शनिवार, 25 अगस्त 2012

वडवानल बनाम स्त्री-विमर्श: तारिणी


शान्त हुताशन शैल के नीचे
 झाक सको यदि तो झांको
वहाँ दिखेगा ज्वालाओं का
एक अति-उद्विग्न सरोवर |
नहीं दृष्टिगोचर होता है
सहज देखने पर यह सर
लेकिन जब विस्फोट हुताशन
शैल करेगा फिर क्या हो?
किन्तु नहीं विस्फोट
सहज ही हो पाएगा इसका
सदिओं-सहस्राब्दिओं की
 तो धूल जमी है इसपर!
और धूल कुछ ऐसी कि
पहले तो पथ की बाधा
फिर कहती मैं बहुत बुरी हूँ
 मत तुम ऊपर आना!
सच पूछो तो अगर
कहीं सागर हो उद्वेलित
नहीं हानिकारक होता है
 जैसे होती वडवानल |
ना जाने अब सुलग-सुलग कर
 आग यहीं मर जाएगी
या फिर होगा पुनः एक
 विस्फोट विषमता नाशक?

2 टिप्‍पणियां:

  1. ऊर्जा कभी नष्‍ट नहीं होती, अगर उसे जबरन दबाया जाएगा, तो विस्‍फोट तो होगा ही।

    ............
    सभी ब्‍लॉगर्स का अदब और तहज़ीब की नगरी में स्‍वागत है... लेकिन साथ ही साथ एक सवाल भी पूछना चाहूँगा कि आप ब्‍लॉगिंग क्‍यों करते हैं?

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  2. बहुत ही शानदार और सराहनीय प्रस्तुति....
    बधाई

    इंडिया दर्पण
    पर भी पधारेँ।

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