शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

द्रुत झरो जगत के पीत पत्र


"द्रुत झरो जगत के पीत पत्र
हे ज़रा -जीर्ण हे शुष्क -शीर्ण
द्रुत झरो जगत के पीत पत्र "


कविवर पन्त नें जब यह लिखा तब वे द्रुतगामी परिवर्तन की माँग कर रहे थे। उनकी परिवर्तन कविता तो हिन्दी काव्य साहित्य में एक मील का पत्थर है ही पर कविवर पन्त की चेतना जब सतत परिवर्तन की अनिवार्यता स्वीकारती है तो इसके पीछे मानव सभ्यता के दीर्घकालीन अनुभवों का दबाव भी स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। विश्व के अनेक मनीषी , लेखकों , विचारकों नें परिवर्तन की अनिवार्यता को स्वीकार करते हुये मानव जाति को निरन्तर उसके स्वागत के लिये प्रस्तुत रहने को कहा है। कवि टेन्सन की इस पंक्ति से भला कौन सुधी पाठक परिचित नहीं है , " Old order changeth yielding place to new ." जो इस क्षण है वह अगले क्षण में भी वैसा ही रहेगा , ऐसा सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता। सातत्व की परम्परा में ही परिवर्तन का तार भी अनुस्यूत रहता है। सनातनता ही सतत परिवर्तनशीलता है। बूँद का एकाकीपन धारा से मिलकर अविरलता का अभाष देता है पर उसकाअपना अस्तित्व धारा में विलीयमान होकर भी संरक्षित रहता है । यह संरक्षण परिवर्तन की चिरन्तन शीलता से दोलायित होता रहता है । मानव चेतना का विकास भी जिन मूल्यों को लेकर हुआ है । वे जीवन मूल्य भी काल की प्रवह मयता में नये -नये ढंग से रूपायित होते रहते हैं । कल के आदर्श कँगूरे आज के खण्डहर बन गये हैं और आज के स्वीकृत आदर्श कँगूरे आगत कल के खण्डहर बन जायँ तो इसमें आश्चर्य ही क्या ? हमारा छोटा सा ग्रह जिसे हम धरती के नाम से जानते हैं , अपने छोटे से ब्रम्हाण्डीय काल में कितने अजीबोगरीब परिवर्तन देख चुका है। जो आज एवरेस्ट की चोटी है वह बीते कल में समुद्र की तलहटी थी और जो द्वीप समूह आज मानव प्राणियों से आबाद है , वे कल जल की उत्ताल तरंगों में सो रहे होंगें। ऐसा माना जाना भी भूगोल वेत्ताओं द्वारा स्वीकृत हो चुका है। इसलिये यह आवश्यक हो जाता है कि हम परिवर्तन के अग्रगामी दूत बनें। ऐसा करके हम प्रकृति में अन्तर्निहित शक्तियों को अपने व्यवहार के माध्यम से और अधिक उजागर कर सकते हैं। हाँ हमें इतना ध्यान अवश्य रखना होगा कि परिवर्तन का अर्थ अहेतुक विनाश नहीं है पर ऊर्ध्व गामी निर्माण के लिये यदि पुरानी कमजोर पड़ गयी नीवों को हटाना पड़े तो उसे हमें सहर्ष स्वीकार करने के लिये प्रस्तुत होते रहना पड़ेगा ।
एक समय था जब हम कालजयी साहित्य की बात करते थे ऐसा नहीं है कि अब हम कालजयी साहित्य की बात नहीं हो रही है पर अब कालजयी का अर्थ बदल गया है । अब कालजयी का अर्थ है किसी श्रेष्ठ रचना में विचारों की ऐसी परिपक्वता जो अभिव्यक्ति के निरालेपन से काल के एक लम्बे दौर तक मानव जाति को उच्चतर मूल्यों की ओर प्रस्तुत कर सके। हो सकता है कि एकाध शताब्दी के बाद तकनीकी विकास के दूरगामी परिणामों के कारण समस्त मानव जाति गरीबी से मुक्त हो जाय। तब केवल दरिद्रता , गरीबी और भुखमरी पर आधारित रचनायें एक ऐतिहासिक शोध का विषय बन कर रह जायेंगीं पर मन के सम्वेदनों और अन्तर चेतन के सूक्ष्म संकेतों से सम्बन्धित रचनायें उस समय भी विज्ञ पाठकों को अनुकरणीय जीवन मार्गों की तलाश की ओर प्रेरित करती रहेंगीं। शायद