सोमवार, 14 मई 2012

कोई लाकर मुझे दे -------


एक छोटी सी बच्ची ने मुझ से पूछा क्या आप का ये लेपटाप कही भी संदेश पहुचा सकता है ? तो मैने कहा हा.  उसने एक कागज का टुकड़ा जो कुछ पुराना और मुड़ा हुआ था मेरी टेबिल पर रख दिया,  देखिये उसमे क्या लिखा  था ......










 "कोई लाकर मुझे दे
 कुछ रंग भरे फूल,
 कुछ खट्टे मीठे फल
 थोड़ी बांसुरी की धुन
 थोडा जमुना का जल
 कोई लाकर मुझे दे
 एक सोने जड़ा दिन
 एक रूपों भरी रात
 एक फूलो भरा गीत
 एक गीतों भरी बात
 कोई लाके मुझे दे
 एक टुकड़ा छाव  का
 एक धूप की घडी
 एक बादलो का कोट
 कुछ बून्दो की छड़ी
 कोई लाके मुझे दे
 एक छुटी वाला दिन
 एक अच्छी सी किताब
 एक मीठा सा सवाल
 एक नन्हा सा जवाब
 कोई लाकर मुझे दे"

इस कविता के अंत में लिखा था भगवन जी ये सब अगर नहीं दे सकते तो हम बच्चो की दुनिया बड़ो से अलग
कर दो बड़े तो हमेशा लड़ते रहते है  ......    

शुक्रवार, 11 मई 2012

शपथ न.19 मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ

आज जब मै अपने आस पास नजर दौडाता हू तो देखता हू कि हमारे महापुरुष राष्ट्रीय न हो कर जातीय महापुरुष  बन गये है. आखिर ये जहर और पागलपन की फसल हम किसके  लिये बो रहे है और कौन  इसे काटेगा. डा अम्बेडकर की मेहनत और उनकी ,मेधा को सलाम करता हू किंतु जो जहर वह फैला गये है वह भी केवल बदले के भाव मे बह कर, उसके लिये मेरे मन मे अतीव रोष है. व्यक्ति अपने जीवन काल मे जो करता है उसका मूल्यांकन आने वाली पीढीया करती है. उन्होने धम्म परिवर्तन के समय जो 22 प्रतिज्ञाये  करायी थी उससे क्या समाज एक समरस भाव से सयुक्त रह सकता है? डा बी.आर. अम्बेडकर ने  बौद्ध धर्मं में परिवर्तन के अवसर पर,15 अक्टूबर 1956 को अपने अनुयायियों के लिए 22 प्रतिज्ञाएँ निर्धारित कीं.उन्होंने इन शपथों को निर्धारित किया ताकि हिंदू धर्म के बंधनों को पूरी तरह पृथक किया जा सके.इनमे से कुछ प्रतिज्ञाएँ हिंदू मान्यताओं और पद्धतियों की जड़ों पर गहरा आघात करती हैं.  प्रसिद्ध 22 प्रतिज्ञाएँ निम्न हैं:

  1. मैं ब्रह्मा, विष्णु और महेश में कोई विश्वास नहीं करूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  2. मैं राम और कृष्ण, जो भगवान के अवतार माने जाते हैं, में कोई आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा
  3. मैं गौरी, गणपति और हिन्दुओं के अन्य देवी-देवताओं में आस्था नहीं रखूँगा और न ही मैं उनकी पूजा करूँगा.
  4. मैं भगवान के अवतार में विश्वास नहीं करता हूँ
  5. मैं यह नहीं मानता और न कभी मानूंगा कि भगवान बुद्ध विष्णु के अवतार थे. मैं इसे पागलपन और झूठा प्रचार-प्रसार मानता हूँ
  6. मैं श्रद्धा (श्राद्ध) में भाग नहीं लूँगा और न ही पिंड-दान दूँगा.
  7. मैं बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों का उल्लंघन करने वाले तरीके से कार्य नहीं करूँगा
  8. मैं ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह को स्वीकार नहीं करूँगा
  9. मैं मनुष्य की समानता में विश्वास करता हूँ
  10. मैं समानता स्थापित करने का प्रयास करूँगा
  11. मैं बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग का अनुशरण करूँगा
  12. मैं बुद्ध द्वारा निर्धारित परमितों का पालन करूँगा.
  13. मैं सभी जीवित प्राणियों के प्रति दया और प्यार भरी दयालुता रखूँगा तथा उनकी रक्षा करूँगा.
  14. मैं चोरी नहीं करूँगा.
  15. मैं झूठ नहीं बोलूँगा
  16. मैं कामुक पापों को नहीं करूँगा.
  17. मैं शराब, ड्रग्स जैसे मादक पदार्थों का सेवन नहीं करूँगा.
  18. मैं महान आष्टांगिक मार्ग के पालन का प्रयास करूँगा एवं सहानुभूति और प्यार भरी दयालुता का दैनिक जीवन में अभ्यास करूँगा.
  19. मैं हिंदू धर्म का त्याग करता हूँ जो मानवता के लिए हानिकारक है और उन्नति और मानवता के विकास में बाधक है क्योंकि यह असमानता पर आधारित है, और स्व-धर्मं के रूप में बौद्ध धर्म को अपनाता हूँ
  20. मैं दृढ़ता के साथ यह विश्वास करता हूँ की बुद्ध का धम्म ही सच्चा धर्म है.
  21. मुझे विश्वास है कि मैं फिर से जन्म ले रहा हूँ (इस धर्म परिवर्तन के द्वारा).
  22. मैं गंभीरता एवं दृढ़ता के साथ घोषित करता हूँ कि मैं इसके (धर्म परिवर्तन के) बाद अपने जीवन का बुद्ध के सिद्धांतों व शिक्षाओं एवं उनके धम्म के अनुसार मार्गदर्शन करूँगा.

