निर्माण ...
नैतिकता के शव पे खड़ा ,
आज का बदलता हिंदुस्तान ....
ये कैसा भारत निर्माण ...
कौन सी माता ,
किसके बच्चे...
सब झूठे है ,फिर भी सच्चे ..
चौराहों पे बिकता आदर्श ,
झूठे छेड़ते सत्य की तान ...
घोटालो की खुली मंडी,
लज्जा भी हो रही हैरान .....
ये कैसा भारत निर्माण ....
.ये कैसा भारत निर्माण .....
गंगा है मैली ,मैला
यमुना का आँचल ..
ये सुनहरा है आज ,
तो क्या होगा अपना कल ?
खड़ा किसान रो रहा ,
बाकि नहीं देह में जान ..
ये कैसी विकास की कीमत ,
खो रहे है अपना मान..
बस हो रहा भारत निर्माण ...
ये कैसा भारत निर्माण ....
शुक्रवार, 31 मई 2013
अबाधित धार हो प्रभु स्नेह की तुम : तारिणी
अज अनन्त निर्विकार
प्राणनाथ करुनागार
निरुद्वेल निरुद्वेग
निश्चल सरोवर चेतसः।
अन्तरज्ञ सर्वज्ञ
शब्द सर्वथा निरर्थ
जानो सब नाथ
करो कृपा काश्यप पर।
++++++++++++
अबाधित धार हो प्रभु स्नेह की तुम
ह्रदय के केंद्र में स्थित शुभ्र आसन ।
मनस् की शुद्धता के स्रोत हो हे!
प्राण का उल्लास हो!
सर्वथा शरण लो प्रभु,
संशय सभी हे! दूर कर दो।
निरंतर तव चरण रत रहे जन और
स्नेह जल से आप्लावित।
सोमवार, 27 मई 2013
सफ़र
तम से घिरता ,जड़ता में बंधता ..
पथ का राही मै ,राहों से लड़ता ..
खुद को ही जला जला मै ,दीपक सा जल जाता हु ..
बस आगे बढता जाता हु ,बस आगे बढ़ता जाता हु ...
नित नए भ्रमो की भटकन ,
राहों के वो नए नए रंग ,
इन सभी पाशों से उलझा ..
खुद ही तलवार उठता हु ..
बस आगे बढता जाता हु बस आगे बढता जाता हु ...
नित नयी वेला की आशा ,
समय चक्र का खेल तमाशा ,
रखते हुए ह्रदय मोम सा ,
"अमन "पत्थर का बन जाता हु ....
बस आगे बढता जाता हु बस आगे बढता जाता हु ...
" अमन मिश्र "
note: pic from other blog with a lots of thank you....
पथ का राही मै ,राहों से लड़ता ..
खुद को ही जला जला मै ,दीपक सा जल जाता हु ..
बस आगे बढता जाता हु ,बस आगे बढ़ता जाता हु ...
नित नए भ्रमो की भटकन ,
राहों के वो नए नए रंग ,
इन सभी पाशों से उलझा ..
खुद ही तलवार उठता हु ..
बस आगे बढता जाता हु बस आगे बढता जाता हु ...
नित नयी वेला की आशा ,
समय चक्र का खेल तमाशा ,
रखते हुए ह्रदय मोम सा ,
"अमन "पत्थर का बन जाता हु ....
बस आगे बढता जाता हु बस आगे बढता जाता हु ...
" अमन मिश्र "
note: pic from other blog with a lots of thank you....
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