सोमवार, 13 मई 2013

यही जिंदगी है?

यु बैठा तनहा ,
स्याह पन्नो को पलटता ..
जिंदगी के कुछ लम्हों को  फिर से पाने  को,
आज मै  बेक़रार हू ..

बंद आँखों से ,
लहराते सागर ,घुमड़ते आसमान को  देखता  ,

कल्पना में तेरे साथ को पाता,
खुद में ही खोता , लहरों में झूलता ..
में उन सपनो को फिर से जीने को बेक़रार हू ..

पर फिर याद आता है ,
इस समाज का चेहरा ,
हसता मुस्कुराता ,
जहर  से भरा  ,
बस पीछे हट जाते है मेरे कदम ,

अरमानो को बांध लेता हू खुद के भीतर ही ,
खुद के लिए नहीं ,बस तेरे खातिर ,

समझौते करता ,
एक  झूठी हसी लिए ,
खुद के सपनो को खुद ही तोड़ता ,

सूखे पेड़ सा गिरने का इंतजार करता .
की कब आएगी कोई हवा ले जाएगी तुझे मुझसे दूर ,

कुछ न कह पाउँगा मै ,
मुट्टी भी बंद होगी ,
पर हाथ तो बंधे होगे ,

बस तेरे खातिर ,तेरी मुस्कराहट को  ,
कट जाऊंगा एक  पेड़ सा ,
बिना किसी चीख के ,
बिना किसी रुदन   के .

बस तेरे खातिर ..बस तेरे खातिर ..
आह यही जिंदगी है, यही प्यार है ......................

                                                 "अमन मिश्र"

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