शुक्रवार, 17 जनवरी 2014

प्रेम ,संघर्ष और प्रकृति

प्रेम  को समझना वस्तुतः जितना कठिन लगता है उतना है नहीं फिर भी ये बताना आवश्यक है कि  जो ये विचरता   हो कि प्रकृति का मूल प्रेम में है मेरी दृष्टि में वो भ्रम में जी रहा है।
 प्रकृति तो संघर्ष  के मूल पे चल रही है ,
तो आप कहेंगे कि प्रेम कहा है ?
 उत्तर है कि
संघर्ष का बीज ही प्रेम है।  प्रकृति का बीज प्रेम है।  

प्रेम स्वयं के साथ संघर्ष लाता है , आप खुद के लिए मेहनत कर रहे है क्यों क्योकि खुद से प्रेम करते है ,
यदि प्रेम समाप्त हो जायेगा तो मेरा मानना है कि संघर्ष भी रुकेगा पर उससे हानि ही होगी ,क्योकि प्रेम के लिए किया गया संघर्ष स्वयं में प्रेम का ही रूप है.   

 प्रेम को सरलता से परिभाषित करने के अनेको प्रयास हुए सभी  ने इसे अपने अपने ढंग से परिभाषित किया ,और ये होगा भी क्यों कि हर व्यक्ति के विचार ही निश्चित करते है कि वो प्रेम के किस रूप को जी रहा है ,वस्तुतः प्रेम आपके ही विचारो का स्वरुप है ये कहना अनुचित नहीं होगा।

इस संसार के सारे रिश्ते जो प्रेम पे आधारित है उनके निर्माण में मूल तत्व सिर्फ प्रेम नहीं कहा जा सकता प्रेम के साथ कई और तत्वो का समावेश ही रिश्तो के निर्माण में सम्मिलित होता है ,उद्धरण कि तरह आप वैवाहिक रिश्ते को लीजिये अगर सिर्फ प्रेम ही होगा तो कही न कही ये रिश्ता अपूर्णता को प्राप्त होगा क्योकि हर रिश्ते का कुछ लक्ष्य होता है और इस बात से इंकार कोई नही कर सकता। 


जो व्यक्ति अपने देश से प्रेम करता है तो सिर्फ प्रेम ही नहीं अपितु आत्मसम्मान ,गौरव भी उस रिश्ते के निर्वहन के मूल में होते है ,मेरा मानना है कि सिर्फ प्रेम किसी रिश्ते ,सम्बन्ध के लिए काफी नहीं अपितु सम्बन्ध के निर्वहन उसके मूल में उपस्थित अन्य तत्वो के बिना सम्भव नहीं।  

वास्तविकता में प्रेम एक डोर कि तरह है जो अन्य तत्वो को बांधे रखता है।
निश्चित ही प्रेम कि अपनी महत्ता है परन्तु प्रेम को संपूर्ण ईश्वर कह देना भी सही नहीं। 


 प्रेम को परिभाषित करने के प्रयास होते रहे है और होते रहेंगे पर जैसा मैंने कहा कि आप किस रूप को जी रहे ये आपके विचार तय करते है  ,तो बस विचार में जरा से परिवर्तन से आप देखेंगे कि आपके लिए प्रेम कि परिभाषा बदलती जा रही है , ये आप पर निर्भर है की आप कौन से विचारो को अपने जीवन में स्थान देन्गे क्योकि विचार प्रेम को जन्म देते है और प्रेम संघर्ष को ,विचार करिये कि संघर्ष का कौन सा स्वरुप आपके लिए उत्तम है।  

जय हिन्द    "अमन मिश्रा "

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें