शनिवार, 7 सितंबर 2013

हौसलों के सहारे

हौसलों के सहारे आसमा छूने की ललक है। ….
आज मुझको फिर से कुछ पाने की तलब है।

बुझ जाते है दिए ,हवा के झोको से।,
कइयो को इस  बात  का भरम भी बहुत है।

है  साथ अपने ,या गैर हो सभी।
वक्त की वफाई  हमने भी  देखी  बहुत है।

नाज है हमको  ,अपनी खताओ पर।
गिर कर के रास्तो पे हमने सीखा बहुत है।


ये मत कहो की दुनिया में  अमन , मुमकिन नहीं कुछ काम ,
पहाड़ो को भी पल में टूटते हमने देखा बहुत है। .........

परवाह  नहीं मुझको, खुद के बिखरने  की ।
तारो को भी टूटते  हमने देखा बहुत है।

हौसलों के सहारे आसमा छूने की ललक है। ….
आज मुझको फिर से कुछ पाने की तलब है।
                                                                               "aman mishra"

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - सोमवार - 09/09/2013 को
    जाग उठा है हिन्दुस्तान ... - हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः15 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra





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  2. हौसलों के सहारे आसमा छूने की ललक है। ….
    आज मुझको फिर से कुछ पाने की तलब है
    बहुत सुन्दर.

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  3. बहुत सुंदर और सार्थक....
    साभार....

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