अब पाठक गण तय करे कि शपथ न 19 क्या घृणा और साम्प्रदायिकता को पोषित नही करता? अवतारो को सिरे से खारिज करने वाले अम्बेडकर को बोधिसत्व बताने वालो पर मुकदमा नही चलाया जाना चाहिये? और महज प्रारूप समिति को देखने वाले अम्बेडकर को भारतीय संविधान का निर्माता कैसे मान लिया गया

भारतीय संविधान का निर्माता कौन है यदि कोई ज्ञानी पुरुष इस ब्लाग पर आकर इस गुत्थी को सुलझाये तो महान दया होगी. भारतीय संविधान निर्माण हेतु 13 समितियो का गठन किया गया था जो इस प्रकार है
नियम समितिडॉ. राजेंद्र प्रसाद (संविधान सभा के अध्यक्ष्)
संघ शक्ति समितिपं जवाहर लाल नेहरू
संघ संविधान समितिपं जवाहर लाल नेहरू
प्रांतीय संविधान समितिसरदार वल्लभ भाई पटेल
संचालन समितिडॉ. राजेंद्र प्रसाद
प्रारूप समितिडॉ. भीमराव अम्बेडकर
झण्डा समितिजे. बी. कृपलानी
राज्य समितिपं जवाहर लाल नेहरू
परामर्श समितिसरदार वल्लभ भाई पटेल
सर्वोच्च न्यायालय समितिएस. वारदाचारियार
मूल अधिकार उपसमितिजे. बी. कृपलानी
अल्पसंख्यक उपसमितिएच. सी. मुखर्जी
अब आप तय करे कि इनमे से क्या किसी व्यक्ति को महज इसलिये संविधान निर्माता कहा जाय कि उससे एक वर्ग विशेष का वोट मिलेगा. 
देश ऐसी स्थिति मे है जहा पर असहिस्णुता का पागलपन बात बात मे जबान काटे ले रहा है अनुरोध है एक नागरिक, हिन्दुस्तानी और सच्चे इंसान होने का फर्ज़ निभाये और स्याह सफेद करने का बूता रखे.
जय हिद.

गुरुवार, 10 मई 2012

छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय का संचालन फर्जी अनुमोदन के बल पर चल रहा है


छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय का संचालन फर्जी अनुमोदन के बल पर चल रहा है.जी हां चौकिये नहीं ये बात एकदम सच है .निजी महाविद्यालय में जो अनुमोदित टीचर है वो केवल कागज तक ही सीमित है वास्तविक तौर पर नहींअसल में ये टीचर दुसरे विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे है.छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बध्द निजी महाविद्यालय में टीचरों का फर्जी अनुमोदन है वास्तव में ये टीचर बुंदेलखंड विश्वविद्यालय ,आगरा विश्वविद्यालय ,मेरठ विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य कर रहे है या फिर प्राथमिक या माध्मिक विद्यालय में सरकारी नौकरी कर रहे है.जी हां ये बात एकदम सच है.