यही कारण है कि शैक्सपियर , तुलसी , टालस्टाय और रवीन्द्र आज भी हमारे लिये प्रेरणा का श्रोत हैं। भले ही उनको पढ़ने , समझने वालों की संख्या उतनी न हो जितनी कि चित्रपट के तारिकाओं और सितारों को देखने वालों की संख्या , यहाँ हम हाली वुड , वालीवुड , टालीवुड तथा मालीवुड सभी को चित्रपट के माध्यम से व्यक्त करना चाह रहें हैं। केवल संख्या बल पर श्रेष्ठता का आंकलन सीधे चुनाव में तो हो सकता है पर बुद्धि , मन और आत्मा के गहन क्षेत्रों में केवल संख्या बल पर श्रेष्ठता का निधारण नहीं हो सकता।
ज्योतिर्पिंड के महाविस्फोट के साथ ब्रम्हाण्डीय विस्तारण चल निकला और उसके साथ ही साथ चल निकला काल का अविरल प्रवाह का यह विस्तारण और यह काल प्रवाह अबाधित , अलक्षित स्वत : नियन्त्रित पर अमर्यादित ढंग से क्षण -प्रति क्षण चलता रहा है और चलता रहेगा। द्विपदीय मानव विकास के साथ मानव बुद्धि का एक घटक इस काल प्रवाह को परिवर्तन के एक और विषमकोणीय मार्ग से बढ़ाने में लग गया। मानव सभ्यता के प्रारम्भिक दौर में तकनीकी विकास सहस्त्रों वर्षों तक बुद्धि की आदिम कुहाओं में खोया रहा।पर पिछली दो एक शताब्दियाँ चमत्कारिक छलांग देकर तकनीकी विकास को एक नयी ऊँचाई पर ले आयीं और पिछली अर्धशताब्दी में तो ब्रम्हाण्डीय विशालता का एक बहुत बड़ा अंश तकनीकी विकास को मिल गया और वे अब तो हर दशक सितारों के पार के नये द्रश्य दिखा रहा है। जैवकीय का विकास चिर यौवन की लालसा जगाने लगा है और जीन्स का रहस्य भेद मृत्यु विजय की झूठी -सच्ची कहानियाँ प्रस्तुत करने लगा है। इन सारे सन्दर्भों में कल का साहित्य तभी टिकाऊ और कालजयी हो सकेगा जब उसमें आधुनिकतम चेतना के विभिन्न आयामों को समावेश करने की क्षमता हो। इन आयामों पर पूरी तरीके से खरा उतरने वाला कोई समर्थ चिन्तक , भविष्य द्रष्टा या चमत्कारिक सृजन प्रतिभा सम्पन्न कम से कम भारतवर्षीय साहित्य के परिपेक्ष्य में तो देखने में नहीं आ रहा है। विश्व के मानचित्र पर भले ही कुछ नोबेल प्राइज़ विनर दिखायी पड़ जायँ पर उनमें ऐसा कुछ नहीं है जो हमें विस्मय विमूढ़ कर दे। चाहे विद्याधर नायपाल हों चाहे सलमान रशिदी , चाहे अमरकान्त हों , चाहे श्री कान्त शुक्ल , चेतन भगत हों चाहे अमिताव घोष सभी श्रेष्ठता के स्तर को छूते हुये भी महान श्रेष्ठता की ऊँचाई तक नहीं पहुच पाते और इस द्रष्टि से हम उनका आदर तो करते हैं पर हम उनसे भयभीत नहीं होते। हमें लगता है कि वो हममें से ही हैं। कुछ अधिक प्रखर अनुभव तीब्रता और अधिक समर्थ भाषा अधिकार के साथ वे महा श्रष्टा महामानव नहीं हैं न उनमें टालस्टाय या डास्टाय वास्की की खोज करना व्यर्थ है उनमें प्रेमचन्द और गोर्की बनने की सम्भावना भी नहीं है। मोपासाँ और रोम्याँरोला की तड़प पैदा करने वाली कचोट भी वहाँ नहीं है पर फिर भी वे सब पठनीय हैं और हमारी सामाजिक चेतना के विस्तार के लिये महत्वपूर्ण योगदान कर रहे हैं। अपना महाशतक पूरा करने पर सचिन तेन्दुलकर नें कहा था कि " We must chase our dreams ." यानि हमें अपने स्वप्नों को सत्य करने के लिये निरन्तर प्रयत्न शील रहना पड़ेगा और स्वप्न भी सत्य हो सकते हैं। माँ हिन्दी की गोद का कौन सा लाल विश्व के साहित्यिक मंच पर सर्वोच्च स्थान पर खड़ा होकर माँ भारती का ध्वज फहरा सकेगा , सतत प्रयत्न करना ही हमारी साधना है बाकी सब विश्वभर के हाथ है ।

शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

प्रेम ,संघर्ष और प्रकृति

प्रेम  को समझना वस्तुतः जितना कठिन लगता है उतना है नहीं फिर भी ये बताना आवश्यक है कि  जो ये विचरता   हो कि प्रकृति का मूल प्रेम में है मेरी दृष्टि में वो भ्रम में जी रहा है।
 प्रकृति तो संघर्ष  के मूल पे चल रही है ,
तो आप कहेंगे कि प्रेम कहा है ?
 उत्तर है कि
संघर्ष का बीज ही प्रेम है।  प्रकृति का बीज प्रेम है।  

प्रेम स्वयं के साथ संघर्ष लाता है , आप खुद के लिए मेहनत कर रहे है क्यों क्योकि खुद से प्रेम करते है ,
यदि प्रेम समाप्त हो जायेगा तो मेरा मानना है कि संघर्ष भी रुकेगा पर उससे हानि ही होगी ,क्योकि प्रेम के लिए किया गया संघर्ष स्वयं में प्रेम का ही रूप है.   

 प्रेम को सरलता से परिभाषित करने के अनेको प्रयास हुए सभी  ने इसे अपने अपने ढंग से परिभाषित किया ,और ये होगा भी क्यों कि हर व्यक्ति के विचार ही निश्चित करते है कि वो प्रेम के किस रूप को जी रहा है ,वस्तुतः प्रेम आपके ही विचारो का स्वरुप है ये कहना अनुचित नहीं होगा।

इस संसार के सारे रिश्ते जो प्रेम पे आधारित है उनके निर्माण में मूल तत्व सिर्फ प्रेम नहीं कहा जा सकता प्रेम के साथ कई और तत्वो का समावेश ही रिश्तो के निर्माण में सम्मिलित होता है ,उद्धरण कि तरह आप वैवाहिक रिश्ते को लीजिये अगर सिर्फ प्रेम ही होगा तो कही न कही ये रिश्ता अपूर्णता को प्राप्त होगा क्योकि हर रिश्ते का कुछ लक्ष्य होता है और इस बात से इंकार कोई नही कर सकता। 


जो व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है तो सिर्फ प्रेम ही नहीं अपितु आत्मसम्मान ,गौरव भी उस रिश्ते के निर्वहन के मूल में होते है ,मेरा मानना है कि सिर्फ प्रेम किसी रिश्ते ,सम्बन्ध के लिए काफी नहीं अपितु सम्बन्ध के निर्वहन उसके मूल में उपस्थित अन्य तत्वो के बिना सम्भव नहीं।  

वास्तविकता में प्रेम एक डोर कि तरह है जो अन्य तत्वो को बांधे रखता है।
निश्चित ही प्रेम कि अपनी महत्ता है परन्तु प्रेम को संपूर्ण ईश्वर कह देना भी सही नहीं। 


 प्रेम को परिभाषित करने के प्रयास होते रहे है और होते रहेंगे पर जैसा मैंने कहा कि आप किस रूप को जी रहे ये आपके विचार तय करते है  ,तो बस विचार में जरा से परिवर्तन से आप देखेंगे कि आपके लिए प्रेम कि परिभाषा बदलती जा रही है , ये आप पर निर्भर है की आप कौन से विचारो को अपने जीवन में स्थान देन्गे क्योकि विचार प्रेम को जन्म देते है और प्रेम संघर्ष को ,विचार करिये कि संघर्ष का कौन सा स्वरुप आपके लिए उत्तम है।  

जय हिन्द    "अमन मिश्रा "