अब देखे की कैसे होता है फर्जी अनुमोदन

इन निजी महाविद्यालय के प्रबंधको के द्वारा महाविद्यालय की तरफ से विज्ञप्ति अखबार में निकाली जाती है जिसमे मांग दर्शाई जाती की अमुक विषय की जगह अमुक महाविद्यालय में खाली है .यू जी सी मानक अभ्यर्थी सम्पूर्ण विवरण के साथ आवेदन करे ,वेतन यू जी सी मानक के अनुसार.बेचारे पढ़े  लिखे लोग लालच में आ कर आवेदन कर देते है .आवेदन करने के पश्चात कुछ प्रबंधक तो अभ्यर्थी को बुला लेते है और पूरे साल के केवल कागजो के रेट तय कर लेते है जो १५ हजार से २५ हजार तक  होता है यानी अभ्यर्थी को बिना अध्यापन कार्य किये उस महाविद्यालय से १५ से २५ हजार रुपये तक पूरे साल के दे दिए जाते है और एसे टीचर शायद इस समय परीक्षा में मूल्याकन में भी योगदान कर रहे है .दुसरे वे दबंग प्रबंधक होते है जो अभ्यर्थी का अनुमोदन भी करा लेते है और उसे ना तो साल का पैसा देते है और न ही उसे महाविद्यालय में पदाने देते है.आज शायद छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय में शायद ही कोई महाविद्यालय एसा होगा जिसमे सभी विषय के अनुमोदित टीचर हो.बहुत से तो ऐसे  महाविद्यालय है जिनमे पूरे साल भर स्टाफ  के नाम पर केवल चपरासी और बाबू मिलते है टीचर दूर दूर तक नहीं दिखाते है.असल में इस तरह के महाविद्यालय में शिक्षा का उद्देश्य केवल शिक्षा के नाम पर पैसा बनाना है और परीक्षा  में जम के नक़ल करवाना है.अगर आप टीचर का फर्जीवाडा  जानना चाहते है तो बस एक काम करे किसी एक विषय का सूचना केवल बुंदेलखंड विश्वविद्यालय और छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय;दोनों विश्वविद्यालय से संबध सभी निजी महाविद्यालय की सूचना दोनों विश्वविद्यालय से मांग ले और स्वयं  जांच कर ले छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय की निजी उच्च शिक्षा की दुकानों का फर्जीवाड़ा जो वास्ताव में डिग्री  बेंच रही है.

शुक्रवार, 6 अप्रैल 2012

नही रहे बलई काका. काव्य मंच पर ली जीवन की अंतिम सांस


बलई काका से मेरी अन्तिम मुलाकात 18 फरवरी को हुयी थी. कल  के कार्यक्रम की सूचना मुझे थी किंतु किन्ही कारण वश ना जा पाया. आज शांडिल्य जी ने यह दुखद समाचार दिया. दैनिक जागरण की कवरेज ज्यो की त्यो रख रहा हू. कुछ कहने की इच्छा नही है. काका को विनम्र श्रद्धांजली. 
फिल्म जगत के हास्य अभिनेता राजू श्रीवास्तव के 82 वर्षीय पिता रमेश चंद्र श्रीवास्तव उर्फ बलई काका 'साहित्य भारती' के वार्षिक काव्य समारोह में गुरुवार 5 अप्रैल 2012 सायं मंच पर आये तो पूरा मंच ही नहीं श्रोता भी गौरवान्वित हुए। अपने जनपद की सरजमीं में आयोजित कार्यक्रम में आने का बलई काका को कई दशकों बाद यह सौभाग्य मिला तो वह पूरे समय वह स्वयं में बहुत गदगद रहे। हर कोई उन्हें एकटक देखने व सुनने को बेताब रहा। रात लगभग 1.30 बजे काव्य मंच का संचालन कर रही प्रसिद्ध कवियत्री डॉ. कीर्ति काले ने ज्यों ही हास्य अभिनेता राजू श्रीवास्तव के यशस्वी पिता श्री रमेश चंद्र श्रीवास्तव बलई काका को काव्य पाठ के लिये आमंत्रित किया तो माहौल तालियों की गड़गड़हाट में गूंज उठा।
कलम व तलवार के धनी वीर बैसवारा क्षेत्र के प्रथम गद्यकार पं. नंद दुलारे वाजपेयी के गांव मगरायर में अपने ननिहाल में रहकर पढ़े लिखे बलई काका ने पूरे रौ में माइक संभाला और अपनी रचना की शुरूआत ही काव्य मंच के गौरव काकाओं से की। काव्य पाठ में वह बोले, 'काव्य मंच की शान रहे बैसवारे के चार काकाओं में दो रमई काका और बच्चू काका साथ छोड़ गये हैं। दो बचे काका में काका बैसवारी व हम बलई काका आप के बीच हैं।' बलई काका इन व्यक्तियों को दोहरा जिले के कवि सम्मेलन में आने की अतिसय खुशी का अहसास लोगों को बडे़ उत्साह से करा रहे थे। तभी अचानक पल भर के लिए बलई काका के हाथ कपकंपाये और देखते-देखते वह मंच पर ही गिर गये जिसमें सिर मंच के किनारे व पैर मंच पर रहे इस पर मंचासीन कवि व संयोजक सभी में हड़कंप मच गया। साथ रहे लोग बलई काका को रात लगभग 2.30 बजे जिला अस्पताल ले गये जहां मौजूद डॉ. बृज कुमार ने परीक्षण करने के बाद हार्ट अटैक होना बता कानपुर ले जाने की सलाह दी। कानपुर ले जाते समय रास्ते में ही उनकी मौत हो गयी।